कोई भी प्राकृ्तिक रत्न (real gem-stone) स्वयं अपना प्रभाव दिखाने में सक्षम होता है।

क्रियाशीलता प्रकृ्ति के जीवन का गहनतम रहस्य है। जो वस्तु उस संसार में सक्रिय नहीं होती, वो शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। इसीलिए ये सम्पूर्ण ब्राह्मंड, नक्षत्र, ग्रह तथा तारे सदैव क्रियाशील रहते हैं। हमारे सौरमंडल के इन ग्रहों, नक्षत्रों की सक्रियता को आप चाहें तो उनके रत्न को धारण करके भी अनुभव कर सकते हैं। यदि विधिपूर्वक रत्न को धारण किया जाए तो वो अपने सम्बंधित ग्रह के प्रतिनिधि स्वरूप धारणकर्ता से सम्पर्क बनाकर ग्रहों की भांती चलायमान होते हैं।
रत्नों के चयन के कुछ नियम:-
अपने लिए किसी रत्न के चुनाव के समय विशेष सावधानी की आवश्यकता पडती है। अनिष्टकारक ग्रहों का कुप्रभाव कम करने हेतु अथवा क्षीण ग्रह के प्रभाव में वृ्द्धि के लिए ज्योतिषी उस ग्रह के रत्न धारण करने की राय देते हैं। इसके अतिरिक्त आपको बहुत से ऎसे भी ज्योतिषी मिल जायेंगें जिनकी दृ्ष्टि में अपने ग्राहक द्वारा धन खर्च करने की क्षमता ही किसी रत्न के चयन का एकमात्र मापदंड है। वो लोग सिर्फ ये देखते हैं कि अगर ग्राहक सालिड पार्टी है तो उसे नीलम,पुखराज या हीरा जैसा कोई मंहगा रत्न डलवा दो(चाहे वो उसके लिए उपयुक्त हो या न हो) ओर यदि एक आम साधारण आदमी है तो उसे वही कोई सस्ता सा रत्न बता दो मसलन मोती, माणिक,मूँगा, पन्ना वगैरह। कहने का अर्थ ये कि कैसे भी करके हमारा उल्लू सीधा होना चाहिए, हमारी जेब में पैसा आना चाहिए...चाहे उसके चक्कर में बेचारे ग्राहक का बंटाधार ही क्यों न हो जाए।
खैर....जिसका जैसा कर्म। हम बात कर रहे थे, किसी रत्न के चयन करते समय किन किन बातों की सावधानी रखनी आवश्यक है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि कोई व्यक्ति एक साथ कौन कौन से रत्न पहन सकता है और कौन से ऎसे रत्न हैं, जिन्हे धारण करने से उसे बचना चाहिए। इसे आप निम्नलिखित अनुसार जान सकते हैं:----
1 किसी भी व्यक्ति को कभी तृ्तीयेश(3rd house lord), षष्ठेश(lord of 6th house),अष्टमेश(lord of 8th house),एकादशेश(lord of 11th house) एवं द्वादशेश(lord of 12th house) का रत्न भूलकर भी नहीं धारण करना चाहिए। क्यों कि ज्योतिष में इन भावों के स्वामियों को पाप ग्रह की संज्ञा दी जाती है। मान लीजिए यदि आप तृ्तीयेश के स्वामी का रत्न धारण करते हैं तो आपके स्वभाव में तीव्रता, क्रोध बढने लगेगा। जीवन के प्रत्येक विषय में दुविधा एवं भ्रम की स्थितियाँ निर्मित होने लगेंगी। उसी प्रकार षष्ठेश का रत्न धारण करने से मन में किसी अज्ञात भय का संचार होने लगेगा। व्यक्ति के मन का झुकाव किसी व्यसनोन्मुख होने लगेगा। अष्टमेश के रत्न से भाग्य में अवरोध, अनैतिक विचार एवं धर्म से विरक्ति के भाव, द्वादशेश के रत्न से मन भोगवृ्ति की ओर मुडने लगेगा। मन-मस्तिष्क पर वासना, अति कामुकता जन्म लेने लगेगी। धन का व्यर्थ भाव होने के साथ ही किसी प्रकार के दंड की आशंका रहेगी।
2.ग्रह के विरोधी रत्नों को कभी भी नहीं पहनना चाहिए। जैसे कि माणिक्य के साथ नीलम,हीरा। मोती के साथ मूंगा,नीलम,हीरा,पन्ना,गोमेद,लहसुनिया। पुखराज के साथ हीरा,पन्ना,गोमेद,मूंगा इत्यादि......
3. बिना जन्मपत्री या हस्तरेखा की जाँच के कभी भी, कोई भी प्राकृ्तिक रत्न नहीं धारण करना चाहिए। कुछ लोग नामराशि, हिन्दी/ अंग्रेजी माह में जन्म अथवा मूलाँक के आधार पर रत्न धारण कर लेते हैं, जो कि रत्न चयन की निराधार प्रणाली है। रत्न चयन की इन प्रणालियों में सदैव हानि की ही सम्भावना रहती हैं, लाभ की बेहद कम।
मुख्य बात ये है कि कोई भी असली-प्राकृ्तिक रत्न निष्क्रिय नहीं होता। उसकी सतह पर सूर्य की किरणों द्वारा परावर्तित होने वाला प्रकाश एक चमत्कारिक शक्ति के रूप में कार्य करता है तथा स्वयं अपना प्रभाव दिखाने में सक्षम होता है।
रत्नो की दुर्लभता एवं मानवी धनलोलुपता के कारण आजकल अधिकांशत: असली के नाम पर कृ्त्रिम रत्न ही बेचे जा रहे हैं, जो देखने में बिल्कुल असली प्रतीत होते हैं। वैसे भी एक आम आदमी को इन सब चीजों की पहचान भी कहाँ होती है। उसे तो जो भी उसके ज्योतिषी/पंडित जी नें थमा दिया, वही उसके लिए असली है। एक साधारण मनुष्य की तो बात ही छोड दीजिए कम से कम 95% से ऊपर ज्योतिषी ऎसे होंगें,जिन्हे स्वयं भी रत्न के असली नकली के बारे में कोई जानकारी नही हैं। बस व्यापारी से जो खरीदा, सो बेच दिया।
इसलिए इच्छुक व्यक्ति को ग्रहों के अनुसार असली रत्न का ही उपयोग करना चहिए, भले ही वो सस्ता उपरत्न हो, परन्तु असली होना चाहिए। अन्यथा उसे धारण करने से कोई लाभ तो होने वाला है नहीं, उल्टे, मन में रत्नों की प्रभावकारिता तथा ज्योतिष/ज्योतिषी के प्रति अविश्वास जरूर पैदा हो जाएगा।
आगामी पोस्ट:- दिनांक 2-4-2010