इन्सान कर्मों के इस चक्र में किस कारण से उलझता है ?

म कर्म के चक्र में क्यों उलझते हैं ? कर्मों के इस चक्र का जो वास्तविक कारण है---वो है आवेग. इस बात को थोडा विस्तार से समझने की जरूरत है. मान लीजिए हमने किसी की कोई वस्तु चुरा ली,उसने हमें पकड लिया,उसे गुस्सा आया,उसने हमें थप्पड जड दिया,हमने बदले में उसे मारा,उसे और क्रोध आया----चक्र चलता गया,चलता गया और न जाने कहाँ जाकर समाप्त होगा. प्रश्न यह है कि क्या हम इस अवश्यंभाविता और चक्र को कहीं काट भी सकते हैं या नहीं? हमारी सनातन संस्कृ्ति की विचारधारा यह है कि हम इसे शुरू में भी काट सकते थे,बीच में भी काट सकते हैं,अन्त में भी काट सकते हैं---जब चाहें इस चक्र में से बाहर निकल सकते हैं. इसलिए निकल सकते हैं क्यों कि हम कोई ईंट पत्थर तो हैं नहीं, चेतन प्राणी हैं,प्रकृ्ति तत्व नहीं आत्म तत्व हैं..ओर स्वतन्त्रता तो आत्म-तत्व का जन्मसिद्ध गुण है. जब तक हम-आप अपने स्वात्म को भूले हुए हैं तभी तक इस उलझन में फँसे हुए हैं. यह चक्र चला कैसे ?. हमने किसी की चीज चुराई थी. अगर हम उसे न चुराते तो भला यह चक्र कैसे चलता ? चुराने पर जब उसने हमें मारा तब हम गुस्से में आकर प्रतिक्रिया न करते, अपनी भूल/अपराध को स्वीकार कर लेते, यह चक्र कैसे चलता ? चक्र चलते चलते किसी समय भी हम गुस्सा छोड सकते थे,अपराध स्वीकार कर सकते थे,क्षमा माँग सकते थे----इसका अर्थ यह हुआ कि किसी समय भी हम कर्मों की इस अवश्यंभाविता और उसके चक्र में से निकल सकते थे.
अब कोई भाग्यवादी ऎसा भी कह सकता है कि जिस समय हमने पहले पहल चीज चुराई थी, उस समय ही हम चोरी करने में स्वतन्त्र नहीं थे, बल्कि कर्मों के अनुसार चोरी करना तो हमारे भाग्य में लिखा था, यह विधि का विधान था जो टल ही नहीं सकता था. दरअसल ऎसा कुछ भी नहीं हैं. यह तो हम देखते हैं,अनुभव करते हैं कि क्रोध हमें आता है, हम चाहें तो क्रोध को दबा भी सकते हैं. लालच हमें पराभूत कर देता है, हम चाहें तो लालच पर काबू भी पा सकते हैं. बदले की भावना सिर पर सवार हो उठती है, लेकिन चाहें तो असल भावना से ऊपर भी उठ सकते हैं. इस बात को खूब अच्छी तरह से समझ लेने की आवश्यकता है कि कर्म-चक्र चल पाने का कारण भौतिक नहीं, आध्यात्मिक है. काम-क्रोध-मोह-लोभ जन्य अपनी दुर्बलताओं के कारण हम कर्म के चक्र को चलने देते हैं. अपनी इन दुर्बलताओं पर काबू पाना ही कर्म के इस चक्र को न चलने देने का एकमात्र उपाय है. सनातन संस्कृ्ति यही तो कहती आई है कि काम-क्रोध-लोभ-मोह पर विजय पा लिया तो कर्म का बंधन अपने आप कट जाता है---और इन पर विजय पाना तो हमारे अपने हाथ में हैं....लेकिन असली समस्या तो यही है कि इन पर काबू पाना भी तो कोई हँसी खेल नहीं हैं. जीवन की अधिकाँश अवस्था तो इन्ही के वश में रहते गुजर जाती है.........
 चलिए एक ओर उदाहरण आपको देता हूँ---मान लीजिए हम बैठे कोई लेख लिख रहे हैं, बडी तन्मयता के साथ, दत्तचित होकर. इतने में धर्मपत्नि नें आकर पुकारा कि आईये खाना खा लीजिए. हम झुंझला उठे, क्रोध से भर गए---इसलिए कि उसे इतना भी ख्याल नहीं कि ऎसे समय जब विचारों की धारा एक खास दिशा में बह रही है, तब बीच में उस श्रृंखला को न तोडे. हमने कहा चुप रहो जरा काम करने दो. हमारे क्रोध को देखकर उसे क्रोध आया, उसने कहा चुप कैसे रहें खाना ठंडा हो रहा है, पहले खा लीजिए. हमने मना कर दिया----बस तूँ तूँ मैं मैं का सिलसिला चल पडा, पति-पत्नि में लडाई हो गई. घंटों एक दूसरे से नहीं बोले. यह एक छोटे से कर्म चक्र का दृ्ष्टान्त है. अगर हम उठकर पहले भोजन कर लेते..तो तूं-तूँ-मैं मैं का सिलसिला न चलता. अगर शान्ती से कह देते, अच्छा दो चार मिन्ट में आते हैं तब भी मामला आगे न बढता. चक्र को चलने देना, न चलने देना अपने हाथ में था. ऎसी घटनाएं हर व्यक्ति के जीवन में हर रोज घटित होती हैं. मानसिक आवेग से कर्म का छोटा सा चक्र बना ही रहता है. इस आवेग में से निकल कर काम करना अपने ही हाथ में होता है लेकिन हम जरा जरा सी बात पर लडते हैं, झगडते हैं, एक दूसरे से मनमुटाव, गाली-गलौच अभद्रता पर उतर आते हैं---और कर्म का चक्र लम्बा होते होते कभी कभी बहुत बडा हो जाता है. पिछले दिनों अखबार में पढा कि सिर्फ एक दस रूपए के लेन-देन की खातिर किसी व्यक्ति नें झगडे में सामने वाले का कत्ल कर डाला. एक छोटे से कर्म का इतना भयानक चक्र चल पडा कि दस रूपए से कत्ल और कत्ल से पुलिस, कानून,सजा...चलते चलते न जाने कितने बरसों ये चक्र पीछा नहीं छोडने वाला. सारा सवाल सिर्फ मानसिक आवेगों में से निकलने का है. इसके लिए प्रकृ्ति नें हमें बुद्धि प्रदान की है ताकि सोच समझकर, उचित-अनुचित का विचार कर अपने स्वतन्त्र कर्तृ्व्य को जगाए रखें---मन के आवेगों से अंधा होकर न चलें.
"कर्म-सिद्धांत" की इस श्रृंखला के पूर्व प्रकाशित आलेखों की क्रमबद्ध सूची:----
1.कर्म सिद्धान्त (The Theory of Karma)
2.कर्म चक्र, भाग्य और आधुनिक विज्ञान(The Wheel of karma, Destiny and the modern science)
3.कर्म, भाग्य अथवा पुरूषार्थ---एक समस्या:
4.जो काम होना ही है, हम चाहें न चाहें, भाग्य में लिखा ही है तो फिर पाप क्या और पुण्य क्या ???