ज्योतिष इन्सान को परिस्थितिजन्य विवशताओं से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है!!!!!!

प्रकृ्ति यानि--संतुलन। यह वस्तुत: वह अवस्था है जहाँ व्यवस्था अपने शुद्ध रूप में रहती है। असंतुलन, अव्यवस्था जैसी व्यवस्थायें विकृ्तियाँ मानी जाती हैं। हमारे जीवन में अनुकूल-प्रतिकूल, उत्थान-पतन, हर्ष-विषाद जैसी स्थितियाँ आती ही रहती हैं। ये जीवन के लक्षण हैं और हमारी विवशताऎं। सामान्यत: इन स्थितियों पर विचार करने का अभ्यास एक आम आदमी को नहीं होता। परिस्थितिजन्य विवशता उसे इतना गहरे जकडे रहती हैं कि वो इनसे छिन्न होकर इनका विश्लेषण कर ही नहीं पाता और यदि करना चाहे तो शायद तब भी न कर पाये। लेकिन ज्योतिष विद्या इन्सान की इन्ही परिस्थितियों के विश्लेषण का ही दूसरा नाम है। इस विद्या का उदेश्य ही यही है कि इसके प्रकाश में उसके जीवन की इन वर्तमान परिस्थितियों का जो हेतु है, उस मूल कारण से उसे अवगत कराना और आगामी भविष्य हेतु उसका मार्गप्रशस्त करना।
समस्या के निवारण किवां उपचार पक्ष के बिना ज्योतिष शास्त्र मात्र "सूचनाशास्त्र" बन कर रह जाता है। ऎसा नहीं है कि यह ग्रहों के माध्यम से एक विश्लेषात्मक संकेत ही करता है कि हमारे जीवन के अमुक कालखंड में एक विशेष प्रकार की स्थिति उत्पन होने वाली है। अथवा हमारे जीवन का अमुक समय हमारे लिए कष्टप्रद या सुखकर बना रहेगा। बल्कि उस सुख या दुख के मूल कारण को भी बताता है और उस कारण के आधार पर उन स्थितियों में बदलाव करना यदि व्यक्ति की क्षमता में है तो उन कुफलों एवं हानिप्रद स्थितियों को समाप्त अथवा मन्दप्रभाव करने का साधन भी निर्मित करता है।
कुछ दिनों पूर्व की बात है,एक सज्जन जो कि ज्योतिष विद्या को अन्धविश्वास की श्रेणी में रखते हैं, उन्होने यहीं मेरे एक लेख पर विनोदवश एक टिप्पणी की थी" क्या कोई इन्सान किसी उपाय के जरिये अपने भाग्य को बदल सकता है? यदि ऎसा होता तो फिर सारे ज्योतिषी अरबपति होते या दुनिया के सभी प्रमुख पदों पर सिर्फ ज्योतिषी ही बैठे दिखाई देते"। खैर चाहे उन्होने यह बात इस विद्या पर अपने अविश्वासवश कही थी किन्तु फिर भी ये मेरा दायित्व बनता था कि मैं यथासंभव उनकी इस भ्रान्ति उन्मूलन का प्रयास करुं, सो जहाँ तक संभव हो सका, मैने उन्हे ज्योतिष और ज्योतिषी की सीमाओं के बारे में अवगत कराया। किन्तु मैने देखा है कि ज्योतिष को मानने वाले बहुत से ऎसे भी लोग हैं, जो सोचते हैं कि किन्ही उपायों द्वारा जीवन की कैसी भी समस्या से मुक्ति अथवा मन की इच्छाओं की पूर्ती की जा सकती है। मेरा उन लोगों से यही कहना है कि अपने दिमाग से इस ख्याल को बिल्कुल निकाल दीजिए कि ज्योतिष कोई आपकी इच्छाओं को पूरा करने का साधन है। उपायों का उपयोग सिर्फ जो आपके भाग्य में है और मिल नहीं पा रहा, उसे आप तक पहुंचाने हेतु किया जाता है। मेरे इस कथन से कुछ लोगों को लग सकता है कि मनुष्य तो स्वतंत्र है फिर कोई ज्योतिषी किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली से उसके भाग्य का सीमा निर्धारण कैसे कर सकता है कि अमुक वस्तु उसके भाग्य में है अथवा नहीं?
ये सच है कि कर्मस्वातंत्र्य मनुष्य देह की विशेषता है और इसी स्वतन्त्रता के कारण ही वह कर्मफलस्वरूप भाग्य को स्थगित या परिवर्तित भी कर सकता है। विभिन्न प्रकार के पूजा,पाठ, दान-पुण्य, अनुष्ठान, व्रत उपवास, मन्त्र जाप, गाय/कुत्ते/पक्षियों इत्यादि की सेवा, बुजुर्गों के चरण स्पर्श, रत्न धारण, औषधी स्नान जैसे उपचार उसी कर्म के प्रतिप्रसव हैं, जो भाग्य के रूप में हमारे पर लद गया है। हम हारते क्यों हैं? नियतिप्रदत स्थितियों के आगे हम विवश क्यों हो जाते हैं? सिर्फ इसलिए कि अपने द्वारा किए गए जिस कर्म के परिणाम के रूप में हम भाग्य को भोग रहे हैं, उसे स्थगित करने योग्य कर्मबल हमारे पास नहीं होता। किन्तु भाग्यजनित इन परिस्थितियों से मुक्ति हेतु ज्योतिष में जो उपरोक्त विभिन्न प्रकार के उपाय बताए गए हैं, वो एक प्रकार से हमारे लिए उस योग्य कर्मबल अर्जन का एक साधन मात्र ही बनते हैं।  कैसे?--------समय मिला तो फिर कभी इस विषय पर विस्तारपूर्वक लिखने का प्रयास करूंगा।