इसमें दोष किसका ? वास्तु शास्त्र , भाग्य अथवा निज कर्म का ?

पिछली कुछ पोस्टस में आपने जाना कि मानव हित में वास्तुविद्या का कितना अधिक महत्व है.अब बहुत से लोग ऎसे भी होते हैं जो कि जीवन में वास्तु इत्यादि को कोई महत्व नहीं देते, बल्कि अच्छी-बुरी कैसी भी परिस्थिति के लिए सिर्फ निज भाग्य को ही सर्वोपरी मानते हैं. ये ठीक है कि भाग्य सर्वोपरी है, बल्कि भाग्य का महत्व तो विश्व की सभी संस्कृ्तियों में स्वीकारा गया है. चूंकि किसी भी व्यक्ति के भाग्य का निर्धारण किन्ही दैवीय शक्तियों द्वारा हमारे सौरमंडल के सूर्य चन्द्रादि नवग्रहों की रश्मियों के माध्यम से ही होता है, अत: इन पर किसी का कोई नियन्त्रण भी नहीं होता. इन कारकों का हमारे जीवन के विकास में अति महत्वपूर्ण स्थान है, परन्तु इनमें से बहुत सी विशेषताओं एवं गुणों को बदला नहीं जा सकता. यही व्यक्ति-विशेष की विशेषता के रूप में जाना जाता है.
अब अनेक व्यक्ति हैं, जो भाग्य जैसी किसी सत्ता में विश्वास नहीं करते. वो लोग अपने निज कर्म(पुरूषार्थ) को ही भाग्य निर्माता समझते हैं. परिश्रम या कर्म हमारे जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है. अब देखिए, हममें से कुछ की अभिरूचि अध्ययन में, कुछ का लगाव धन में होता है तथा कुछ ऎसे भी लोग होते हैं, जो आरामपूर्वक जिन्दगी व्यतीत करना चाहते हैं. हम अपने जीवन की धारा का प्रवाह अपने मनोवांछित मार्ग की ओर ले जाने का भरकस प्रयास करते हैं, किन्तु कोई एक ऎसी अदृ्श्य शक्ति तो है ही, जो इस प्रवाह का मार्ग परिवर्तित कर देती है. अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ती में लोग कुछ सीमा तक सफल भी होते हैं, किन्तु दुनिया में ऎसे लोगों की भी कोई कमी नहीं, जो इच्छा-पूर्ती में सफल नहीं हो पाते. ऎसे व्यक्ति अपनी असफलताओं के लिए भाग्य को दोषी ठहराने लगते हैं. वस्तुत: इसके लिए भी व्यक्ति के स्वयं के कर्म ही दोषी हैं, न कि भाग्य. भाग्य तो हमारे किए गए कर्मों का प्रतिसाद मात्र है. कर्म क्या है?---कर्म अर्थात हमारे द्वारा किए गए प्रयासों का नाम ही तो कर्म है. अपने जीवन में जिस भी सुख या दुख, सफलता-असफलता, हानि-लाभ को हम प्राप्त करते हैं, वो सब कुछ भी तो हमारे प्रयासों अर्थात कर्मों का ही तो परिणाम है.
कर्म का व्यक्ति के जीवन में कितना अधिक प्रभाव पडता है, यह इस एक उदाहरण के माध्यम से सहज ही समझा जा सकता है---------एक व्यक्ति जिसनें अपने लिए एक नए घर का निर्माण किया, लेकिन उस नए घर में प्रवेश करते ही उसे बुरी तरह से आर्थिक समस्यायों का सामना करना पडा. बेचारे का खाना-पीना, सोना-जागना तक हराम हो गया. हालाँकि उसने घर का निर्माण पूरी तरह से वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुरूप ही कराया, लेकिन फिर ऎसा क्या हुआ कि उसे उस घर में प्रवेश करते ही आर्थिक समस्यायों का सामना करना पड गया. देखा गया है कि इन्सान को जब किसी भीषण संकट, कष्ट, परेशानी का सामना करना पडता है तो अनायास ही मन में कईं प्रकार की शंकाएं, द्वन्द जन्म लेने लगते हैं. उस व्यक्ति के साथ भी यही हुआ...एक ओर तो उसके मन में ये विचार घर कर बैठा कि हो न हो मकान की ये जगह ही मनहूस है, दूसरी ओर ये शंका भी जन्म लेने लगी कि कहीं वास्तुशास्त्र के कारण ही तो ये सारी गडबड नहीं हुई ?
खैर, वो व्यक्ति किसी की सलाह से मेरे पास आया. मैने जब उसके मकान का सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन किया तो यही पाया कि मकान तो वाकई वास्तुशास्त्र अनुरूप बना है. सिर्फ एक ही दोष था कि उसका ईशान कोण 90 अंशों से कुछ अधिक था, जो कि लाभप्रद नहीं माना जाता. अब असमंजस ये कि क्या सिर्फ ईशान कोण ही उस व्यक्ति की समस्यायों का वास्तविक कारण है ? नहीं! वास्तव में मकान में ऎसा कोई दोष था ही नहीं, जिसे कि उसकी समस्यायों का वास्तविक कारण कहा जा सकता.
दरअसल व्यक्ति की व्यापारिक एवं आर्थिक स्थिति पर चर्चा के दौरान ये बात स्पष्ट हो पाई कि उसकी समस्यायों का एकमात्र कारण था----निर्माण कार्य में अपनी क्षमता से काफी अधिक मात्रा में धन का नियोजन. वस्तुत: उसनें बैंकों से ऋण लेकर तथा अपने व्यापार में से बहुत सारी पूंजी निकालकर मकान के निर्माण में लगा दी, जिसके कारण उसे आर्थिक समस्यायों का सामना करना पड रहा था. अभी भी धन की कमी के चलते, मकान की ऊपरी मंजिल का निर्माण कार्य बीच अधर में लटका हुआ था. समस्या का मूल कारण तो अब एकदम सामने स्पष्ट था....सो, उसे यही समझाया कि इधर-उधर से पैसा उधार लेकर मकान पर लगाने का कोई औचित्य नहीं है. अब इस पर ओर धन लगाना बन्द कर दे, क्यों कि समस्यायों का कारण मकान नहीं, अपितु तुम्हारा कर्म (उपर्युक्त निर्णय न लेना) है. जब उसके पास पर्याप्त धन नहीं था, तो उसे घर के निर्माण में इतना अधिक पैसा नहीं लगाना चाहिए था. अत: यदि दोष का निराकरण करना है तो इस घर को बेच देना ही उचित रहेगा. अन्तत: उस व्यक्ति नें सलाह मानकर घर बेच दिया ओर ऋण चुकता करके कुछ पैसा अपने व्यापार में लगाकर शेष बची पूंजी से अपने लिए एक छोटा घर खरीद लिया. बस हो गया उसकी समस्यायों का निवारण.......
अब देखिए, ये ठीक है कि भाग्य का निर्माण किसी सर्वशक्तिमान ईश्वरीय सत्ता द्वारा किया जाता है, लेकिन उसने हमें यह स्वतन्त्रता तो प्रदान की ही हुई है कि हम स्वयं में सुधारकर अपनी इच्छा एवं कार्यों(कर्मों) द्वारा उत्तम जीवन व्यतीत कर सकें. कर्मों को मूल तत्व एवं अनुकूल वातावरण की सहायता की आवश्यकता होती है. यदि हम ज्योतिष, वास्तुशास्त्र के अनुरूप अपने भवन इत्यादि में कोई परिवर्तन करते हैं तो वो भी तो कर्म का ही एक हिस्सा है.किन्तु ये हो सकता है कि कभी किसी ग्रह इत्यादि के कुप्रभाव के कारण भी भवन-सम्बंधी किन्ही कठिनाईयों, परेशानियों का सामना करना पड जाए. तब ग्रह शान्ती तथा मन्त्र-यन्त्रादि का आश्रय लेकर ही इनसे मुक्ति पाई जा सकती है.