ग्रहराज सूर्य और चमत्कारी फलप्रदायक सूर्योपासना

मस्त जगत के जीवनदाता, ज्योति एवं उष्णता के परम पुंज तथा समस्त ज्ञान के स्वरूप सर्वोपकारी देव श्री सूर्य नारायण की महता से भला कौन परिचित नहीं है. देवी अदिति के गर्भ से जिनकी उत्पति है, भगवान विराट के नेत्रों से जिनकी अभिव्यक्ति है, जो, श्रद्धा भाव से अर्घ्य प्रस्तुत करने मात्र से ही उपासक की समस्त पीडाओं को दूर कर, सफलता के मार्ग को प्रशस्त करने वाले हैं, ऎसे सूर्यदेव निश्चय ही देवरूप में पूजे जाने के अधिकारी हैं. हिन्दु संस्कृ्ति में श्री गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु और सूर्य----ये पाँचों देव आदि देव भगवान के ही 5 प्रमुख पूज्य रूप हैं.

जो सूर्य ग्रह रूप में आकाश में दृ्ष्ट है, वह तो मात्र एक स्थूल रूप है. वास्तविकता में सूर्य का विस्तार तो अनन्त है. इस ब्राह्मंड में अनगिनत आकाश गंगाएं हैं तथा प्रत्येक में असँख्य सूर्य प्रकाशमान हैं. अत: यह जानना ही लगभग असंभव है कि सम्पूर्ण ब्राह्मंड कितने सूर्यों से जगमगा रहा है. शास्त्रानुसार तो यह सभी उस अज्ञात महासूर्य का भौतिक जगत में स्थूलरूप से विस्तार है. प्राणदायिनी उर्जा एवं प्रकाश का एकमात्र स्त्रोत होने से सूर्य का नवग्रहों में भी सर्वोपरि स्थान है. निश्चय ही भारतीय संस्कृ्ति नें सूर्य के इस सर्वलोकोपकारी स्वरूप को बहुत पहले ही जान लिया था. इसीलिए भारतीय संस्कृ्ति में सूर्य की उपासना पर पर्याप्त बल दिया गया है. सूर्योपासना के लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार के अनेकानेक लाभ हैं. निष्काम भाव से दिन रात निरन्तर अपने कार्य में रत सूर्य असीमित विसर्ग (त्याग) की प्रतिमूर्ति हैं.
सूर्य द्वारा ग्रीष्म काल में पृ्थ्वी के जिस रस को खींचा जाता है, उसे ही चतुर्मास (चौमासे) में हजारों गुणा करके पृ्थ्वी को सिंचित कर दिया जाता है. ऎसे सूर्य देव सबको इतना ही समर्थ बनाएं, यही सूर्योपासना का मूल तत्व है. भारतीय संस्कृ्ति भी तो इसी भावना से ओतप्रोत रही है. आज भौतिकता की दौड नें भले ही हमारी जीवन शैली को अत्यधिक प्रभावित कर दिया हो, पर सच तो यह है कि इस परिस्थितिजन्य दुष्प्रभावों से बचने के लिए सूर्योपासना और भी आवश्यक हो गई है तथा समय के साथ इसका महत्व और भी बढ गया है.
सही मायनों में तो बाल्याकाल से ही हर मनुष्य को सूर्योपासना का महत्व समझाया जाना चाहिए. यदि बचपन से ही बालक सूर्य नमस्कार करे तथा सूर्य को अर्घ्य दे, तो निश्चित ही बालक बलवान, तेजस्वी एवं यशस्वी बनेगा तथा उसे जीवन में कभी भी नेत्र और ह्रदय रोग आदि से पीडित होने का कोई भय नहीं रहेगा.
अत: प्रात:काल सूर्य को अर्घ्य(जल) प्रदान करना निश्चित ही लाभकारी है. यह क्रिया वैज्ञानिक कारणों से भी अत्यंत श्रेष्ठ है, क्यों कि प्रात: उदित होते हुए सूर्य में लाभदायक किरणें होती हैं, जो नेत्रों के लिए स्वास्थय्वर्द्धक हैं. सूर्य को जल देने का सही तरीका यह है कि जल पात्र को ह्रदय की ऊँचाई तक ले जाकर फिर जल गिराना चाहिए और नेत्रों को पात्र के दोनों किनारों पर बनने वाले सूर्य के प्रतिबिम्ब पर स्थिर रखना चाहिए; साथ ही यदि सभव हो तो निम्नांकित मन्त्र का भी उच्चारण करते रहें तो समझिए सोने पे सुहागा.
एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजो राशे: जगत्पते
अनुकंपय मां भक्तया गृ्हणार्घ्य दिवाकर: !!
सूर्य की किरणें अपने प्रभाव के द्वारा इस जगत के समस्त जीवों एवं वनस्पतियों का पालन करने में सक्षम हैं. इस प्रभाव के कारंण पृ्थ्वी के भिन्न भिन्न स्थानों पर पाये जाने वाली वनस्पतियाँ एवं जीव-जन्तुओं में विविधता पायी जाती है तथा जीवन के विकास में इस तथ्य का महत्वपूर्ण स्थान है. जैव विविधता के साथ ही सूर्य किरणें अलग अलग स्थान पर रहने वाले प्राणियों की प्रकृ्ति एवं उनके मन-मस्तिष्क को भी प्रभावित करती हैं.
सूर्य के इसी महत्व को देखते हुए भारतीय ज्योतिष में भी सूर्य को अति विशिष्ट स्थान दिया गया है. ज्योतिष में इसे ग्रहराज और चक्षु कहा गया है. मानव शरीर में यह नेत्रों तथा आत्मा का कारक है तथा पारिवारिक दृ्ष्टि से पिता एवं सामाजिक दृ्ष्टि से राजसुख एवं स्वाभिमान का कारकत्व प्राप्त है. यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में सूर्य बलवान हो, तो, उसे जीवन में कदापि पुत्रहीनता का सामना नहीं करना पडता, इसके साथ ही उसका पिता सुख भी अच्छा होगा.
सूर्य अनुकूलता हेतु कुछ अनुभवसिद्ध उपाय :-
* सूर्य को नित्य प्रात:काल स्नान उपरांत उपरोक्त वर्णित मन्त्र बोलते हुए, ताँबे के पात्र से अर्घ्य(जल) दें. यदि सम्भव हो तो लाल पुष्प भी अर्पित करें.
* जो इन्सान पुत्रहीनता का कष्ट झेल रहे हैं अथवा जिनका अपनी संतान संग वैचारिक मतभेद रहता है, संतान आज्ञाकारी नहीं है तो ऎसे व्यक्तियों को पूर्ण श्रद्धा भाव से नित्य सूर्य के द्वादश नामों का उचारण करना चाहिए---
आदित्य: प्रथमं नाम द्वितीयं तु विभाकर:
तृ्तीयं भास्कर: प्रोक्तं चतुर्थं च प्रभाकर:!!
पंचम च सहस्त्रांशु षष्ठं चैव त्रिलोचन:
सप्तमं हरिदश्वश्च अष्टमं च विभावसु:!!
नवमं दिनकृ्त प्रोक्तं दशमं द्वादशात्मक:
एकादशं त्रयोमूर्तीद्वादशं सूर्य एव च!!
द्वादशैतानि नामानि प्रात:काले पठेन्नर:
दु:स्वप्ननाशनं सद्य: सर्वसिद्धि: प्रजायते!!
आयुरारोग्यमैश्वर्य पुत्र-पौत्र प्रवर्धनम
ऎहिकामुष्मिकादीनि लभन्ते नात्र संशय:!!
* प्रात:कल नियमित सूर्य नमस्कार करने से शरीर हष्ट पुष्ट रहता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृ्द्धि होती है.
* सूर्य प्रकाश(धूप) में बैठकर कनेर, दुपहरिया, देवदारू, मैनसिल, केसर और छोटी इलायची मिश्रित जल से नियमित स्नान से पक्षाघात, क्षय(टीबी), पोलियो, ह्रदय विकार, हड्डियों की कमजोरी आदि रोगों में शर्तिया विशेष लाभ प्राप्त होता है.