मिथकों के अभ्यंतर में छिपा सत्य---"सोम"(The secret of "soma")

वैदिक वांड्मय की ये एक सबसे बडी विशेषता रही है कि यहाँ सत्य को बहुधा संकेतों के माध्यम से प्रकट किया गया है.यहाँ मिथक कथाओं को आधार बनाकर सत्य को व्यक्त करने की एक विस्तृ्त तथा अविच्छिन परम्परा रही है.इन मिथकों के अभ्यन्तर में भारतीय ज्ञान विज्ञान के अनेकों रहस्य छिपे हुए हैं. लेकिन इनका अन्वेषण करने हेतु वैदिक परिभाषाओं का ज्ञान होना ही परमावश्यक है, ताकि स्थूल वर्णनों के मूल में निहित परोक्ष अर्थों को यथार्थ रीति से जाना जा सकें---
पिछली पोस्ट में हमने "सोम" के सन्दर्भ में आपके सामने समुद्र मन्थन का उपाख्यान प्रस्तुत किया था. कुछ लोगों की दृ्ष्टि में ये उपख्यान मात्र एक निरी मिथकीय कल्पना भर है.जब कि वास्तव में ये मनुष्य की दैवी और आसुरी वृ्तियों के संघर्ष का एक विवेचन है. क्यों कि वैदिक परिभाषा में मनुष्य का ही एक नाम समुद्र है:
पुरूषो: वै समुद्र: ( जैमिनीय उप.ब्रा.3/35/5)
कहा गया है कि इस समुद्र मंथन में पुरूष रूपी समुद्र के जल तत्व का मंथन किया जाता है, उस जल से उत्पन सात्विक शक्ति सोम है--उसी का तामसिक रूप सुरा (वीर्य) हो जाता है. और इस मंथन से जो अमृ्त या जीवन का प्राणभाग उत्पन होता है, उसका अंश देवों को मिलना चाहिए.असुर यदि उस जीवन तत्व पर अधिकार पा लेते हैं तो मनुष्य मृ्त्यु के मुख में जाने लगता है.
हमारे इस शरीर में शक्ति का मुख्य स्थान उसका केन्द्रिय नाडी जाल ही है. जिसके कि दो भाग हैं----एक तो मस्तिष्क और दूसरा मेरूदंड सम्बंधी नाडी-संस्थान. जिसे भारतीय परिभाषा में "सुषुम्ना" कहा गया है. वैदिक परिभाषा में मस्तिष्क या सिर के अनेक नाम हैं.वैदिक ऋषियों नें उन अनेक संजाओं के द्वारा मानव शरीर में निहित अपरिमित शक्तियों को ही प्रकट किया है.शतपथ ब्राहमण के अनुसार शिर ही समस्त प्राणों का उदभव स्थान है. शिरो वै प्राणानां योनि: ( शत. 7/5/1/22)
पंच प्राण ही पंचेन्द्रियों का संचालन करते हैं. इनका नियन्त्रण शिर से ही होता है. 'शतपथ ब्राह्मण' में निरूक्तशास्त्र की दृ्ष्टि से कहा है कि:-यच्छ्रियं समुदौहस्तंस्माच्छिर: तस्मिन्नेतस्मिनप्राणा आश्रयन्त, तस्माद उ एव एतत शिर: !(शत. 6/1/1/4)
अर्थात देवों नें श्री का दोहन किया .श्री दोहन के कारण ही शिर को यह नाम मिला. उस शिर में प्राण नें आश्रय लिया. आश्रस्थान होने के कारण ही वह शिर कहलाया. यहाँ ऋषि देखता है कि श्री, आश्रय और शिर इन तीनों में एक ही धातु " श्रिण श्रयणे" के भिन्न भिन्न रूप हैं.तात्पर्य यह है कि शिर या मस्तिष्क ही प्राणों का प्रभव स्थान है.इसी प्रकार समुद्र मंथन से जो रत्न उत्पन हुए, उन सबका सम्बंध मनुष्य शरीर के आन्तरिक तत्वों से ही है. ब्राह्मण ग्रन्थों में इन अभिप्रायों को स्पष्ठ रूप से बताया गया है.
चलिए अब बात करते हैं--सोम की. यदि हम ध्यानपूर्वक अपने शरीर का निरीक्षण करें, तो हमें जान पडेगा कि मेरूदंड के ऊपरी भाग पर शिररूपी कटोरा औंधा ढका हुआ है. मेरूदंड का ऊपरी छोर जो कि सुमेरू और नीचे का कुमेरू कहलाता है. सुमेरू और कुमेरू  के बीच निरन्तर एक विद्युत की तरंग या प्राणधारा प्रवाहित होती रहती है. हमारा आयुष्य इस प्राणधारा के ऊपर ही आश्रित रहता है. ये प्राणधारा जहाँ टूटी नहीं कि वहीं व्यक्ति का राम नाम सत्य......
ऋग्वेद इस बात को ओर अच्छे से स्पष्ट करता है. उसमे सोम को इन्द्र का रस या इन्द्रिय सम्बन्धी रस कहा गया है.सोम: इन्द्रियो रस: (ऋग्वेद 8/3/20)  यह सोम सबके मस्तिष्क में शान्ती और उर्जा देने वाला रस है. जैसा कि आमतौर पर लोग समझते हैं कि इन्द्र किसी देवता का नाम है,लेकिन वेदों में जिस इन्द्र की इतनी स्तुति की गई है, वो किसी देवता का नाम नहीं है, अपितु इन्द्र से भावार्थ शरीर की समस्त इन्द्रियों श्रोत(सुनने की शक्ति),त्वक(अनुभव करने की शक्ति),चक्षु(देखने की शक्ति), रसना(आस्वाद करने की शक्ति)और घ्राण(सूँघने की शक्ति)--ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और वाक,उपस्थ,पायु, पाणि और पाद ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ के समूह से है.अर्थात शरीर की समस्त इन्द्रियों की सामूहिक शक्ति का नाम ही इन्द्र है.
वैदिक परिभाषाओं में शिर की एक ओर संज्ञा है कलश या द्रोण. पिछली पोस्ट में आपने पढा कि समुद्र मंथन के दौरान मन्दार पर्वत के परिभ्रमण से "कलश" को क्षुभित किया गया. तब उस "कलश" में से "सोम" प्रकट हुआ. ...वास्तव में हमारा शिर ही उस कथा में कहा गया कलश है.सोमयाग के द्वारा इसी कलश में सोमरस भरा जाता है. इस द्रोण कलश में जो सोम होता है, उसमें से छोटे छोटे पात्रों में भरकर वह रस पिया जाता है. हमारे इस शरीर में दिन रात यह क्रिया निरन्तर चलती रहती है.हमारी जितनी भी इन्द्रियाँ हैं, उन सब के संज्ञान केन्द्र मस्तिष्क में ही है.और ये संज्ञान केन्द्र (sensoary and motor centres) मस्तिष्क में सर्वत्र फैले हुए हैं, जिनका सम्बंध मस्तिष्क में भरे हुए सरीब्रो स्पाईनल फ्लूईड से है. स्पष्ठ रूप से कहा जाए तो मस्तिष्क में भरा हुआ ये सरीब्रो स्पाईनल फ्लूईड (Cerebrospinal fluid) ही वास्तव में सोम है. यह रस मस्तिष्क और मेरूदंड के समस्त नाडी संजाल को सींचता रहता है. यह मस्तिष्क की वापियों (ventricles) में उत्पन होता है और मस्तिष्क और सुषुम्ना की सूक्ष्मतम नाडियों का पोषण और परिमार्जन करता हुआ उसमें सर्वत्र ओतप्रोत रहता है. यानि कि मस्तिष्क और सुषुम्ना में व्याप्त रस को ही वेदों में सोमरस कहा गया है.
Hidden truths in myths--The secret of "soma"