गन्डमूल नक्षत्र तथा उनका जीवन पर पडने वाला प्रभाव---( ज्येष्ठा नक्षत्र )

ज्येष्ठा नक्षत्र:- यह नक्षत्र तीन तारों का एक समूह है. जिसका क्षेत्र वृश्चिक राशि के 16-40 अंश से धनु राशि के 0-0 अंश तक है.स्वार्थ और असंतोष इस नक्षत्र का एक मुख्य कार्मिक फल है. इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक जीवन में सफलता और निराशा दोनों का एक विचित्र सम्मिश्रण अनुभव करते हैं. यह कहना कठिन होता है कि इस नक्षत्र वाले राक्षसी प्रवृतियों की ओर विशेष आकर्षित होते हैं या दैवीय प्रवृतियों की ओर, परन्तु दोनों ही दशाओं में इन्हे अदभुत शक्ति, आश्चर्यजनक सफलता और कार्मिक प्रतिफल के कारण निराशा जरूर भुगतनी पडती है.

1. इस नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला जातक एकदम व्यक्तिवादी(Individualistic) जीवन व्यतीत करता है. इनके ह्रदय में किसी प्रकार का स्नेह तथा निस्वार्थ परोपकार की भावना नहीं पनपने पाती. जब व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ती हो जाती है, तब दूसरे व्यक्ति का इनके लिए कोई मूल्य शेष नहीं रहता. यहाँ तक कि इन्हे अपने आंतरिक जीवन की महत्ता का भी स्पष्ट ज्ञान या उसको जानने की लालसा भी नहीं रहती. यह चरण स्वयं के तथा पिता के बडे भाई के कर्मों के सचेतक रूप में काम करता है.

2. यह द्वितीय चरण व्यक्ति की आत्म हीनता का सूचक है. वाकचातुरी, असंयमित जिव्हा और मलिन ह्रदय आत्मिक विकास में सदैव बाधा बने रहते हैं. बेशक आज के युग में ये दुर्गुण भौतिक ऎश्वर्य तथा कामजनित वासना की पूर्ती के श्रेष्ठ माध्यम कहे जा सकते हैं, किन्तु इन्सान की आत्मिक शक्ति का निरर्थक एवं निरन्तर क्षय होता जाता है. यह चरण प्रथमश: तो अपने से छोटे भ्राता के जन्म में बाधा एवं दूसरे उसके जन्म लेने के पश्चात उसके कर्मजन्य दुष्फलों की सूचान देता है.

3. किसी व्यक्ति का इसके तृतीय चरण में जन्म लेना ही एक बडी भारी विचित्रता को दर्शाता है. वो ये कि जीवन के आरम्भिक काल में ही अनायास जातक को अचेतन विदेहात्मक ज्ञान(Unconscious psychism) का आभास होने लगता है. ऎसे व्यक्ति बिना प्रयास बहुत सी बातें जान जाते हैं, उन्हे अनेक बातों तथा अनेक लोगों के अन्तर्सम्बन्धों का अन्तर्ज्ञान होने लगता है. परन्तु यदि नक्षत्रपति बुध के नीच/मेष/कुम्भ राशि में होने के कारणवश ये शक्तियाँ उपस्थित नहीं हो अथवा निष्क्रिय हों और जन्मकुंडली के ग्रहों के प्रभाव से इसके विकास की संभावना भी अवरूद्ध हो गई हो, तब वैसी परिस्थिति में इनकी मूल प्रकृति पूरी तरह से नकारात्मक होती है, ह्रदय कठोर और मन अधार्मिक रहता है.

4. इस चतुर्थ नक्षत्र चरण को "गंडातमूल" भी कहा जाता है. इसमें जन्म लेने वाला जातक जीवन प्रयन्त आध्यात्मिकता और भौतिकता के द्वन्द से पीडित रहता है.आत्मा कहती है--"धर्म कर", लेकिन मन उसे नकार देता है---"छोड, फिर देखी जाएगी. अभी तो आराम कर". बस यही द्वन्द जीवन प्रयन्त चलता रहता है. सुअवसर प्राप्त होने पर भी आध्यात्मिकता की ओर कोई विशेष अभिरूचि नहीं होने पाती. इस नक्षत्र चरण में जन्म होना व्यक्ति के पूर्वजन्मकृत अपने ही कार्मिक दोषों का सूचक है. जिनका फल उसे स्वयं के शारीरिक कष्टों के रूप में वहन करना पडता है.
आगामी लेख:-गन्डमूल नक्षत्र तथा उनका जीवन पर पडने वाला प्रभाव---( मूल तथा रेवती नक्षत्र )
पूर्व आलेख:- 
1.गन्डमूल नक्षत्र, उनका कारण और जीवन पर पडने वाला उनका प्रभाव---(अश्विनी नक्षत्र)
2. गन्डमूल नक्षत्र तथा उनका जीवन पर पडने वाला प्रभाव---(आश्लेषा,मघा नक्षत्र)