कर्म, भाग्य अथवा पुरूषार्थ---एक समस्या:

यहूदी, ईसाई और इस्लाम--- दुनिया के ये तीनों ही धर्म ऎसे हैं जो कि कर्म के सिद्धान्त को अटल रूप में नहीं मानते. उनके अनुसार इस जन्म में ईश्वर नें आत्मा को पैदा कर दिया. किसी को तो गरीब की झोंपडी में और किसी को अमीर के यहाँ उस ईश्वर नें क्यूँ पैदा कर दिया ?---इसका विज्ञान के साथ ही इनके पास भी कोई उत्तर नहीं. इनके अनुसार इस जन्म में अच्छे कर्म करने वाले स्वर्ग चले जाएंगें और जो बुरे कर्म करने वाले हैं, उन्हे हमेशा हमेशा के लिए नरक भेज दिया जाएगा. ये लोग वर्तमान वैज्ञानिकों की तरह से जीवन का आकस्मिक उत्पन होना तो मानते हैं---भले ही ईश्वर नें उत्पन किया हो, हुआ तो यों ही, बिना हमारी जिम्मेदारी के परन्तु वर्तमान विज्ञान की तरह इस सब हिसाब-किताब को अकारण राख करके चल देना नहीं मानते. इस जन्म के कर्मों का फल स्वर्ग (जन्नत) या नरक (दोजख) मानते हैं. परन्तु इस जन्म के थोडे से कर्मों का इतना अनन्त फल भला कैसे हो सकता है ? हमने इस जन्म में कुछ अच्छे काम किए, कुछ बुरे. अगर अच्छे बुरों की अपेक्षा कुछ अधिक हो गए तो हमें हमेशा के लिए स्वर्ग मिल जाएगा, अगर कुछ कम रह गए तो हमेशा के लिए नरक में धकेल दिए जाएंगें------यह तो कार्य-कारण के नियम के विपरीत हुआ. कर्म का सिद्धान्त अगर ठीक है तो पूर्व भी मानना पडता है और पुनर्जन्म भी. यह तो हमें दिख रहा है कि अगर कार्य-कारण का नियम एक सत्य नियम है, तो कर्मों का लेखा भी एक अमिट लेखा है, यह हिसाब पीछे से चला आता है. इस जन्म  में यह हमारे हाथ में आ जाता है, और जब इस जन्म में हम जीवन के इस बही खाते को बन्द (मृ्त्यु होने पर) करते हैं, तो आगे कहीं जन्म लेने पर इसी लेने देने से अगला हिसाब शुरू करते हैं, बस एक तरह से डेबिट-क्रेडिट चलता रहता है, जब तक कि बही खाते का लेनदेन पूरी तरह से शून्य की स्थिति (मोक्ष) में नहीं पहुँच जाता. इसके अतिरिक्त कोई और अन्य कल्पना सिर्फ कार्य-कारण के नियम को छोडकर ही की जा सकती है, इसके बिना नहीं.
कर्म, भाग्य अथवा पुरूषार्थ---एक समस्या:-
तो अब फिर वही पहले वाला प्रश्न ले देकर फिर सामने आन खडा होता है, कि----क्या हम प्रारब्ध से, भाग्य से, मुक्कदर से पिछले कर्मों से इस तरह जकडे हुए हैं कि इनकी "अवश्यम्भाविता" और इनके "चक्र" में से निकल ही नहीं सकते. जो भाग्य में लिखा गया, वो होना ही है. मस्तक में जो रेखा खिँच गई, वो अमिट है या जीवन में पुरूषार्थ का, स्वतन्त्रता का भी कोई स्थान है कि नहीं ?
हमारी आर्य संस्कृ्ति नें विश्व में कार्य-कारण के व्यापक भौतिक नियम को देखकर उसी को आध्यात्मिक जगत में कर्म के सिद्धान्त का नाम दिया. कर्म के सिद्धान्त को मानने से उसके लिए पूर्वजन्म और पुनर्जन्म को मानना आवश्यक हो गया, परन्तु इनके मानने से उनके सामने एक महान समस्या उठ खडी हुई. वो ये कि इस सिद्धान्त को मानने से तो इन्सान परतन्त्र हो जाता है, उसकी अपनी कोई स्वतंत्रता ही नहीं रह जाती. जब सब कुछ पहले से ही हमारे कर्म फल के रूप में भाग्य में लिख दिया गया है तो फिर हमारे हाथ में भला क्या रह जाता है. पुरूषार्थ जैसे किसी शब्द का तो कोई औचित्य ही नहीं बचता.
भाग्य और पुरूषार्थ का कर्मों के बन्धन के साथ बँधा होना तथा स्वतन्त्र रूप से कार्य कर सकना----इन दोनों बातों की संगति समझने के लिए "कर्म" को कुछ ओर गहराई से समझने की जरूरत है. जिसके लिए, विषय पर आगे बढने से पूर्व आप इन पूर्वलिखित आलेखों पर दृ्ष्टि डाल सकते हैं.

कर्मों का विभाजन और उसका आधार
भाग्य और पुरूषार्थ का महत्व-------(आधुनिक दृ्ष्टिकोण)
क्रमश:........

आगामी पोस्ट:- क्या हम कर्म से स्वतन्त्र हो सकते हैं ?