भावना---जिस के बल पर इन्सान अनन्त ज्ञान और अतुल शक्ति से टक्कर ले रहा है!!!!!

भावना क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर भला कौन दे सकता है? भावना सब कुछ है और शायद कुछ भी नहीं। यह समस्त ब्राहमंड अपने असंख्य सूर्यों,चन्द्रमांओं और पृ्थ्वियों सहित किसी रचनाकार की भावना ही तो है, जो मूर्तरूप हो गई है। इन्सान की भावना भी उस रचनाकार की भावना से कुछ कम नहीं। इस पृ्थ्वी के प्रत्येक वाशिन्दे की भावना नें उसके लिए इस असीम संसार को भिन्न भिन्न प्रकार का बना दिया है। जो मेरा संसार है,वो पाठकों में से एक का भी नहीं। यह सच हो सकता है कि सब मनुष्यों के संसार में बहुत कुछ समता है, परन्तु विषमता भी इतनी है कि एक मनुष्य का जो संसार है, वो दूसरे का नहीं हो सकता। यही नहीं एक मनुष्य का जगत भी सदा एक जैसा नहीं रहता। जो बचपन में था,वो जवानी में नहीं दिखता। जवानी का जगत बुढापे में नहीं रहता। निरोगता का जगत अस्वस्थता के जगत से भिन्न,और समृ्द्धि के समय का जगत निर्धनता के काल के जगत से विलक्षण होता है।

यह परिमित ज्ञान और सीमित शक्ति वाला, साढे तीन हाथ लम्बाई का शरीर जो अपने आप को मनुष्य कहलाने में गर्व अनुभव करता है, इसी भावना के बल पर अनन्त ज्ञान और अतुल शक्ति से टक्कर लेता है। शान्त होकर भी अनन्त का स्पर्द्धी बनना चाहता है। भावना के इसी खूंटे के बल पर ही यह बछडा कूदता है।

भावना का कोई पारावार नहीं,आत्मा की भान्ती यह भी अजर-अमर है। जहाँ सर्वव्यापी वायु की भी पहुँच नहीं, वहाँ भी यह पहुँच जाती है। बडे से बडा पर्वत भी इसको रोकने में असमर्थ है। प्रकाश,जो पल में लाखों मील की दूरी तय कर लेता है, इससे दौड में बाजी नहीं ले सकता। विद्युत इससे कहीं पीछे छूट जाती है। और की तो क्या कहें, ईश्वर तक को जन्म देने वाली भी यही भावना ही तो है। प्रेम और भक्ति का यदि कोई स्त्रोत्र है,तो यह। नास्तिकवाद का यदि कोई मूल है, तो यह। घृ्णा और द्वेष का यदि कोई आधार है,तो यह।

यह सब कुछ है और कुछ भी नहीं। हवाई किले बनाना किसका काम है ? भावना का। कहो तो आकाश की सीमाएं लाँघ जाए, कहो तो पाताल की तली को छू ले। कवियों की कल्पना भी यही है और पागलों का प्रलाप भी यही।

यदि समय और मन नें इजाजत दी,तो,इसी भावना के कुछ दृ्श्यों को,जिनसे कि हर एक मनुष्य का रंगमंच सुसज्जित होता है, भावना का मन से और मन का चन्द्रमा से किस प्रकार का बेजोड सम्बंध है-----किसी दिन एक विस्तृ्त लेख मे दिखाने का एक प्रयास रहेगा। मानता हूँ कि भावना जैसी स्वच्छन्द, अव्याहत गति वाली वस्तु को मात्र एक लेख में कैद करना कदापि सम्भव नहीं हो सकता परन्तु किंचित प्रयास तो किया ही जा सकता है। हो सकता है कि मैं इसे सही तरीके से व्यक्त न भी कर पाऊँ, बहुत सी त्रुटियाँ रह जाने की भी सम्भावना है---लेकिन यदि त्रुटियाँ ही न हों तो फिर वो भावना ही क्या हुई ?

शेष फिर कभी...............