क्या कोई रत्न (gem stone) आपके जीवन की दिशा बदल सकता है ?

इस बात को तो प्रत्येक व्यक्ति भली भान्ती जानता है कि रत्नों का ग्रहों से विशेष सम्बंध होता है। इनमें ग्रहों की शक्तियों को आत्मसात करने की प्रबल शक्ति होती है। जिस प्रकार एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में विद्युतधारा प्रवाहित की जाती है, उसी प्रकार कोई भी रत्न उस ग्रह विशेष की रश्मियों को मानव शरीर में प्रवाहित कर देता है।
ग्रहों के अनिष्टकारी प्रभाव को दूर करने के लिए रत्न पहनने की जो परिपाटी ज्योतिषशास्त्र में प्रचलित है,वह निरर्थक नहीं बल्कि उसके पीछे वैज्ञानिकता है। यह तो एक सर्वविदित सत्य है कि सौरमंडलीय किरणों का प्रभाव पेड-पौधे, पशु-पक्षी,जड,चेतन इत्यादि इस प्रकृ्ति के प्रत्येक तत्व पर पडता है। यदि समगुण वाली राशियों के ग्रहों से पुष्ट और संचालित व्यक्ति को वैसी ही रश्मियों के वातावरण में उत्पन रत्न पहनाया जाए तो वांछित फल प्रदान करता है। इसके विपरीत अगर प्रतिकूल प्रभाव के व्यक्ति को विपरीत स्वभावोत्पन्न रत्न पहनाया जाए तो वह उसके लिए अहितकारी ही सिद्ध होगा।
प्रत्येक मनुष्य यही चाहता है कि उसका जीवन विसंगतियों से परे सफल एवं खुशहाल हो। एक आदर्श जीवन जीने के लिए जहाँ शारीरिक स्वास्थय का होना जरूरी है, वहीं उसके भाग्य का प्रबल होना तथा मन, बुद्धि, कर्म की एकरूपता होना भी नितांत आवश्यक है अन्यथा उसका जीवन संकटों से पूर्ण दु:खमय हो जाएगा और अन्तत: न केवल उसका पारिवारिक, सामाजिक जीवन अपितु उसका स्वयं का अस्तित्व भी संकट में पड जाएगा।
जीवन की श्रेष्ठता और सफलता के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति का शरीर, मन, बुद्धि, पुरूषार्थ, भाग्य, कर्म इत्यादि विभिन्न कारक एवं अवयय सुचारू रूप से उसका साथ दें, जीवनपथ पर उसका मार्गदर्शन करते रहें। उपरोक्त वर्णित इन तत्वों/अवयवों में से यदि एक में भी व्यवधान उत्पन हुआ या अन्य तत्वों से उसका तारतम्य भंग होता है तो इन्सान का समूचा जीवनचक्र बिखरने लगता है। भारतीय ज्योतिष पद्धति के अनुसार कालचक्र इन नवग्रहों (जिनमें सात मुख्य ग्रह तथा दो छायाग्रह सम्मिलित हैं) के माध्यम से ही न केवल मानव जीवन अपितु सम्पूर्ण प्रकृ्ति को संचालित,नियन्त्रित,सृ्जित या विघटित करने का कार्यभार संभाले हुए हैं। यदि केवल मानव जीवन की बात करें तो ये ग्रह हमारे बाह्य व आंतरिक जीवन को संचालित करते हैं। सम्पूर्ण मानव जगत के व्यक्तित्व और उनके कार्यकलापों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर संचालन का दायित्व इन्हे प्राप्त है।
रत्नो की उपयोगिता, उनकी कार्यप्रणाली को समझने से पूर्व आपको सबसे पहले तो जन्मकुंडली के 12 भावों को जानना होगा कि कुंण्डल का प्रत्येक भाव जीवन के किस किस आयाम का प्रतिनिधित्व करता है।
 भाव                                कारकत्व/प्रतिनिधित्व
प्रथम (लग्न)                    शरीर (सम्पूर्ण अस्तित्व)
द्वितीय(धन)                     वाणी,धन
तृ्तीय(भ्रातृ्)                     पुरूषार्थ, क्रोध, दुविधा
चतुर्थ(सुख)                      मन, विचारशक्ति, सुख
पंचम(आत्मा)                  बुद्धि, अहंकार,संचित पुण्य कर्म,पुत्रसंतति
षष्ठ(रिपु)                          व्यसन,रोग,योग
सप्तम(जाया)                    काम(वासना), विवाह, चौर्यकला
अष्टम(रन्ध्र)                     आयु, दुर्भाग्य, आलस, नास्तिकता
नवम(भाग्य)                   धर्म, भाग्य,ज्ञानोदय
दशम(कर्म)                      शुभाशुभ कर्म, कार्य क्षमता
एकादश(लाभ)                 लाभ,कन्या संतति,संतानहीनता
द्वादश(व्यय)                    भोग, व्यय, हानि, निद्रा

रत्नों को किन परिस्थितियों में धारण करना चाहिए:-
किसी भी रत्न को धारण करने का अर्थ यह समझना चाहिए कि अब वह ग्रह कुंडली में अधिक प्रबल हो गया है तथा उससे सम्बंधित प्रवृ्तियाँ भी उतरोतर बलवान होने लगी है। यह बात विशेष ध्यान योग्य है कि यहाँ मैने ग्रह से सम्बंधित वस्तुएं या कारक तत्वों की बात न कहकर के प्रवृ्तियाँ कहा है। यानि कि मान लीजिए किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में चतुर्थेश (lord of 4th house) नीच राशिस्थ होकर के बैठा है। यहाँ चतुर्थेश का अर्थ है---व्यक्ति का मन, इसका अर्थ ये हुआ कि उस व्यक्ति के मन की प्रवृ्तियाँ विपरीतता/पतन की ओर अग्रसर हैं। मन उसे किसी गलत दिशा की ओर ले जा रहा है। अब यदि उस व्यक्ति को चतुर्थेश का रत्न पहना दिया जाए तो होगा ये कि उसके मन की प्रवृ्तियाँ ओर अधिक तीव्र होने लगेंगी। यानि कि उस व्यक्ति का मन जिस दिशा में अग्रसर है, वो उस व्यक्ति को ओर अधिक तीव्रता से उस दिशा में धकेलने लगेगा।
ऎसे में क्या किया जाए कि उस व्यक्ति का मन एकाग्र हो, वो पतनोन्मुख न होकर के, उसका मार्गदर्शन करे? इस सत्य से तो सब लोग भलीभान्ती परिचित हैं कि मन को केवल बुद्धि, आत्मा के जरिये ही सही रास्ते पर लाया जा सकता है, अन्य ओर कोई उपाय नहीं है। इसके लिए उस व्यक्ति को पंचमेश( जो कि कुंडली में बुद्धि और आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है) का रत्न धारण करना चाहिए न कि अन्य किसी ग्रह का। ऎसे ही अन्य ग्रहों की विपरीतता पर यथा भाग्येश ग्रह के विपरीत होने पर कर्मेश(दशम भाव के अधिपति) का रत्न धारण करने से (क्योंकि भाग्य को कर्म से ही जीता जा सकता है)।
केवल एक यही सूत्र है, जिसे आधार मानकर किसी व्यक्ति को कोई रत्न धारण करना चाहिए। और ज्योतिषियों को भी अपनी इस मिथ्या धारणा में बदलाव लाना चाहिए, जिसे आधार मानकर कोई ग्रह के शुभ होने पर उसका रत्न पहनने की सलाह दे रहा है तो कोई उसके खराब होने की स्थिति में।