ज्योतिष आपके भौतिक जीवन के साथ ही आध्यात्मिक जीवन का भी पथप्रदर्शक है.......

भारतीय वैदिक संस्कृ्ति में चार प्रकार के पुरूषार्थ----धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहे गए हैं. इन चारों में अन्तिम मोक्ष ही सर्वोपरी है.'मोक्ष' अर्थात आत्म तत्व का परमात्मा में मिलन. ईश्वर प्राप्ति के मुख्य साधन को यहाँ योग कहा गया है और इस योग के तीन मुख्य प्रकार हैं--ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा कर्मयोग. यूँ ऊपरी तौर पर एक साधारण दृ्ष्टि से देखने पर ये तीनों बेशक भिन्न भिन्न दिखाई पडते हों, लेकिन वास्तव में प्रत्येक योग आपस में एक दूसरे से पूरी तरह समावेशित हैं. आगे इस योग के भी 8 अंग हैं--यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा,ध्यान एवं समाधि. इनमें से प्रथम पाँच बाह्य तथा अन्तिम तीन अंतरंग कहे गए हैं. समाधि सांसारिक पदार्थों में होने से सिद्धिप्रद है और जब ये ईश्वर विषयक होती है,तो मुक्ति प्रदान करती है.
सभी जीव-जन्तुओं एवं मानव शरीर के अन्तर्गत दो प्रकार की क्रियाएँ होती हैं. एक तो अंतर्मुखी और दूसरी बहिर्मुखी. इन क्रियाओं के अंतर्गत कर्तव्य पारायणता,इच्छा,बुद्धि,नाडियाँ,व्यवधान,विचार,संकेत,सुन्दरता और विकास का क्रमश: कार्य होकर एक पूरी क्रिया संपादित होती है---इसी क्रिया को योग साधना के नाम से जाना जाता है. ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत ग्रहों के हिसाब से शनि--कर्तव्यपरायणता एवं स्थिरता, मंगल--इच्छाशक्ति, बुध--बुद्धि, बृ्हस्पति--विचार शक्ति,चन्द्रमा--संकेत,शुक्र---सुन्दरता और सूर्य--विकास एवं प्रकाश का द्योतक है. भारतीय ज्योतिष में जन्मकुण्डली के प्रथम भाव से शरीर, पंचम भाव से मन्त्र तथा नवम भाव से तप-समाधि आदि फलाफल देखा जाता है. कुण्डली के प्रथम, पंचम तथा नवम भाव मिलकर जिस त्रिकोण का निर्माण करते हैं, उसे ज्योतिष की भाषा में "आध्यात्मिक त्रिकोण" कहा जाता है. इस त्रिकोण से ही व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति का ज्ञान प्राप्त होता है.
योग साधना में तीन की प्रमुखता रहती है----आत्मा, मन और साधक. ज्योतिष में सूर्य को आत्मा एवं चन्द्रमा को मन का कारक माना गया है. यदि कुंडली में सूर्य-चन्द्र सुस्थानस्थ हों और साथ में लग्न भाव सहित तीनों का आपस में शुभ संबंध/स्थिति तो जो व्यक्ति आध्यात्म साधना के पथ पर बढना चाहता है, उसके शरीर, मन व आत्मा में एकरूपता बनी रहती है. इन तीनों की एकरूपता से ही योग-साधना में सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है---अन्यथा तो व्यक्ति का मानसिक संतुलन ही नहीं बन पाएगा, सफलता मिलना तो बहुत दूर की बात है.
सृ्ष्टि में सत्व, रज और तम---ये तीन गुण पाए जाते हैं. इन गुणों के कारण व्यक्ति द्वारा विचार, भावनाएं तथा कार्य होते हैं. इसी से प्राणियों के स्वभाव में भेद होता है. जन्मकुण्डली के योगों से पता चलता है कि व्यक्ति में किस गुण की प्रधानता है. उसी के अनुसार उसे योग मार्ग अपनाने का परामर्श दिया जाता है. ज्योतिष में सात्विक गुण बृ्हस्पति, सूर्य और चन्द्रमा दर्शाते हैं. सात्विकता का अर्थ है---शुद्ध प्रकाश ज्ञान. रजोगुण के प्रतीक बुध और शुक्र हैं जो वाणी तथा प्रेम दर्शाते हैं. तमोगुण के प्रतीक मंगल और शनि हैं जो शक्ति परिलक्षित करते हैं.
यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में बृ्हस्पति बली हो, नवम(भाग्य) भाव में स्थित हो या नवम भाव को देखे या नवमेश के नक्षत्र में स्थित हो तो सात्विक गुण की प्रधानता होती है. यदि कुंडली में चन्द्रमा भी सुस्थानस्थ हो तो उस व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति ज्ञान योग द्वारा होती है.
यदि कुण्डली में बुध और शुक्र ग्रह बली हों, इनमें से कोई भी ग्रह नवम भाव का अधिपति हो अथवा नवमेश पर दृ्ष्टि हो या नवमेश के नक्षत्र में स्थित हो तो व्यक्ति को भक्तियोग अपनाना चाहिए.
यदि कुंडली में मंगल और शनि बली हों या नवम भाव के स्वामी हों या उसे देखते हों नवमेश के नक्षत्र में स्थित हों तो ऎसे व्यक्तियों को निष्काम कर्मयोग अपनाना चाहिए.

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1. कर्म सिद्धान्त---एक विस्तृ्त विवेचन 
2. भाग्य और ज्योतिष