शारीरिक असुविधाएं तथा रोग------(ज्योतिष और रोग) भाग-2

आज हम लोगों नें स्वास्थय की समस्या को बिल्कुल टेढी खीर बना डाला है, स्वाभाविकता और सादगी तो जैसे बिल्कुल ही दूर भाग चुकी है. हम प्रकृ्ति के नियमों को न तो समझते हैं और न ही समझ कर उन्हे मानते हैं. बस हम अपनी जिम्मेदारी कभी मौसम पर, कभी जलवायु पर, कभी चिकित्सकों पर तो कभी दवाओं पर---और सब से अधिक जीवाणुओं/विषाणुओं पर डाल देते हैं.
प्रकृ्ति के नियमों के अनुरूप जीवन व्यतीत कर स्वस्थ रहना आसान है. स्वास्थय मानव शरीर की स्वाभाविक अवस्था है. मनुश्य, जैसा कि वह देखने में मालूम होता है, वैसा नहीं है. उससे कहीं ऊँचा है. वह पृ्थ्वी पर रोगी बने रहने के लिए नहीं आया है. वह स्वर्गीय है, ईश्वरीय है,दिव्य है. यदि वह अपने वास्तविक बडप्पन को समझे और उसी के अनुरूप जीवन व्यतीत करे तो वह कभी भी रोग ग्रस्त न हो. ऎसे ही जीने को जीना कहा जाता है और वैसा जीना, जिसमें हर रोज कोई न कोई रोग पीछे लगा है,मरने से भी बुरा है.
आज बनावटी सभ्यता के इस युग में प्रकृ्ति के ये नियम कहीं खो से गए हैं और किसी को समझाओ तो भी जल्दी से किसी को समझ में भी नहीं आते, या कहें कि कोई समझना ही नहीं चाहता. अगर कोई समझाने का प्रयास भी करता है तो सुनने वाले ताज्जुब करने और हँसने लगते हैं.
रोगों का कारण:-
सृ्ष्टि के प्रत्येक क्रियाकलाप की भान्ती ही रोगों के बारे में भी कार्य-कारण का सिद्धान्त काम करता है. जब रोग के सही कारण का पता चले तो ही हम उन कारणों को दूरकर रोग को जड-मूल से भगा सकते हैं. और यदि सच्चे कारण को न जाना, केवल इधर-उधर की या ऊपरी बातों को ही जानकर संतुष्ट हो गए, तो, एक के बाद एक दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा रोग बना रहेगा. और जैसा कि अब है, मैडीकल साईंस की इतनी उन्नति और गली गली में डाक्टरों की मौजूदगी के बावजूद दुनिया बीमारियों की खान बनी हुई है,और रहेगी भी.
सच पूछिए, तो सारे रोगों का एक ही कारण है----शरीर में विकार का आ जाना. मनुष्य शरीर प्रकृ्ति के नियमों के अनुसार अपने को बराबर ही साफ सुथरा और स्वस्थ रखना चाहता है. हर रोज हम देखते हैं कि शरीर के अन्दर यह क्रिया बराबर ही जारी रहती है, जिससे भीतर की गन्दगी शरीर से बाहर निकाल दी जाती है. गन्दगी दूर होने के चार ढंग या रास्ते हैं-----फेफडे से सारे शरीर की एक खास तरह की गन्दगी लेकर सांस का बाहर आना, त्वचा से पसीने के रूप में गन्दगी का बाहर निकलना, शौच और मूत्र के रूप में गन्दगी का निष्काषन. यदि इन साधारण विधियों से शरीर के अन्दर का विकार नहीं निकल पाता तो शरीर द्वारा अन्य असाधारण ढंग काम में लाए जाते हैं. इस हालत में शरीर की शक्तियाँ तेजी के साथ दूसरे ढंगों से सफाई का काम शुरू कर देती हैं. या तो शरीर के अन्दर की गर्मी ज्वर के रूप में बढकर भीतर की गन्दगी को जला देती है या कुछ दस्त ज्यादा आते हैं या ऎसी ही कोई असाधारण बात होती है, जिससे शरीर के अन्दर की सफाई हो जाती हैं. याद रहे, शरीर की रक्षा के लिए विकारों का बाहर निकल जाना आवश्यक है. इसी से जब जब भी शरीर द्वारा अन्य असाधारण ढंग से सफाई अभियान चलाया जाता है-----तभी कहा जाता है कि रोग हुआ. वैसे तो रोग का नाम ही बुरा है, लेकिन इस तरह गहराई में जाकर देखने से पता चलता है कि शरीर की गन्दगी को बाहर निकाल फैंकनें के लिए, विकारों को जला देने के लिए, प्रकृ्ति की ओर से अपनाया गया ये साधारण ढंग अपने आप में एक जबरदस्त साधन हैं.

अब जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वो ये कि शरीर द्वारा भीतरी अशुद्धियों के निष्काषण के परिणाम स्वरूप उत्पन हुई जिन स्थितियों को हम रोग कहकर पुकारते है, दरअसल ये रोग नहीं होते---ये होती हैं असुविधाएं. रोग तो वह है जो मनुष्य के किसी अंग का कार्य-संचालन रोक देता है. एक दुबला-पतला आदमी अपना कार्य करने में कुशल है. यदि उसके समस्त अंग ठीक हैं तो वह स्वस्थ है और अगर एक हष्ट-पुष्ट मनुष्य अपने अंगों का प्रयोग ठीक से नहीं कर पाता तो वह रोगी माना जाएगा.
ब्राह्मंड की भान्ती ही मानवी शरीर भी जल,पृ्थ्वी,अग्नि,वायु एवं आकाश नामक इन पंचतत्वों से ही निर्मित है और ये पँचोंतत्व मूलत: ग्रहों से ही नियन्त्रित रहते हैं. आकाशीय नक्षत्रों(तारों, ग्रहों) का विकिरणीय प्रभाव ही मानव शरीर के पंचतत्वों को उर्जस्वित करता है. इस उर्जाशक्ति का असंतुलन होने पर अर्थात जब भी कभी इन पंचतत्वों में वृ्द्धि या कमी होती है या किसी तरह का कोई "कार्मिक दोष" उत्पन होता है,तब उन तत्वों में आया परिवर्तन एक प्रतिक्रिया को जन्म देता है. यही प्रतिक्रिया रोग के रूप में मानव को पीडित करती है. एक रोग वह है,जिससे शरीर का कोई अंग सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाता. इसका समाधान करने के लिए भी कईं विज्ञान हैं,सैकडों प्रकार की औषधियाँ हैं,जिनके माध्यम से रोग मुक्त हुआ जा सकता है. परन्तु कईं ऎसे रोग भी हैं,जिनका सम्बंध आत्मा से होता है (यह विषय अत्यधिक विस्तार माँगता है, सो इसे कभी अलग से किसी पोस्ट के जरिए स्पष्ट करने का प्रयास रहेगा). उनका समाधान दवाओं तथा डाक्टरों,हस्पतालों के जरिए नहीं हो सकता. उसके लिए तो सिर्फ अपने कर्मों की शुद्धता तथा आध्यात्मिकता ही एकमात्र उपाय है.
हमारे इस शरीर की स्थिति के लिए जन्मकुंडली का लग्न(देह) भाव, पंचमेश और चतुर्थेश सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. लग्न भाव देह को दर्शाता है,चतुर्थेश मन की स्थिति और पंचमेश आत्मा को. जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में लग्न(देह),चतुर्थेश(मन) और पंचमेश(आत्मा) इन तीनों की स्थिति अच्छी होती है,वह सदैव स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है.
क्रमश:.......
आगामी भाग:- रोगों से मुक्ति एवं बचाव हेतु नितांत साधारण किन्तु रामबाण उपाय