कर्मों की इस घुम्मनघेरी से निकला जाए भी तो कैसे ?

बहुत से लोग ये समझते हैं कि कर्म का सिद्धान्त भाग्यवाद और पूर्वनिहित आवश्यकता पर आश्रित है और इसी कारण यह व्यक्तिगत विकास के लिए कोई अवसर नहीं रहने देता. लेकिन हकीकत में ये मिथ्या धारणा कुछ अंशों में कर्मवाद से अनभिज्ञता पर आश्रित है. यह तो मानना ही पडेगा, कि यह संसार या तो नियमबद्ध सृ्ष्टि है या उच्छ्रंखल घपला. यह नहीं हो सकता कि इसका संचालन कुछ तो नियमपूर्वक हो, और कुछ आकस्मिक और नियमरहित हो. विचारवान लोगों की अनेक पीढियों के अनुभव को ध्यान में रखते हुए एक बुद्धिसम्पन्न व्यक्ति को समाधान हो जाना चाहिए कि संसार और जीवन की क्रियाएं सुविशेष नियमों के नियन्त्रण में हैं. वस्तुत: इस ब्राह्मंड में दैवयोग या आकस्मिक घटना नाम की कोई चीज नहीं है. यह तो हमारी अज्ञानता, कमजोरी या उपेक्षावृ्ति को छुपाने का सिर्फ एक सहज साधन भर है.
इससे पूर्व के आलेख में हम बात कर रहे थे कि मानसिक आवेग ही कर्मबन्धन का कारण बनते हैं. आवेगों से ही कर्मों का बन्धन चलता है, आवेग ही कर्म-चक्र के मूल स्त्रोत हैं. इस चक्र में से निकलने का एकमात्र रास्ता आवेगों में से निकल जाना ही है. उद्वेग जो हैं---वो वास्तव में इन्सान को अन्धा बना देता है, उसकी स्वतन्त्रता को उससे छीन लेता है. उस समय वो स्वयं कुछ नहीं करता अपितु परिस्थितियाँ उसे नचाती हैं,कार्य-कारण की श्रृंखला में उसकी छीछालेदार होती है. उद्वेग के पीछे तो पशु-पक्षी इत्यादि भोग योनि के जीव चलते हैं,जब कि इन्सान है कर्म योनि का जीव---जिसका उदेश्य मानसिक उद्वेग काम-क्रोध आदि में से निकलकर तर्क के,बुद्धि के,सोच-समझ के क्षेत्र में आ जाना है,अंधी शक्तियों के थपेडे खाने के स्थान में मनचाहा संसार बनाना है.पशुआदि योनियों में कर्म-कारण के नियम के अनुसार चलता है. उस योनि में जो होगा वो अटल नियमानुसार होगा. जब कि इन्सान के साथ ऎसा नहीं है---यहाँ तो मानसिक उद्वेग भी प्रेरक कारण हो सकते हैं. इन्सान इन उद्वेगों को मसल भी सकता है,बुद्धि से,तर्क से,सो़च-समझ से भी काम कर सकता है. यहाँ हमारे सामने दो रास्ते सदैव खुले रहते हैं. एक रास्ता तो वह है जो कार्य-कारण का अवश्यंभावी परिणाम है, जो कि मानसिक विकारों का रास्ता है,कर्म बन्धन में बँधने का रास्ता है. दूसरा,अपनी स्वतन्त्रता के कारण कार्य-कारण की श्रृंखला को तोडकर,मानसिक उद्वेगों के पीछे चलने के स्थान पर उन्हे बुद्धि और तर्क के पीछे चला कर एक बिल्कुल नए रास्ते को भी पकड सकता है.प्रश्न सिर्फ एक ही रह जाता है कि मानसिक उद्वेगों को हम जीत सकते हैं या नहीं ? कहीं ये पिछले जन्म के ही अमिट बन्धन तो नहीं ?. दरअसल ये हमारे स्वयं के ऊपर निर्भर है कि हम अपने उद्वेगों को दबाएं चाहे न दबाएं---ये हमारी अपनी स्वतन्त्रता है. आप देखिए, कि आप क्रोध में हैं, क्रोध का विश्लेषण करने लगें----क्या ठीक है या गलत---इन बातों पर सोचने लगें तो क्रोध एकदम काफूर हो जाता है. प्रत्येक मानसिक उद्वेग की यही अवस्था है. मानसिक विकार के बादल हम पर तभी तक छाए रहते हैं, जब तक हम बुद्धि के प्रकाश से उन्हे छिन्न भिन्न नहीं कर देते. जहाँ बुद्धि की आँख से देखा वहीं उद्वेग समाप्त हो जाता हैं. हम कर्म करें तो इस प्रकार से करें कि जिससे प्रतिक्रिया उत्पन न हो. प्रतिक्रिया का आधार ही मानसिक उद्वेग है. काम-क्रोध-लोभ-मोह के आवेश में जो कर्म किया जाएगा उसी की तो प्रतिक्रिया होगी. हम क्रोध में किसी को मारेंगें तो वही बदला लेने के लिए हाथ चलाएगा, प्रेम से मारने से भला कौन थप्पड का जवाब थप्पड से देता है ?. काम काम को उत्पन करता, क्रोध क्रोध को उत्पन करता है, लोभ लोभ को उत्पन करता है और मोह मोह का जन्मदाता है----इसी से चक्र चलता है. सकामता के सामने निष्कामता खडी हो जाए, क्रोध के सामने अक्रोध खडा हो जाए, लोभ के सामने अपरिग्रह और त्याग खडा हो जाए, मोह के सामने वैराग्य खडा हो जाए तो कर्मों का ये चक्र अपने आप टूट जाता है, अगला सिलसिला बनने ही नहीं पाता. प्रत्येक विकार अगले कर्म को उत्पन कर देता है, सिलसिले को बढा देता है. सनातन संस्कृ्ति का प्रत्येकशास्त्र, प्रत्येक धर्मग्रन्थ अहिँसा, अक्रोध, त्याग, वैराग्य इत्यादि सदगुणों की ओर इसीलिए तो मानव को प्रेरित करता हैं, क्यों कि ये ऎसे कर्म हैं जो कर्म के शैतान की आंत की तरह एक के बाद निकलने वाले दूसरे और दूसरे के बाद तीसरे कर्म को शुरू में ही काट डालते हैं. काम-क्रोध-अहंकार जैसे विकारों में अंधापन उनका आवश्यक सहचरी गुण है. जहाँ बुद्धि या तर्क की आँख खुली नहीं कि वहीं इन्सान को अंधा बनाने वाले ये मानसिक विकार समाप्त हो जाते हैं. हमारी इस सनातन संस्कृ्ति का प्रत्येक शास्त्र एक स्वर होकर एक ही पुकार से मनुष्य को जगा रहे हैं-----उतिष्ठ जागृ्त ! उठो जागो, क्यों कि आदमी से घनचक्कर बनने की जिस घुम्मनघेरी में आकर हम फँस चुके हैं, उसमें से निकलने का एकमात्र यही रास्ता हमारे पास है--अन्य नहीं!!!
क्रमश:-----
आगामी पोस्ट:-- इस लेखमाला का अन्तिम भाग------वैदिक ज्योतिष और कर्मसिद्धान्त
"कर्म-सिद्धांत" की इस श्रृंखला के पूर्व प्रकाशित आलेखों की क्रमबद्ध सूची:----
1.कर्म सिद्धान्त (The Theory of Karma)
2.कर्म चक्र, भाग्य और आधुनिक विज्ञान(The Wheel of karma, Destiny and the modern science)
3.कर्म, भाग्य अथवा पुरूषार्थ---एक समस्या:
4.जो काम होना ही है, हम चाहें न चाहें, भाग्य में लिखा ही है तो फिर पाप क्या और पुण्य क्या ???
5.इन्सान कर्मों के इस चक्र में किस कारण से उलझता है ?