उत्सव-दर्शन

भला ऎसा कौन सा मनुष्य होगा जिसे पर्व-उत्सव आनन्दित न करते हों. क्या बच्चा, क्या बूढा और क्या जवान--उत्सव चाहे कोई भी हो, सभी पसन्द करते हैं, क्यों कि वे हमें दैनिक जीवन में से अल्पकालीन मुक्ति देते हैं. काम-धंधे, रोजी-रोजगार और शुष्क जीवन-व्यवहार के बोझ के नीचे दबा हुआ इन्सान उत्सव के दिन थोडी सी मुक्त साँस लेकर आराम महसूस करता है. जीवन की जडता को मुक्त आकाश मिलता है. पल भर उसमें मुक्त उड्ड्यन करके मानव अपने मन के संतापों को कुछ देर के लिए शमित महसूस करता है.
उत्सवों का उल्लास इसका प्रेय भाग है, तो इनमें छिपा हुआ जीवन-दर्शन उनका श्रेय भाग है. किसी भी उत्सव के पीछे प्रेय और श्रेय दोनों का समन्वय होना चाहिए. उत्सवों को यथास्थिति मनाने में तो केवल प्राकृतता है, जब कि इनमें रहे हुए भाव-रहस्य को समझकर मनाने में श्रेष्ठत्व है.
उत्सव अर्थात 'उर्ध्वजन्म कराने वाला'. "जन्मना जायते शूद्रो संस्कारै: द्विज उच्यते". सांस्कृतिक उत्सव संस्कारिता के साथ मनाने पर मनुष्य को द्विजत्व प्रदान करते हैं.
उत्सवों के पीछे भाव का महत्व है. भावशून्य अंत:करण से मनाए जाने वाले उत्सव तो निरे यन्त्रवत होते हैं और मानव-जीवन में जडत्व, निर्माण करते हैं. गतानुगतिक, परम्परा प्राप्त और समझे बिना उत्सवों को मनाने से कोई काम नहीं बनता. परिणामत: समय, शक्ति और पैसे का व्यय ही उत्सव के लिए होता है. भावपूर्ण अंत:करण से और सारग्रही बुद्धि से यदि उत्सव मनाए जाएं तो वे जीवन को आनन्दमय बनाएंगें और जीवन की निराशा को निकालकर नईं आशा का संचार करेंगें.
पर्व-उत्सवों की मूक भाषा हमें जीवन-विकास में उपयोगी संदेश देती है. सम्यक दिशा दिखाने वाले को मार्गदर्शक कहा जाता है. इस तरह उत्सव एक उत्कृष्ट के रूप में हमारे सामने उपस्थित होते हैं. जीवन को कहाँ बांधना चाहिए, कौन सी दिशा में मानव की गति होनी चाहिए वगैरह बातों का सुन्दर सूचन इन उत्सवों में छिपा होता है.
भारत का समूचा सांस्कृतिक इतिहास किताबों के पन्नों में नहीं परन्तु उसके जीवंत उत्सवों में लिखा हुआ है. इन उत्सवों के पीछे रही हुई दृष्टि को यदि हम समझें, उसके पीछे रहे हुए मन्त्र का; यदि मनन किया जाए तो उन सांस्कृतिक इतिहास के सर्जक ऋषिमुनियों के प्रति मानव कृतज्ञ बुद्धि से नतमस्तक हो जाएगा और इस संस्कृति को बनाए रखने के लिए अपने रक्त की बूँद बूँद न्यौछावर करने वाले पूर्वजों के प्रति आदर निर्माण होगा, शास्त्र रचनाकारों के लिए श्रद्धा ज्यादा दृढ होगी.
उत्सव ऎक्य के साधक, प्रेम के पोषक, प्रसन्नता के प्रेरक, धर्म के संरक्षक और भाव के संवर्धक हैं. उत्सवों में सिर्फ छुट्टी का मजा लेते लेते हम जीवन से मजे को ही छुट्टी देते महसूस होते हैं. मनोमंथनरहित मनोरंजन उत्सव के सारे रहस्य का ही हनन कर देता है.

अपने पर्वों, उत्सवों को हम सच्चे अर्थ में समझें, मनाएं, टिकाएँ, सुसंस्कृ करें और समुद्दात्त करें, तभी उत्सवों को मनाने का कुछ अर्थ है. पर्व-उत्सव, त्योहारों का मनाना सच्चे अर्थ में हमारा जीवन-दर्शन बनें, यही भगवान योगेश्वर से प्रार्थना हैं!!!