कर्म सिद्धान्त और भारतीय वैदिक ज्योतिष

भारतीय वैदिक ज्योतिष का एकमात्र रहस्य यह है कि यह शास्त्र चिरन्तन और जीवन से सम्बद्ध सत्य का विश्लेषण करता है. संसार के समस्त शास्त्र जहाँ जगत के किसी एक अंश का निरूपण करते हैं,वहीं वैदिक ज्योतिष शास्त्र आन्तरिक एवं बाह्य दोनों जगतों से सम्बंधित समस्त ज्ञेयों का प्रतिपादन करता है. इसका सत्य दर्शन के समान जीव और ईश्वर से या विज्ञान के समान पदार्थ के घनत्व-तापमान आदि से ही सम्बंद्ध नहीं है,अपितु यह उससे कहीं आगे का भाग है. मानव के समक्ष जहाँ दर्शन एवं भौतिक विज्ञान नैराश्यवाद,वैराग्य अथवा भयोत्पादन की धूमिल रेखा अंकित करता है,वहाँ ज्योतिष उसे कर्तव्य क्षेत्र में ला उपस्थित करता है. साथ ही भविष्य को अवगत करा कर अपने कर्तव्यों द्वारा उसे अनुकूल बनाने के लिए ज्योतिष ही प्रेरणा देता है. यही प्रेरणा प्राणियों के लिए दु:ख-विघातक और पुरूषार्थ साधक होती है.
वैदिक ज्योतिष और कर्म सिद्धान्त के आपसी गहन सम्बन्ध की बात की जाए तो,उसके लिए सबसे पहले तो बताना चाहूँगा कि सम्पूर्ण ज्योतिष शास्त्र सिर्फ इसी कर्म-सिद्धान्त की भित्ति पर खडा है.बल्कि यूँ कहें कि कर्म चक्र का ये सिद्धान्त ही तो इस शास्त्र की आत्मा है.यदि इस आत्मा को इससे विलग कर दिया जाए तो फिर शेष रह जाता है------लाल किताब,काली किताब,सुनहरी किताब और अलाणा ज्योतिष-ढिमकाणा ज्योतिष के रूप में इसका निर्जीव शरीर.और एक मृ्त शरीर सिवाय उस पर पलने वाले जीवों के उदर भरण के, किसी का भला क्या हित साध सकता है.
जो विद्वान इस विद्या के मर्म को जानते है, इसके गहन तत्वों को आत्मसात कर चुके है, वो भलीभान्ती जानते है कि इस आदिकालीन शास्त्र के प्रवर्तक ऋषियों-मुनियों,महर्षियों नें कहीं भी किसी ऎसे निर्दयी विधाता की सत्ता की कल्पना नहीं की,जो जैसे चाहे,जब चाहे,मनुष्य के साथ खेल खेलता रहे. इसके विपरीत यहाँ तो स्पष्ट शब्दों में घोषणा की गई है,कि इस ब्राह्मंड में घटने वाली प्रत्येक घटना एक सुनियोजित,सुनिश्चित नियम द्वारा बँधी है और वो नियम है---कर्म सिद्धान्त. इन्सान को उसके वर्तमान जीवन में जो कुछ भी मिल रहा है,कर्म के नियमों द्वारा सुनिश्चित व सुनियोजित है.एक बार कर्म करके उसका फल तो आपको मिलेगा ही. यद्यपि इन्सान कर्म करने या न करने में अपनी स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति का प्रयोग कर सकता है. किन्तु जब एक बार कर्म कर दिया गया,तो फिर उसका फल मिलने से आपको इस सृ्ष्टि की कोई ताकत नहीं रोक सकती----स्वयं विधाता भी नहीं. उसके बाद कर्म के अनिवार्य फल से बच निकलने का कोई मार्ग नहीं है. हाँ, इन्सान अपनी स्वतन्त्रबुद्धि द्वारा फल की अनुभूति में बहुत कुछ अँशों तक तारतम्य उत्पन कर सकता है,और सतत अभ्यास एवं प्रयास द्वारा अपना भविष्य बना सकता है. एक प्रकार से कहें तो वो अपने भाग्य का सृ्जन कर सकता है........

"कर्म-सिद्धांत" की इस श्रृंखला के पूर्व प्रकाशित आलेखों की क्रमबद्ध सूची:----
1.कर्म सिद्धान्त (The Theory of Karma)
2.कर्म चक्र, भाग्य और आधुनिक विज्ञान(The Wheel of karma, Destiny and the modern science)
3.कर्म, भाग्य अथवा पुरूषार्थ---एक समस्या:
4.जो काम होना ही है, हम चाहें न चाहें, भाग्य में लिखा ही है तो फिर पाप क्या और पुण्य क्या ???
5.इन्सान कर्मों के इस चक्र में किस कारण से उलझता है ?
6.कर्मों की इस घुम्मनघेरी से निकला जाए भी तो कैसे ?