अनेकानेक बाधाओं से मुक्ति मात्र सिर्फ एक उपाय से.....

र्म करना एक तरह से मानव जीवन की विवशता ही है, क्यों कि किए गए कर्मों से ही प्रारब्ध का निर्माण होता है. भाग्य पूर्व के संचित कर्मों तथा वर्तमान जीवन के किए गए कर्मों के मिश्रण का ही रहस्यमयी अंश है. इसलिए अधिकतर लोग अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता के चरम को छूने के लिए निरन्तर संघर्षशील रहते हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम ही अपने सपनों को हकीकत में बदल पाते हैं. ऎसी मान्यता है कि प्रकृ्ति केवल योग्य "प्रारब्ध" का ही स्वागत करती है. यहाँ योग्य शब्द विज्ञान के किसी भी तर्क तथा मानव बुद्धि की सीमा से बाहर है. "योग्यता" के बीज कर्मफल में ही छिपे रहते हैं और इन बीजों में लुप्त रहते हैं मानव के पूर्व जन्मों के वे श्राप अथवा वरदान, जिन्हे अपनी चेतना में समेटे आत्मा इस शरीर में जन्म लेती है.

किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में वरदान धनयोग, राजयोग, महापुरूष योग आदि कईं प्रकार के योगों के रूप में उभरता है तथा अपनी दशा अनुसार व्यक्ति की दृष्टि, बुद्धि, विवेक तथा पुरूषार्थ को सफलता, सम्पन्नता, ऎश्वर्य, सुख तथा यश-मान, प्रसिद्धि की ओर अग्रसर करता है. दूसरी ओर किसी की जन्मकुंडली में श्राप अद्भुत रूप से उसके जीवनकाल में किए जा रहे क्रियामान प्रयत्नों(कर्मों) में अवरोध, निराशा, हताशा व दु:ख का विष घोलता रहता है.
यही एक जटिल रहस्य है, जो हमें बताता है कि क्यों हममें से कुछ लोग औरों की अपेक्षा अधिक भाग्यशाली, सफल व सुखी जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं, कुछ थोडे से प्रयत्न से ही अचानक सफलता की सीढियाँ चढ जाते हैं----जब कि कुछ अत्यधिक संघर्ष के बावजूद दयनीय तरीके से विफल रहते हैं. किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में ये श्राप अधिकतर उसके कर्म एवं भाग्य भाव को बाँधकर अनिष्ट, अरिष्ट तथा तरह तरह के भय के रूप में उजागर होते हैं, जो उस व्यक्ति के इच्छा क्षेत्र में खलबली मचाए हुए उसे संसार के तमाम सुखों से वंचित रखते हैं.
प्रारब्ध भले ही जीवन की विवशता हो, परन्तु पूर्व जन्म के अधिकतर दोषों, अपराधों यथा किन्ही श्राप आदि से व्यक्ति उपासना, प्रायश्चित कर्म के माध्यम से मुक्ति अवश्य प्राप्त कर सकता है.

पूर्वजन्मकृ्त किसी श्रापादि जन्य दुष्प्रभाव से मुक्ति का सहज उपाय :-

प्रत्येक महीने में कृ्ष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि, जिसे कि मास-शिवरात्रि भी कहा जाता है. वर्षप्रयन्त यदि उस दिन उपवास रख, शिवलिंग पर चन्दन, जल, दूध, शहद,व बेलफल अर्पित करने तथा स्व इच्छित संख्या में " ॐ ह्रीं नम: शिवाय ह्रीं ॐ " का जाप किया जाए. तत्पश्चात त्रिधातु (सोना, चाँदी, ताँबा मिश्रित) का छल्ला अनामिका अंगुली में धारण करें एवं रात्रि समय सोने से पूर्व कुछ समय जाने अनजाने में किए गए किन्ही अपराधों की क्षमाप्रार्थना कर श्री महामृ्त्युंजय मन्त्र का जाप किया जाए तो पूर्वजन्मकृ्त कईं प्रकार के दोषों से सहज ही मुक्ति प्राप्त की जा सकती है.