अपनी परम्पराओं का निर्वहण कोई मूर्खता नहीं अपितु बुद्धिमता का सूचक है..................

यहाँ उतरी भारत के सनातन हिन्दू परिवारों में नव संवंत के प्रथम दिन तिलों के तेल द्वारा मालिश करने और मिश्री, काली मिर्च और नीम के ताजे पत्तों के सेवन की एक वैदिक परम्परा अभी तक बनी हुई है।  
एक सनातनी परिवार में जन्म लेने के चलते हम भी अपने बाल्याकाल से यही देखते आए हैं कि उस दिन परिवार के छोटे बडे सभी सदस्यों को पहले तो सुबह उठते ही मालिश करनी पडती है, और फिर बाद में उन्हे मिश्री, काली मिर्च और नीम के ताजे पत्तों का सेवन करने को कहा जाता है। अब घर के बडे बुजुर्गों के कहने पर चाहे मन मारकर ही सही, हमें भी साल के पहले दिन इन चीजों का सेवन करना ही पडता था। बचपन में, उस समय अन्जान थे लेकिन कोफ्त तो बहुत होती थी कि ये लोग भी न जाने क्यूं सुबह सुबह और वो भी नये साले के पहले दिन ही मुँह कडवा करवा देते हैं। होना तो ये चाहिए था कि पहले दिन कुछ खीर पूरी, मिठाई वगैरह खाने को मिले ताकि सारा साल पकवान खाते ही बीत जाएं। परन्तु ये लोग तो कडवा नीम खिलाकर साल भर का शकुन ही खराब कर देते हैं। अब बडे बुजुर्गों को मना करने की हिम्मत तो कौन करे, सो मन मसोस कर और उलटे सीधे मुँह बनाते हुए खा लेते थे :-) । लेकिन जब समझबूझ कुछ विकसित होने लगी तो धीरे धीरे इन सब चीजों का महत्व समझ में आने लगा। दरअसल भारतीय पर्व-त्योंहारों, परम्पराओं का यह नियम है कि जो विधियाँ इन में प्रयुक्त होती हैं, वे सभी प्राय: हम लोगों को शारीरिक एवं मानसिक लाभ पहुंचाने की दृ्ष्टि से ही रखी गई हैं, न कि केवल पारलौकिक दृ्ष्टि से। इस नियम के अनुसार ही नव संवत आरम्भ होने(प्रथम नवरात्र) के दिन अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शरीर पर तिलों का तेल मलना और मिश्री, काली मिर्च आदि के साथ नीम के ताजे कोमल पत्तों के सेवन का विधान बनाया गया है,वो भी अपने आप में सर्वथा वैज्ञानिक है।
रोग बीमारी के विषय में यह बात ध्यान में रखने की है कि अधिकांश रोग चर्म सम्बन्धी मलिनता तथा पेट की अशुद्धि से ही जन्म लेते हैं। उनमे भी चर्म सम्बन्धी विकारों को निवृ्त करने में तिलों के तेल का अभ्यंग (मालिश) अपने आप में विशिष्ट स्थान रखता है।
अभ्यंगमाचरैनित्यं स जराश्रमवातहा ।
दृ्ष्टिप्रसादपुष्ट्वायु: स्वप्नसुत्वकत्वदार्यकृ्त ।।
आयुर्वेद में तो तेल अभ्यंग(मालिश)की इतनी प्रशंसा की गई है कि इसे बुढापा,थकावट तथा वायु को निवृ्त करने वाला,दृ्ष्टि(नेत्र ज्योति)बढाने वाला,प्रसन्नता,पुष्टता,आयु और निन्द्रा देने वाला तथा त्वचा की सुन्दरता एवं दृ्डता पैदा करने वाला कहा गया है। वहीं चरक संहिता में तो इसका ओर भी विशद रूप से वर्णन मिलता है। कहा गया है कि सबसे अधिक वायु स्पर्शेन्द्रियों में रहती है और स्पर्शेन्द्रियाँ त्वचा के आश्रित होती हैं। अत: वातपीडा से निवृ्ति,स्नायु विकार से मुक्ति एवं उपरोक्त वर्णित समस्त प्रकार के शारीरिक लाभों को देखते हुए---अब आप ही बताईये कि इससे अधिक उपयोगी बाह्य उपचार और क्या हो सकता है?
इसी प्रकार सभी प्रकार के बुखार/ज्वरादि रोगों की निवृ्ति के लिए नीम का उपचार तो जग प्रसिद्ध है ही। इसके लिए किसी प्रकार का प्रमाण देना तो एक तरह से पोस्ट को व्यर्थ विस्तार देना मात्र ही होगा।
किन्तु इतना लिख देना आवश्यक समझता हूँ कि ये तो सबको मालूम है कि नीम अत्यंत कडवा होता है। लेकिन अधिकतर लोगों को ये नहीं मालूम होगा कि कडवे रस वाला कोई भी पदार्थ/वस्तु शरीर में वायु उत्पन करता है। नीम के सेवन से शरीर में वायु न बनने लगे इसलिए उसमें मिश्री मिला दी जाती है। इससे एक तो नीम की कडवाहट कम हो जाती है दूसरे वायु नहीं बनता। लेकिन एक ओर समस्या देखिए---मीठे पदार्थ शरीर में कफ पैदा करते हैं। अब मिश्री से कफ न पैदा हो इसलिए साथ में चरपरी वस्तु काली मिर्च मिला दी जाती है। जिससे कि यह मिश्रित प्रयोग त्रिदोषहर्ता बनकर एक तरह से सर्वरोगनिवारक नुस्खा बन जाता है। अब ऎसी वस्तु का सेवन करना कितना हितकारी है--यह स्पष्ट ही समझा जा सकता है।

आगामी सप्ताह 16 मार्च 2010 को नव संवत प्रारम्भ हो रहा है। इस दिन यदि परिवार के सभी सदस्य मिश्री-काली मिर्च के सहित नीम के ताजे पत्तों का सेवन करे तो समझिए आपने पूरे वर्षभर के लिए अपने घर से डाक्टर को दूर रखने का बहुत हद तक इन्तजाम कर लिया है। सामान्य ऋतु परिवर्तन के फलस्वरूप होने वाली अधिकाँश रोग-बीमारियों से आप बचे रहेंगें। कष्ट सहने और डाक्टरी चिकित्सा पर पैसा खर्च करने से तो कहीं बेहतर है कि एक बार इस सर्व रोगनिवारक नुस्खे का सेवन कर लिया जाए। जिसमें हींग लगे ना फटकरी और रंग चौखा.........