कालसर्प योग--वास्तविक या कपोल कल्पित ?

क कहावत है कि संसार में उसी वस्तु की नकल होती है जिसकी माँग अधिक होती है। प्राचीन समय में ज्योतिष केवल आवश्यकता थी परन्तु आज के दौर में ये सिर्फ आवश्यकता नहीं रही,बल्कि बिना किसी विशेष मेहनत के एक मोटी कमाई का साधन बन गया है।
पिछले कुछ वर्षों से देखने में आ रहा है कि "काल सर्प योग" किसी धुमकेतु के समान भारतीय फलित ज्योतिष पर छाया हुआ है। इस योग का आम जनमानस पर इतना अधिक प्रभाव देखने को मिल रहा है कि अल्पज्ञ या अर्ध शिक्षित ज्योतिषी भी इसके लक्षण,उपलक्षण,फलित तथा अनिष्ठ और अरिष्ट फलों का बखान अधिकाधिक रूप से करने में जुटे हुए हैं। परन्तु बात जब योग की शास्त्रीयता की हो, तो वे लोग कुछ भी बताने में असमर्थ हो जाते हैं।
कालसर्प योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार सूर्य से शनि प्रयन्त समस्त ग्रह राहू तथा केतु के मध्य आने पर काल सर्प योग निर्मित होता है। जब कि वास्तव में इस तथाकथित योग का कोई भी शास्त्रीय आधार नहीं है। सम्पूर्ण भारतीय ज्योतिष के किसी भी ग्रन्थ में इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। वराहमिहिर,पाराशर,वैद्यनाथ,मन्त्रेश्वर,कल्याणवर्मा,मणित्थ,भट्टोत्पल,गर्ग आदि किसी भी दैवज्ञ नें इस योग का नाम तक नहीं लिया। कतिपय फलित ग्रन्थों यथा सारावली,बृ्हज्जातक,पाराशर,होरा शास्त्रम आदि में सर्प योग,नाग योग,सर्प वेष्ठित योग आदि कुछ योग अवश्य वर्णित हैं,किन्तु इन योगों का वर्तमान में प्रचलित इस कालसर्प योग से न तो योग रचना,अथवा ग्रह स्थिति के स्तर पर कोई साम्य है और न ही फलित के स्तर पर।
ज्योतिष विद्या में नवीन शोध,नवीन चिन्तन तथा अध्ययन प्रतिबंधित नहीं हैं। लेकिन ऎसा नहीं होना चाहिए कि प्राचीन सिद्धान्तों की महता तथा स्वीकार्यता में संशोधन के नाम पर नवीन कपोल कल्पित सिद्धान्तों का निर्माण करके इस विद्या का बेडा गर्क ही कर दिया जाए। आज जरूरत है इसके सूत्रों, सिद्धान्तों में छिपे रहस्यों,गहन तत्वों को समझने की, न कि आलतू फालतू के इन कल्पित योगों के जरिये इसकी विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह खडे करने की।
ज्योतिषीय योगों में इस प्रकार से किन्ही दो ग्रहों के मध्य ग्रह आने की स्थिति को "कर्तरी" कहा जाता है। यदि कर्तरी शुभ ग्रहों की हो तो "शुभ कर्तरी",अन्यथा "पाप कर्तरी योग" होता है। नाम के अनुरूप ही इनका फल भी होता है। परन्तु यह कर्तरी योग किसी एक भाव के दोनों ओर ग्रह होने पर होता है और केवल किसी एक ग्रह पर ही लागू होता है। उदाहरण के लिए यदि किसी की जन्मकुंडली में लग्नेश(lord of 1st house) के दोनों ओर पाप ग्रह हों,तो कहा जाता है कि लग्नेश पाप कर्तरी में है। सूर्य से शनि प्रयन्त समस्त सातों ग्रहों की कर्तरी फलित ज्योतिष के किसी भी ग्रन्थ में नहीं आती,जिससे कि यह अनुमान लगाया जा सके कि शायद कर्तरी योग ही आगे चलकर कालसर्प योग में परिवर्तित हो गया हो।
वास्तव में इस कालसर्प योग का किसी भी प्रामाणिक ज्योतिष ग्रन्थ में कहीं नाममात्र भी उल्लेख नहीं है,लेकिन यह भी राहूकाल और मांगलिक दोष की भान्ती दक्षिण भारत से उत्तर भारत में अभी लगभग 25-30 वर्ष पहले से ही सरक आया है। और आज अधिकतर ज्योतिषियों,पंचांग,समाचारपात्र,टैलीवीजन पर आने वाले भविष्यवाणी बाबाओं द्वारा बिना किसी जानकारी के इन कल्पित दोषों का हौव्वा खडा करके,लोगों के भय का सिर्फ दोहन किया जा रहा है----बेशक उनके ऎसे कृ्त्यों से इस दैवीय विद्या की विश्वसनीयता पर आँच आती है तो भले आती रहे।