जो काम होना ही है, हम चाहें न चाहें, भाग्य में लिखा ही है तो फिर पाप क्या और पुण्य क्या ???

कर्म सिद्धान्त की साधारण ऊपरी स्तर की सुनी सुनाई जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी इतना तो जानता ही है कि कर्मों की तीन श्रेणियों हैं----संचित कर्म,क्रियामाण कर्म और प्रारब्ध..........यानि कि जो कर्म अब हम लोग कर रहे हैं वे वर्तमान में क्रियामाण हैं,जो बिना फलित हुए अर्थात जिनका अभी हमें कोई फल प्राप्त नहीं हुआ है वो हैं हमारे संचित कर्म इन्ही संचित कर्मों में से जो पक कर फल देने लगते हैं उन्हे प्रारब्ध(Destiny) कहा जाता हैं। इससे पूर्व के लेख में हम बात कर रहे थे कि क्या हम अपने प्रारब्ध (भाग्य) से पिछले कर्मों के बंधन में इस तरह जकडे हुए हैं कि जो भाग्य में लिखा गया, वो होना ही है. मस्तक में जो रेखा खिँच गई, वो अमिट है या जीवन में पुरूषार्थ का, स्वतन्त्रता का भी कोई स्थान है कि नहीं ? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें सर्वप्रथम क्रियामाण(वर्तमान) कर्म की वास्तविकता को समझना होगा......
क्रियामाण कर्म की वास्तविकता---
कर्म सिद्धान्त की वास्तविक समस्या क्रियामाण कर्म की है. जो कर्म हम इस समय करने जा रहे हैं वह बिल्कुल नया कोई स्वतन्त्र कर्म है, या यह किसी पिछले कर्म का फल है---यह किसी कारण का कार्य है या एक नया कारण है जो किसी अगले कार्य को उत्पन करने वाला है ? इसी एक प्रश्न के हल में "भाग्य" या "पुरूषार्थ" की समस्या का हल छिपा है.
इस प्रश्न के दो उत्तर तो स्पष्ट हैं. एक तो यह कि "क्रियामाण" कर्म कोई स्वतन्त्र कर्म नहीं है. कार्य-कारण( Cause and Effect) की अनन्त काल से चली आ रही लडी की यह एक कडी है, दिखने को यह भले एक स्वतन्त्र कर्म दिखता है, परन्तु वास्तव में हमारे पिछले किए गए कर्म का फल है---यह ऎसा ही होता है,इससे भिन्न नहीं हो सकता. इसीलिए "कर्म का सिद्धान्त" मानने वाले प्राय: भाग्यवादी हो जाते हैं,जो कुछ हो रहा है उसे अमिट, अवश्यंभावी मानते हैं, उसमें किंचित भी परिवर्तन नहीं हो सकता---वो लोग कुछ ऎसा मानते हैं. इस प्रश्न का एक दूसरा उत्तर यह है कि "क्रियामाण" कर्म एक स्वतन्त्र कर्म है,हम जो चाहे कर सकते हैं,किसी पिछले बन्धन से हम बँधें नहीं. अब आप देखिए कि इस बात को मानने से कार्य-कारण के नियम को छोडना पडता है.
इन दो उत्तरों के अतिरिक्त इस प्रश्न का एक तीसरा उत्तर भी है. तीसरा उत्तर यह है कि कार्य-कारण के नियम और कर्म के सिद्धान्त में जहाँ समानता हैं,वहीं उस समानता के साथ एक भिन्नता भी है. कार्य-कारण का नियम(Law of Cause and Effect) भौतिक जगत का नियम है---आग,हवा,पानी का नियम है,कर्म का नियम आध्यात्मिक जगत का नियम है--उस जगत का नियम है जहाँ "चेतना"(Conscious) नाम की एक नवीन सत्ता क्रिया करने लगती है. भौतिक जगत कोई स्वतन्त्र जगत नहीं है,दूसरी किसी शक्ति के अधीन है. अब यह दूसरा कौन है ?------अब कोई कहता है कि ईश्वर है,कोई कहता है नियम है----परन्तु जो कुछ भी हो,भौतिक जगत स्वतन्त्र नहीं है. ईश्वर मानो तो भी और न मानो तो भी---यह कार्य-कारण के महान नियम के अधीन है,इससे इधर-उधर नहीं हो सकता. जब कि हमारे शरीर के भीतर जो आत्मा है, उसके साथ यह बात नहीं है. आत्मा भौतिक तत्वों से एक भिन्न तत्व है. आत्म-तत्व में स्वतन्त्रता की अनुभूति प्रत्येक व्यक्ति को होती है. मान लीजिए मैं चारों तरफ से किसी बँधन में बँधा हूँ---ये एक सत्य हुआ लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि मैं अनुभव करता हूँ कि मैं इन बँधनों में से निकल भी सकता हूँ. हरेक प्राणी हर बँधन को तोडने के लिए हर समय झटका दिया करता है,वो स्वतन्त्र होना चाहता है, बँधा रहना नहीं चाहता. बँधन को महसूस कर चाहे जिस किसी उपाय से, अब सफल होना न होना एक अलग बात है, लेकिन उस बँधन को काटने का अपनी ओर से हरसंभव प्रयास करता है. मनुष्य ही नहीं,पशु-पक्षियों तक में बंधन से निकल जाने की एक प्रबल भावना रहती है. आग,हवा,पानी इत्यादि भौतिक जगत के किसी तत्व में तो ऎसा नहीं. वे तो कार्य-कारण के नियम से ऎसे जकडे हुए हैं कि करोडों वर्षों से सूर्य जस का तस अपनी परिधि में चक्कर लगा रहा है,चाँद,तारे,नक्षत्र बिना इधर-उधर हिले अब्द वर्षों से अपने अपने कर्म में जुटे हुए हैं.उनकी विशेषता ही उनका कार्य-कारण के नियमों में बँधा रहना है. परन्तु मनुष्य क्या कीट-पतंगें,पशु-पक्षी इत्यादि तक जब से सृ्ष्टि में आए तभी से बँधन से विद्रोह कर रहे हैं, इनके गलों में बडे बडे मजबूत रस्से पडे हैं,परन्तु उन रस्सों को तोडने के लिए लगातार झटके पर झटके दिए जा रहे हैं. इसका कारण क्या है ? इसका कारण सिर्फ यही है कि यद्यपि हमारी आत्मा बंधन में है, तथापि इसका स्वभाव बँधन में पडे रहने का नहीं हैं. यह आत्म-तत्व बँधन में आया है बँधन से निकलने के लिए,कर्म में फँसा है कर्म को काटने के लिए,कार्य-कारण में उलझा है--कार्य-कारण की गाँठ को खोलकर उसमें से स्वतन्त्र हो जाने के लिए.
कार्य-कारण तथा कर्म में यही भेद है. कर्म इसमें संदेह नहीं कि---कार्य-कारण का ही नियम है,परन्तु भेद सिर्फ इतना है कि "कार्य-कारण" जड जगत का और "कर्म" चेतन जगत का नियम है. कार्य कारण एक तरह से अन्धा प्राकृ्तिक नियम है,जब कि "कर्म" पूरी तरह से नेत्र सम्पन्न. प्रकृ्ति का तो स्वभाव ही कार्य-कारण के बँधन में पडे रहने का है,जब कि आत्म-तत्व का स्वभाव है बँधन से निकलने का,इस कार्य-कारण और कर्मों की भारी भारी बेडियों को काट देने का. अगर आत्म-तत्व एक स्वतन्त्र तत्व न होता तब तो प्रकृ्ति की तरह यह भी कार्य-कारण की बेडियों में जकडा रहता---तब जो हो रहा है वो अवश्यंभावी होता. परन्तु ऎसा नहीं है यह प्रकृ्ति से भिन्न एक स्वतन्त्र तत्व है. यह जब तक प्रकृ्ति के साथ अपने को एक किए बैठा है तब तक कार्य-कारण की उलझन में पडा हुआ है. जहाँ इसनें अपने स्वरूप को पहचाना नहीं कि वहीं यह कर्मों के बँधन से साफ निकलकर बाहर आ खडा हो सकता है.
तो फिर स्थिति क्या हुई ? क्या क्रियामाण कर्म---अवश्यंभावी हैं,एक चक्र के समान है यानि जो कुछ हम करने जा रहे हैं वो पहले ही तय हो चुका है,हम उसे करने के लिए बाध्य है या इससे स्वतन्त्र भी हो सकते हैं. आर्य-संस्कृ्ति की जिस विचारधारा का हमने अभी ऊपर में उल्लेख किया उसके अनुसार ये दोनों ही हो सकते हैं. कर्म,कार्य-कारण का ही एक रूप हैं---इसलिए हमारे क्रियामाण कर्म(वे कर्म जिन्हे हम इस जन्म में,इस समय कर रहे हैं) हमारे पिछले किए कर्मों का फल भी हो सकते हैं,कार्य-कारण की श्रंखला में एक कडी ही हो सकते हैं,---और क्यों कि आत्म-तत्व की नीँव ही स्वतन्त्रता पर खडी है,इसलिए ये क्रियामाण कर्म आत्म-तत्व के इस जन्म के स्वतन्त्र कर्म भी हो सकते हैं. इन्हे पिछले जन्मों का फल या इस जन्म से स्वतन्त्र कर्म मानने से कार्य-कारण के नियम में कोई त्रुटि नहीं आती.
कर्म के सिद्धान्त को मानने में सबसे बडी निराशा की बात यह आ पडती है कि हम अपने को स्वतन्त्र कहना,पुरूषार्थ करने में अशक्त पाते हैं, सब कुछ किस्मत, भाग्य समझने लगते हैं. लेकिन जब हम आत्म-तत्व के यथार्थ स्वरूप को एक बार समझ लें तो यह निराशा जाती लगती है. आत्म-तत्व कर्मों से बँधा है, कार्य-कारण के इधर-उधर नहीं जा सकता यह बात ठीक है परन्तु यह बात भी ठीक है कि इसमें स्वतन्त्र कार्य करने की उग्र भावना भी है. यह तो सबको दिखता है जिसे किसी युक्ति से सिद्ध करने की आवश्यकता भी नहीं रहती. अगर स्वतन्त्र कार्य करने की भावना भी कर्मों का ही फल है, कार्य-कारण के नियम का ही परिणाम है--तब तो यहाँ इस विषय पर अब तक जो कुछ भी मैने लिखा है वो सब एक शब्डाम्बर मात्र रह जाता है. हमारा काम तो इतने से ही चल जाता है कि "अत्म-तत्व" सिर्फ बँधा ही बँधा न रहे, स्वतन्त्र भी काम कर सके---सिर्फ भाग्य की डोर से ही लटका न रहकर पुरूषार्थ भी कर सके.
कार्य-कारण के नियम के पीछे चलते-चलते कर्म के सिद्धान्त को जन्म देने वाली आर्य-संस्कृ्ति कर्म के विचार से इतनी परास्त नहीं हुई थी कि वह आत्म-तत्व की स्वतन्त्र क्रिया शक्ति को भूल जाती. कर्म का सिद्धान्त जहाँ आर्य-संस्कृ्ति का मूल तत्व हैं वहाँ आत्मा के स्वतन्त्र कर्तृ्व्य का सिद्धान्त भी उसका अपना ही बडा मूल तत्व है. हम बँधें हैं परन्तु बँधन काट सकते हैं, उलझें हैं परन्तु उलझनों से निकल सकते हैं, कर्म के चक्कर में आन पडे हैं परन्तु इस चक्कर में से बाहर भी आ सकते हैं. हम परतन्त्र हैं क्यों कि कर्म के अधीन हैं---परन्तु स्वतन्त्र भी हैं, कर्म के स्वामी भी हैं. प्रश्न यही है कि यह कैसे ?
यह इस प्रकार----क्रियामाण कर्म के विषय में ही तो हमें निर्णय करना है कि यह पिछले कर्मों का ही परिणाम है या इस जन्म का नया कर्म है? क्रियामाण कर्म दो तरह का हो सकता है--वैयक्तिक या सामाजिक. वैयक्तिक वह जिसका हमारे निज के साथ सम्बंध है, दूसरों के साथ कोई सम्बंध नहीं. हम खाते हैं, पीते हैं, घूमते-फिरते हैं. भूख लगी खाना खा लिया, प्यास लगी तो पानी पी लिया. इन कर्मों में भी अवश्यम्भाविता और चक्रता है परन्तु वह हमारे लिए कोई समस्या नहीं खडी करते. भूख लगने पर खाएंगें तो तृ्प्ति अवश्य होगी, पेट अवश्य भरेगा, भरा पेट अपना काम करेगा भोजन पच जाएगा तो फिर भूख लग जाएगी---इस अवश्यंभाविता के साथ यह चक्र भी चल पडेगा. परन्तु कर्म के सिद्धान्त की जो उलझन है वह यह नहीं है. उलझन कहाँ आती है ?. दरअसल उलझन आती है उन कर्मों में जिन्हे सामाजिक कहा जा सकता है. सामाजिक कर्मों से हमारा अभिप्राय उन कर्मों से है जो करते तो हम हैं परन्तु उनका सम्बंध हमारे निज से तो है ही साथ ही दूसरों से भी कम नहीं है. हमने किसी को क्रोध में मार डाला, पकडे जाने पर साफ इन्कार कर दिया. किसी की चोरी की, दुराचार किया----यह सब बातें करते तो हम हैं किन्तु इनका सम्बंध दूसरों से होता है---समाज से होता है. कर्मों के सिद्धान्त की जटिलता सामाजिक कर्मों के सम्बंध में है और एक जटिलता यही है कि ये कर्म अगर कार्य-कारण की श्रृंखला के परिणाम हैं, अगर अवश्यंभावी हैं और एक चक्र को उत्पन कर रहे हैं तो फिर भला पाप-पुण्य क्या रहा ? पाप तो पाप तब हो सकता है इसी प्रकार पुण्य भी तभी पुण्य कहा जा सकता है, जब वह जानबूझकर अपनी इच्छा से किया जाए. जो काम होना ही है, हम चाहें न चाहें, पिछले कर्मों के जोर से होना है---वह न पाप हो सकता है न पुण्य. वह तो टल ही नहीं सकता, उसमें तो हमारा कोई बस ही नहीं है. समस्या के इस बिन्दु पे पहुँचने परे आर्य-संस्कृ्ति का कहना था कि कर्म कार्य-कारण के नियम की तरह एक अन्धा नियम नहीं है. यह हवा, पानी, आग या ईंट पत्थर अचेतन का नियम नहीं बल्कि चेतन का नियम है. दीवार पर ईंट फैंक कर मारेंगें तो वह अवश्य दीवार से टकराएगी,किसी इन्सान पर फैंकी जाएगी तो वह एक ही स्थान पर खडा रहकर चोट भी खा सकता है और अपने प्रयास से बच भी सकता है.खडा रहकर दीवार की तरह व्यवहार करेगा तो अचेतन के जैसे व्यवहार करेगा. एक तरफ को हट जाएगा तो चेतन के जैसे व्यवहार करेगा.खडा रहेगा तो अवश्यंभाविता और चक्र में फँस जाएगा, हट जाएगा तो इस चक्र में से निकल जाएगा.
क्रमश:......
आगामी पोस्ट:-----क्या है कर्मों के इस "चक्र" का वास्तविक कारण ?

"कर्म-सिद्धांत" की इस श्रृंखला के पूर्व प्रकाशित आलेखों की सिलसिलेवार सूची:----
1.कर्म सिद्धान्त (The Theory of Karma)
2.कर्म चक्र, भाग्य और आधुनिक विज्ञान(The Wheel of karma, Destiny and the modern science)
3.कर्म, भाग्य अथवा पुरूषार्थ---एक समस्या: