नवसंवत्सर आगमन तथा नवरात्रि के पावन पर्व की आप सबको हार्दिक शुभकामनाऎँ!!!!!!!!!!!!!

कल 16 मार्च चैत्र प्रतिपदा को नवीन संवत्सर और हमारे विक्रमी वर्ष का आरम्भ हो रहा है। साथ ही नवरात्रि का पावन पर्व भी। सूक्ष्म जगत को अपना कार्यक्षेत्र बनाने वाले हमारे ऋषि मुनियों नें अपने ज्ञान के माध्यम से हम सब के लिए वर्ष के एक एक दिन को उल्लासमय बना दिया है। तथा प्रत्येक प्रकृ्तिगत परिवर्तनों को गणितीय माध्यम से ऎसा सुव्यवस्थित बनाया हुआ है कि उसके सुनियोजन और व्यष्टि चेतना पर उसके प्रभावों को देखकर आश्चर्यचकित होकर रह जाना पडता है।
वसन्त के ठीक 24 दिन बाद शिवरात्रि और उसके 16 दिन बाद होली का त्योहार आता है। चालीस दिनों का यह समय प्रकृ्ति में सूक्ष्म स्तर पर तीव्रगति से हो रहे परिवर्तनों का समय होता है। इस अवधि में वातावरण में क्रमश: गर्मी की तपिश बढने लगती है जिसका स्पष्ठ प्रभाव अपने शरीर पर भी होता दिखाई पडने लगता है। इसके तुरन्त 15 दिन बाद आरम्भ होता है नव संवत्सर अर्थात नया वर्ष और चैत्रीय नवरात्र--जो कि शक्ति उपासना का पर्व है। वास्तव में नवरात्रि क्या है---दो ऋतुओं का मिलन। एक और तो शरद और ग्रीष्म ऋतु का मिलन और साथ में पुराने वर्ष की विदाई और नवीन वर्ष के आगमन के हर्षोल्लास का पर्व भी। नवरात्रि एक प्रकार की संधि है। संधि यानि जोड। दो हड्डियाँ जिन स्थानों पर मिलती हैं, शरीर में वह भाग अतिमहत्वपूर्ण भी बन जाता है और नाजुक भी। दिन और रात जब मिलते हैं तो उसे भी संधिकाल कहा जाता है। सूर्यास्त होते समय दिन का अवसान होता है और रात्रि का आगमन। दिन-रात की संधि की भान्ती ही ऋतु परिवर्तन की इस संधिवेला(नवरात्रि) में भी सूक्ष्म जगत में अनेकानेक प्रकार की तीव्र हलचलें होने लगती हैं। न सिर्फ शरीर अपितु सम्पूर्ण सृ्ष्टिचक्र में परिवर्तन होने लगते हैं। हमारी जीवनीशक्ति प्रयासपूर्व इस शरीर में जमी हुई विकृ्तियों को निकाल बाहर करने के प्रयास में जुट जाती है एवं सूक्ष्म अन्तरिक्षीय् प्रवाह इस शरीर, मन और अन्त:करण का कायाकल्प करने को तत्पर रहते हैं।
यदि शाब्दिक अर्थ की बात की जाए तो हर कोई बता देगा कि नवरात्रि का अर्थ होता है----नौ रात्रियाँ। लेकिन यदि किसी से इसका गूढार्थ पूछ लिया जाए तो मैं समझता हूँ कि शायद ही किसी को पता होगा। वास्तव में नवरात्रि से तात्पर्य ये है कि हमारे इस मानवी शरीर में नौ द्वार होते हैं। अज्ञानतावश दुरूपयोग के कारण उनमें जो अन्धकार छा गया है या कहें कि उनमें जो अशुद्धियाँ एकत्रित हो जाती हैं,---- आचार,विचार, नियम, संयम एवं उपवास के माध्यम से एक एक रात्रि में एक एक द्वार की उन अशुद्धियों का उन्मूलन करना और सन्निहित क्षमताओं को उभारना ही वस्तुत: नवरात्रि की साधना कही जाती है। इन नौ दिनों में उपवास रखने की परम्परा का उदेश्य ही यही है कि शरीर के इन नौ द्वारों में एकत्रित, जमी हुई अशुद्धियाँ को दूर कर आयु एवं आरोग्यता में वृ्द्धि की जा सके। किन्तु उपवास का मतलब वो नहीं जैसा कि आजकल समझा जाता है। कहने को तो उपवास लेकिन दिनभर किसी न किसी प्रकार से पेट भरने का उद्यम करते रहे, कभी फल खा लिए तो कभी चाय, दूध इत्यादि।
उपवास का अर्थ होता है---निराहार अर्थात बिना आहार के रहना। यानि कि उपवास के माध्यम से इस शरीर रूपी मशीन को कुछ समय के लिए विश्राम देना। माना कि आपने अन्न का सेवन नहीं किया लेकिन उसके बदले में दिन भर फल,चाय अथवा अन्य किसी भक्ष्य पदार्थ का सेवन करते रहे तो भी इस शरीर की आन्तरिक मशीनरी को तो विश्राम मिल ही नहीं पाया। उसे तो आपने अपने कार्य में लगाए रखा तो फिर ऎसे उपवास रखने का क्या लाभ। उपवास का अर्थ है---मन और शरीर का संयम। यदि आप सिर्फ अन्न से परहेज को ही उपवास मान कर चल रहे हैं तो ऎसे उपवास रखने से तो न रखना भला। यदि उपवास इत्यादि करने का मन हो तो पूर्णत: निराहार रहकर वैचारिक संयम बनाए रखें तो आप आयुष्य, आरोग्यता एवं मानसिक सबलता इत्यादि नाना प्रकार के लाभ प्राप्त कर सकते हैं अन्यथा तो लोक दिखावा या खानापूर्ती करने का कोई फायदा नहीं।
यदि आप नवरात्रि पर्व के विषय में विस्तृ्त जानकारी चाहते हैं तो मेरे इस पूर्वप्रकाशित इस लेख से प्राप्त कर सकते हैं:-नवरात्रि पर्व चैत्र और आश्विन मास में ही क्यों मनाया जाता है?

 
अन्त में अब आप सबको मेरी ओर से नववर्ष एवं नवरात्रि पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाऎँ!!!  नववर्ष आप सबके जीवन में उज्जवल सम्भावनाऎँ लेकर आए................सब पर देवी शक्ति का विशेष अनुग्रह बना रहे!!!!!