ये कहना कितना सत्य है कि "समस्या है तो उसका समाधान भी है"

उपाय क्या होते हैं ?. जो लोग ऎसा सोचते हैं कि मन की कैसी भी इच्छाओं की पूर्ति हेतु ज्योतिषीय उपायों का आश्रय लिया जा सकता है तो उन्हे अपने दिमाग से इस ख्याल को बिल्कुल सिरे से निकाल देना चाहिए. आप कहेंगें कि तो फिर उपाय किस लिए किए जाते हैं?----उपाय सिर्फ इसलिए किए जाते/जा सकते हैं कि आपके कर्मफल के रूप में जो कुछ भी आपके प्रारब्ध में है किन्तु किन्ही कार्मिक दोषों के कारण वो समयानुरूप आपको मिल नहीं पा रहा, वो आपको प्राप्त हो सके. उसकी सुगमता की खातिर,इसके अतिरिक्त नहीं. अब आप के मन में यह ख्याल आएगा की मनुष्य तो स्वतंत्र है फिर ज्योतिषी उसकी कुंडली से उसके भाग्य का सीमा निर्धारण कैसे कर सकता है? इसे समझने के लिए आप "कर्म सिद्धान्त और भारतीय वैदिक ज्योतिष" नामक हमारे इस पूर्वलिखित आलेख को पढ सकते हैं.
अब बात करते हैं उपायों की तो, जीवन की समस्याओं की भान्ती ही उपाय भी दृ्ष्ट एवं अदृ्ष्ट भेद से दो प्रकार के होते हैं. इनमें से दृ्ष्ट उपायों को ग्रह निवारण तथा अदृ्ष्ट उपायों को प्रायश्चित कहते हैं.
ग्रह निवारण भी तीन प्रकार के होते हैं------(1) दैव (2) युक्ति एवं (3) सत्य. वैदिक ज्योतिष के सिद्धान्तानुसार जीवन में दु:ख, भय, कष्ट, हानि-परेशानी इत्यादि या कहें कि जीवन की प्रत्येक समस्या के पीछे सिर्फ एकमात्र कारण होता है----हमारे पूर्वार्जित अशुभ कर्म. अब वो कर्म चाहे इस जन्म के हों अथवा पूर्व के किसी जन्म के. इन अशुभ कर्मों के फलस्वरूप ही जीवन में विषमताओं का सामना करना पडता है,जिसे साधारण शब्दों में दैव की प्रतिकूलता भी कहा जाता है. अत: इस प्रतिकूलता को दूर करने के लिए रत्न धारण,सम्बंधित दोषकारक ग्रह का दान,एवं औषधी स्नान जन्य जो भी उपाय किए जाते हैं,वे दैव श्रेणी में आते है.
युक्ति में समस्या को उत्पन करने वाले हमारे कार्मिक दोषों तथा दोषों को बढाने वाले तत्वों से दूरी, उनसे परहेज का विचार किया जाता है.
जिस विधि से मन को अनर्थों की ओर जाने से रोक पर दु:खों की आत्यन्तिक निवृ्ति का प्रयास किया जाता है, उसे सत्य की श्रेणी में रखा जाता हैं. योग,समाधि,तप,एवं दर्शन---ये सब इसी विधि के अंग हैं.
अब बात करते हैं प्रायश्चित की,तो प्रायश्चित भी तीन प्रकार के होते हैं-----(1) अन्तर्मार्जन (2) बहिर्मार्जन एवं (3) धर्मानुष्ठान. पूर्वार्जित अशुभ कर्मों के प्रभाव से दूषित अन्त:करण की शुद्धि के लिए किए जाने वाले मन्त्रजाप एवं ध्यान आदि को अन्त:मार्जन कहते हैं. शारीरिक, मानसिक शुद्धि के लिए किए जाने वाले तीर्थ स्नान,मार्जन इत्यादि को बहिर्मार्जन कहा जाता हैं. अन्त: मार्जन एवं बहिर्मार्जन की क्रिया से हमारा अन्त:करण एवं शरीर पूर्वार्जित एवं तात्कालिक अशुभ कर्मों के दूषित प्रभाव से मुक्त हो जाता है. अब जो दैव (भाग्य) को अनुकूल बनाने की प्रक्रिया है----वो है धर्मानुष्ठान. जैसे खून की अत्यधिक कमी वाले किसी रोगी को तुरन्त खून चढाना आवश्यक हो जाता है, उसी प्रकार भाग्य की प्रतिकूलता या अनुकूलता दोनों प्रकार के व्यक्तियों को धर्मानुष्ठान आवश्यक होता है. हवन, पूजन, तर्पण, प्रार्थना आदि ये सभी धर्मानुष्ठान के अंग हैं, जो कि नवीन भाग्य का सृ्जन कर वर्तमान एवं भविष्य में आने वाले दु:खों,कष्टों,विघ्नों,समस्याओं के सामने ढाल बन कर खडे होते हैं.
इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र के बहुमूल्य सिद्धान्तों द्वारा अन्वय-व्यतिरेक कार्य-कारण जन्य प्रणाली द्वारा मनुष्य के जीवन में आने वाली समस्यायों का अवलोकन किया जा सकता है. उसके साथ ही जीवन की किसी समस्या,उसकी निवृ्ति तथा उनकी साध्यासाध्यत्व आदि के बारे में जानकर उनका सफलतापूर्वक निवारण किया जा सकता है....यानि कि------"समस्या है तो उसका समाधान भी है"...किन्तु सिर्फ एक सीमा तक क्यों कि प्रारब्ध का संसार में किसी के पास भी कोई समाधान नहीं होता......