बृ्हस्पति, शुक्र के अस्तकाल में विवाहादि शुभ कार्य वर्जित क्यों ?

बृहस्पति और शुक्र के अस्त हो जाने पर प्राय: सभी शुभ कर्म खासतौर से विवाहादि स्त्री सम्बन्धी कृत्य वर्जित रहते हैं, क्यों ? इसलिए कि "यतपिण्डे च ब्राह्मण्डे" के सिद्धान्तानुसार मानव शरीर में "ज्ञान" बृहस्पति की देन है और "वीर्य" अर्थात काम(स्त्री सम्बन्धी सब प्रकार की चेष्टाएं) शुक्र ग्रह की देन हैं. सो, जब ये दोनों महाग्रह अस्त हों तो "ज्ञान दुर्बल" और "हीन वीर्य" मनुष्य जो कुछ भी करेगा, वे सब कृत्य अज्ञान विजृम्भित तथा क्लैव्यपूर्ण ही होंगें. सही मस्तिष्क, बुद्धि वाला एक बलवान मनुष्य ही सब कृत्यों को औचित्य की भित्ति पर स्थिर करने में समर्थ हो सकता है.

किन्ही सज्जन नें यह शंका व्यक्त की है कि सूर्य रोजाना संध्या समय अस्त हो जाता है, ऎसे ही चन्द्रमा भी अस्त होता है, लेकिन इनके अस्त हो जाने पर तो रात में धडाधड विवाह होते हैं. तब कोई दोष नहीं लगता तो फिर बृ्हस्पति, शुक्र के अस्तकाल में विवाहादि शुभ कार्य कर भी लिया जाए तो कौन सा पहाड टूट पडेगा. क्या यह सब फालतू की नौटंकी नहीं है ?

हम यहाँ यह बता देना चाहते हैं कि अस्त से अभिप्राय यहाँ आँखों से ओझल हो जाना नहीं है. वरन् सूर्य ग्रह के अत्यन्त सन्निधान में जाकर उसके प्रभाव मंडल में विलीन हो जाना है. यह तो एक बच्चा भी जानता है कि सूर्य कभी अस्त नहीं होता, वह तो रात में केवल आखों से ओझल मात्र हो जाता है. उसे सामान्य बोलचा में अस्त कह दिया जाता है. इस प्रकार का अस्त तो बृ्हस्पति, शुक्र अथवा अन्य किसी ग्रह का भी वर्जित नहीं. चन्द्रमा भी अमावस्या के दिनों में ही अस्त रहता है, तब भी विवाहादि शुभ कृ्त्य नहीं किए जाते. मंगल, बुध और शनि ग्रह का किसी आध्यात्मिक तत्व से सम्बन्ध नहीं हैं, किन्तु उनका स्थूल शरीर रूपी पिंण्ड से सम्बन्ध है. इसलिए इन ग्रहों का अस्त काल विवाहादि किसी प्रकार के शुभ कार्यों में वर्जित नहीं माना जाता....