गन्डमूल नक्षत्र तथा उनका जीवन पर पडने वाला प्रभाव---( रेवती नक्षत्र )

रेवती नक्षत्र:-कालपुरूष की अन्तिम राशि मीन के अन्तर्गत आने वाला यह नक्षत्र, 27 नक्षत्रों के इस चक्र का सबसे अन्तिम नक्षत्र है, इसे आप यूँ भी समझ सकते हैं कि यह नक्षत्र जीवन के अन्त और पुनर्जन्म के बीच का सन्धिस्थल है, उस श्रृंखला की एक कडी है. इसलिए इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातकों का सम्बन्ध भी किसी श्रृंखला के अन्त तथा किसी कार्य, परिवार या विचारधारा की श्रृंखला के प्रारम्भ से होता है.यह नक्षत्र 32 तारों का एक समूह है. जिसकी आकृति बिल्कुल मृदंग के सदृश्य है. लोकभाषा में इसे श्रवण कुमार की पत्नि भी कहा जाता है. इस नक्षत्र के प्रभाव में मनुष्यों का स्वभाव बडा ही विचित्र या कहें कि एक तरह से बेढंग टाईप का होता है.अर्थात कुछ लापरवाही युक्त..मसलन---खाना खाया तो खाया, नहीं तो नहीं खाया. शरीर के प्रति अनासक्त भाव और विदेही स्थिति में जीना इस नक्षत्र की यह एक बहुत बडी विशेषता है. यह नक्षत्र जातक को इस प्रकार की मन:स्थिति तक पहुँचा देता है कि जहाँ पहुंचकर व्यक्ति की विचारशक्ति शिथिल होने लगती है; किन्तु उसका, व्यक्ति के नित्य नैमितिक व्यवहारों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पडता. भाग्यवशात इन लोगों को वृद्धावस्था में धन की कमी एवं भीषण व्याधियों का सामना करना पडता है.

प्रथम चरण:- इस नक्षत्र चरण के जातक का स्वभाव एक तरह से सागर के समान होता है------बाहर से लहरों सा चंचल किन्तु भीतर से सागर के समान शान्त, गम्भीर व स्थिर. इस नक्षत्र चरण में मुख्यत: दो प्रकार के लोगों का जन्म होता है---एक विषयसुखों का पूर्णत: परित्याग करने वाले और दूसरे व्यसनाधीन. रेवती का यह चरण हर एक चीज का लय करने वाला चरण है. दूसरे इसमें अनासक्ति भाव होने के कारण, उन बातों में जिसमें अन्त:स्फूर्ती से काम लिया जाता है, ये लोग पारंगत होते हैं.
द्वितीय चरण:- इस चरण में जन्म लेने वाले जातकों की सोच कुछ इस प्रकार की रहती है कि--इनको कोई ठीक से नहीं समझता है और इन्हे यथेष्ट सहानुभूति एवं संवेदना नहीं देता है. इसलिए अपनी खुशियों, अपने हर्ष,अपने विषाद को ये लोग अपने भीतर ही संजो कर रखने के आदि होते हैं.दूसरों से ये लोग केवल बाहरी छिछले अनुभवों और विचारों का ही आदान-प्रदान करते हैं.हालाँकि सांसारिकता, भौतिकता की ओर विशेष आकर्षण होने के चलते ये लोग धनोपार्जन एवं सुख-सम्पदा के क्षेत्र में विशेष सफलता हासिल कर लेते हैं. किन्तु आध्यात्मिक पक्ष इनका कमजोर ही रहता है. यह चरण व्यक्ति को कल्पनाशील बनाता है. इनकी कल्पनाशीलता बहुधा विगत कीर्तियों की यादों में या भावी आशाओं में ही उलझी रहती है.
तृतीय चरण:- इस चरण में जन्म लेने वाले जातकों को जीवन में आनन्द और सुख से अधिक उतरदायित्वों का ही निर्वाह करना पडता है.इसके जातक सर्वदा बेचैन बने रहते हैं, उनका चित्त अशान्त और मन सदैव असंतुष्ट रहता है. दूसरों की उन्नति, विकास और बुद्धि के लिए सहायता करने में बेशक सदैव तत्पर रहते हैं, परन्तु अपने इस परोपकार के बदले में ये लोग केवल काँटों का ताज ही पाते हैं. यह चरण व्यक्ति के दैनिक जीवन में आध्यात्मिकता का ज्ञान देकर सुखमय वृद्धावस्था की नींव डालता है. 52 वर्ष की आयु पश्चात शेष जीवन आनन्दमय व्यतीत होता है. जिसकी कीमत ये लोग, बहुत सी चीजों का त्याग कर अपनी युवावस्था में ही चुका चुके होते हैं.
चतुर्थ चरण:- इस चरण में जन्म लेने वाले जातकों को अपनी सुख-सुविधा किन्ही विशेष लोगों, विशेष सिद्धान्तों, विशेष परम्पराओं अथवा किन्ही विशेष उदेश्यों की रक्षा के लिए(इच्छा/अनिच्छावश) त्याग करना ही पडता हैं.वार्तालाप में मधुरता इनका एक अतिरिक्त गुण रहता है. ह्रदय के साफ होने के बावजूद भी इन्हे बिना किसी अपने दोष के अत्यन्त दु:ख और कष्ट सहने पडते हैं. निश्चित रूप से व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक कष्ट, दु:ख और निराशा का होना आध्यात्मिकता के विकास से सम्बद्ध होती है. जब सांसारिक जीवन में व्यक्ति विशेष कठिनाईयों का अनुभव करता है, तब उसे आवश्यक रूप से निराशा का सामना करना पडता है. यही निराशा जीवन में आध्यात्मिकता को अंकुरित कर आगे का मार्ग खोलने में सहायक बनती है.
पूर्व आलेख:-
1.गन्डमूल नक्षत्र, उनका कारण और जीवन पर पडने वाला उनका प्रभाव---(अश्विनी नक्षत्र)
2. गन्डमूल नक्षत्र तथा उनका जीवन पर पडने वाला प्रभाव---(आश्लेषा,मघा नक्षत्र)
3. गन्डमूल नक्षत्र तथा उनका जीवन पर पडने वाला प्रभाव---(ज्येष्ठा नक्षत्र)
4. गन्डमूल नक्षत्र तथा उनका जीवन पर पडने वाला प्रभाव---(मूल नक्षत्र)