ग्रह किसी घटना के कारण नहीं अपितु किए गए कर्मों के सूचक मात्र हैं.......

ज्योतिष का नाम आते ही प्राणी का मन अपने भविष्य के रहस्यों की जानकारी प्राप्त कर लेने को आतुर हो उठता है, वह ज्योतिषी के पास यह आशा लेकर जाता है कि उसे वह जो कुछ भी बतलाएगा वह अक्षरश: उसी रूप में घटित होगा. लेकिन यह सब कुछ उस ज्योतिषी पर निर्भर करता है, वह उसकी जन्मकुंडली देखकर अपनी बुद्धि के अनुसार पूर्वानुमान लगाकर उसको भविष्य के बारे में बतलाता है. हालाँकि आज अधिकतर ज्योतिषी इस विद्या को विज्ञान की संज्ञा देने लगे हैं, जब कि मैं कभी इसे विज्ञान स्वीकार कर ही नहीं पाया, क्यों कि मैं इसे विज्ञान की प्रचलित परिभाषा में बँध जाने वाली विद्या नहीं मानता. हाँ यदि विज्ञान से तात्पर्य "विशेष ज्ञान" से है तो फिर मुझे भी इसे विज्ञान मानने में कोई दुविधा नहीं.
प्राचीन शास्त्रकारों द्वारा प्राणमात्र से संबंधित प्रत्येक पहलू और तथ्य का अध्ययन करने के आधार एवं माध्यम खोजकर हमारे सम्मुख रख दिए गए हैं, इतने पर भी सबका अध्ययन-मनन करना और व्यवहार में स्वयं की समझ-बूझ या तर्कशक्ति से परिणाम तक पहुँचना व्यक्ति की अपनी पात्रता पर निर्भर करता है.
ज्योतिष की उपयोगिता प्राणी के गर्भादान के समय से ही आरम्भ हो जाती है. जब प्राणी गर्भमुक्त होता है अर्थात जन्म ले लेता है, वही क्षण उसके भाग्य का आधार बनता है. गर्भाधान से लेकर गर्भमुक्ति तक वह जो समय व्यतीत करता है, उसके पीछे प्रकृ्ति की एक सप्रयोजन क्रिया रहती है. स्त्री-पुरूष के मिलन से गर्भादान की जो स्थिति बनती है, उस समय नभोमंडल में ग्रहों की स्थिति ही व्यक्ति की देह, चरित्र एवं जीवन की स्थिति का आधार बनती है.
संसार में जो भी घटनाएं घटित होती हैं, उनके अनेक कारण बताए जाते हैं, जैसे प्राणी का कर्म किंवां प्रारब्ध, समष्टिकर्ता(ईश्वर) की इच्छा किंवाँ प्रकृ्ति का नियमित प्रवाह. इन घटनाओं का ग्रहों के आकर्षण-विकर्षण से क्या सम्बंध है? उपर्युक्त बलवान कारणों के रहते संसार के कार्यों में ग्रहस्थिति क्या परिवर्तन ला सकती है? यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है. इस प्रश्न का उत्तर सबके एकत्व का विचार कर लेने पर ही मिलेगा. इस सृ्ष्टि के रचनाकार(ईश्वर/भगवान/अल्लाह या जो कोई भी वो है) की इच्छा ही प्रकृ्ति का प्रवाह है, प्रकृ्ति के तीन गुणों सात्विक-राजस-तामस के प्रवाह के अनुसार ही ग्रहों की निश्चित गति और प्राणियों का प्रारब्ध है और प्रारब्ध के अनुसार ही उसे फल की प्राप्ति होती है. शरीर की उत्पति भी प्रारब्ध के अनुसार ही होती है. जैसा जिसका कर्म होता है, वैसी ही उसकी देह होती है. जिस शरीर में प्रारब्ध के अनुसार जैसी कर्म वासनाएं होती हैं, उसके जीवन में जिस प्रकार की घटनाएं घटने वाली होती हैं, उसी के अनुरूप उस शरीर की उत्पति के समय वैसी ही ग्रह स्थिति नभोमंडल में होती है. ग्रहों की स्थिति समान होने पर देश-काल और देह-भेद के कारण उनका भिन्न भिन्न प्रभाव पडता है, इसलिए वैदिक ज्योतिष में ग्रहों को किसी नूतन फल का विधान करने वाला न बतलाकर स्वयं के प्रारब्ध के अनुसार घटने वाली घटना का संकेत देने वाला कहा गया है------"ग्रहा: वै कर्म सूचका".
( प्रस्तुत पोस्ट एक जिज्ञासु पाठक के सवाल को आधार में रखते हुए लिखी गई है, जिन्होने कुछ दिनों पूर्व एक जिज्ञासा व्यक्त की थी. आशा करता हूँ कि यह पोस्ट उनकी जिज्ञासा शान्ती में सहायक सिद्ध होगी)
आगामी लेख:-
1.वैदिक ग्रन्थों में वर्णित "सोम" 
2.जन्मकुंडली में चतुर्थेश की स्थिति पर आधारित आपका सम्पूर्ण व्यक्तित्व