विवाह पूर्व जन्मकुंडली मिलान... नाडी दोष क्या महत्व रखता है ?

पिछली पोस्ट (विवाहपूर्व कुंडली मिलान--चन्द आवश्यक बातें) पर एक पाठक नें मेलापक में नाडी दोष के सम्बंध में जानना चाहा था, सो, आज की ये पोस्ट उसी विषय पर आधारित है.
विवाह के लिए भावी वर-वधू की जन्मकुंडली मिलान करते नक्षत्र मेलापक के अष्टकूटों (जिन्हे गुण मिलान भी कहा जाता है) में नाडी को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है. नाडी जो कि व्यक्ति के मन एवं मानसिक उर्जा की सूचक होती है. व्यक्ति के निजि सम्बंध उसके मन एवं उसकी भावना से नियंत्रित होते हैं. जिन दो व्यक्तियों में भावनात्मक समानता, या प्रतिद्वंदिता होती है, उनके संबंधों में ट्कराव पाया जाता है.
जैसे शरीर के वात, पित्त एवं कफ इन तीन प्रकार के दोषों की जानकारी कलाई पर चलने वाली नाडियों से प्राप्त की जाती है, उसी प्रकार अपरिचित व्यक्तियों के भावनात्मक लगाव की जानकारी आदि, मध्य एवं अंत्य नाम की इन तीन प्रकार की नाडियों के द्वारा मिलती है. वैदिक ज्योतिष अनुसार आदि, मध्य तथा अंत्य----ये तीन नाडियाँ यथाक्रमेण आवेग, उदवेग एवं संवेग की सूचक हैं, जिनसे कि संकल्प, विकल्प एवं प्रतिक्रिया जन्म लेती है. मानवीय मन भी कुल मिलाकर संकल्प, विकल्प या प्रतिक्रिया ही करता है और व्यक्ति की मनोदशा का मूल्यांकन उसके आवेग, उदवेग या संवेग के द्वारा होता है. इस प्रकार मेलापक में नाडी के माध्यम से भावी दम्पति की मानसिकता, मनोदशा का मूल्यांकन किया जाता है.
वैदिक ज्योतिष के मेलापक प्रकरण में गण दोष, भकूट दोष एवं नाडी दोष----इन तीनों को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है. यह इस बात से भी स्पष्ट है कि ये तीनों कुल 36 गुणों में से (6+7+8=21) कुल 21 गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं और शेष पाँचों कूट (वर्ण, वश्य, तारा,योनि एवं ग्रह मैत्री) कुल मिलाकर (1+2+3+4+5=15) 15 गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं. अकेली नाडी के 8 गुण होते हैं, जो वर्ण, वश्य आदि 8 कूटों की तुलना में सर्वाधिक हैं. इसलिए मेलापक में नाडी दोष एक महादोष माना गया है.
नाडी दोष:- जिस प्रकार वात प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए वात नाडी चलने पर, वात गुण वाले पदार्थों का सेवन एवं वातावरण वर्जित होता है अथवा कफ प्रकृ्ति के व्यक्ति के लिए कफ नाडी के चलने पर कफ प्रधान पदार्थों का सेवन एवं ठंडा वातावरण हानिकारक होता है, ठीक उसी प्रकार मेलापक में वर-वधू की एक समान नाडी का होना, उनके मानसिक और भावनात्मक ताल-मेल में हानिकारक होने के कारण वर्जित किया जाता है. तात्पर्य यह है कि लडका-लडकी की एक समान नाडियाँ हों तो उनका विवाह नहीं करना चाहिए, क्यों कि उनकी मानसिकता के कारण, उनमें आपसी सामंजस्य होने की संभावना न्यूनतम और टकराव की संभावना अधिकतम पाई जाती है. इसलिए मेलापक में आदि नाडी के साथ आदि नाडी का, मध्य नाडी के साथ मध्य का और अंत्य नाडी के साथ अंत्य का मेलापक वर्जित होता है. जब कि लडका-लडकी की भिन्न भिन्न नाडी होना उनके दाम्पत्य संबंधों में शुभता का द्योतक है.