किसी मन्त्र जाप,उपासना अथवा कर्मकांड इत्यादि का हमे सही लाभ क्यों नहीं प्राप्त होता ?

ऎसी स्थिति स्वभावत: किसी के भी मन को असमंजस में डाल देती है कि मन्त्र-तन्त्र, कर्मकांड,भक्ति,पूजा-उपासना इत्यादि की एक जैसी ही प्रक्रिया का अवलम्बन करने पर भी एक व्यक्ति को तो लाभ हो जाता है, जब कि दूसरे किसी अन्य को कोई सफलता नहीं मिलती, ऎसा क्यों?। एक को सिद्धि, दूसरे के हाथ निराशा, ऎसा किसलिए?। वही देवता, वही मन्त्र, वही विधि---एक को सफलता ओर दूसरे को असफलता क्यूं?। यदि पूजा पाठ, उपासना,भक्ति, धर्म-कर्म अन्धविश्वास है तो फिर उससे कितने ही लोग लाभान्वित क्यों होते हैं?। यदि सही है तो फिर कितनों को निराशा ही क्यों हाथ लगती है?। जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हरेक को रौशनी देता है फिर देवी-देवता ओर उनके उपासना कर्म में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं क्यों देखने को मिलती हैं? अक्सर ऎसे सवाल बहुत से लोगों के मन में आते हैं।
दरअसल बात ये है कि उपास्य देवता या मन्त्रों में जितनी अलौकिकता दृ्ष्टिगोचर होती है, उससे लाभान्वित हो सकने की पात्रता भी हम में होनी नितांत आवश्यक है। सिर्फ कर्मकांडों की लकीर पीट लेना इस संदर्भ में सर्वदा अप्रयाप्त है। तलवार की धार में सिर काट लेने की क्षमता है,लेकिन वह क्षमता उन्ही के लिए है, जिनकी भुजाओं में बल, ह्रदय में साहस ओर उसे चला सकने का बुद्धि कौशल हो। बिजली में सामर्थय की कमी नहीं लेकिन उससे लाभ लेने के लिए उसी प्रकार के यन्त्रों की भी आवश्यकता होती है। सही उपकरण के अभाव में बिजली का उपयोग व्यर्थ ही नहीं अपितु अनर्थमूलक भी बन जाता है।
स्वाति के जल से मोती सींपें ही लाभान्वित होती हैं। अमृ्त उसी को जीवन दे सकता है, जिसका मुँह खुला हुआ हो। प्रकाश का लाभ आँखों वाले ही उठा सकते हैं---अंधे के लिए प्रकाश होना न होना कोई मायने नहीं रखता। इन पात्रताओं के अभाव में स्वाति का जल, अमृ्त या प्रकाश चाहे कितना भी क्यों न हो, उससे कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता। ठीक यही बात पूजा-पाठ, उपासना एवं मन्त्र इत्यादि के संबंध में भी लागू होती है। मंत्र जाप, स्त्रोत्र,चालीसा इत्यादि अथवा अन्य किन्ही विधि विधान का लाभ वे ही उठा सकते हैं, जिन्होने अपने व्यक्तित्व को भीतर ओर बाहर से विचार ओर आचार से परिष्कृ्त करना सीख लिया है। बीमारी में दवा का लाभ उन्हे ही मिलता है जो बताए हुए अनुपात ओर पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अत: देव उपासना से पहले हमें आत्म उपासना सीखना बहुत आवश्यक है।  
सर्वव्यापी ईश्वरीय सत्ता का एक सूक्ष्म प्रतिनिधि(देव अंश) हम सब के भीतर मौजूद है। किसी व्यक्ति की अपनी निष्ठा,श्रद्धा,भावना ओर विश्वास के अनुरूप ही भीतर का वो देव अंश समर्थ बनता है या निर्बल होता है। उपासक की निष्ठा में गहनता और व्यक्तित्व में प्रखरता हो तो उसका इष्टदेवता समुचित पोषण पाकर अत्यन्त समर्थ दृ्ष्टिगोचर होगा ओर तभी उसकी आशाजनक सहायता करेगा। दूसरा उपासक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अन्तरंग में अवस्थित देव अंश पोषण के अभाव में भूखा, रोगी, दुर्बल बनकर किसी कोने में पडा कराह रहा होगा। पूजा पाठ भी नकली दवा की भान्ती भावना रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न कर सकेगी ओर वह विधिवत मन्त्र जाप, चालीसा,स्त्रोत्र वगैरह का पाठ करने के पश्चात भी कोई लाभ नहीं ले पाएगा। 
इस विराट ब्रह्म में जो कुछ दिव्य, महान, पवित्र, प्रखर है, उसका एक अंश हरेक व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। जो चाहे उसे ठीक तरह से सँजोने-संभालनें में लग सकता है और उन मणि मुक्ताओं से अपने जीवन भंडार को भरापूरा रख सकता है।
हर किसी के मस्तिष्क में गणपति विद्यमान है, जो व्यक्ति बुद्धि विकास की साधना करके अपने गणपति को परिपुष्ट बना लेगा, वो विद्वान बनकर अनेक विभूतियों के वरदान प्राप्त करेगा। जो अपने गणेश की जडों मे पानी नहीं देगा, उनके गणपति भगवान सूखे लाचार अवस्था में एक कोने में पडे होंगें। लड्डू, खीर खिलाने या स्त्रोत्र,चालीसा का पाठ करने पर भी कोई सहायता न कर सकेंगें। बुद्धिमान और विद्वान बन सकना सम्भव ही नहीं हो सकेगा।
हर किसी की भुजाओं में हनुमान का निवास है। व्यायाम करने वाले संयमी, ब्रह्मचारी लोग ही बजरंगबली के भक्त प्रमाणित हो सकते हैं। पर जिसने अपने असंयमित और भ्रष्ट आचरण से हनुमान जी को पीडित प्रताडित करने में कोई कोर कसर नहीं छोडी । उसका सुबह शाम हनुमान चालीसा पढना भी कोई कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। वो बल और आरोग्यता का वरदान अपने अन्दर के रूग्ण, जीर्ण-शीर्ण हनुमान से कैसे प्राप्त कर सकता हैं।
बहुत दिनों पहले की बात है कि एक परिचित सज्जन मेरे पास आए, जिनके आचरण संबंधी क्रियाकलापों से मै भली भान्ती परिचित था। मैं क्या बल्कि आधा शहर उनके कारनामों से परिचित है। सच कहूँ तो एक नम्बर के लम्पट, रसिक मिजाज आदमी जिनके न जाने कितनी स्त्रियों के संग तो अनैतिक संम्बंध होंगें। मैने उनकी जन्मपत्रिका देखी तो उनके विगत जीवन में घटित हुई दो एक घटनाओं का उल्लेख करके उनकी वर्तमान समस्या के बारें बता दिया तो लगे चरण पकडने। बोले कि "शर्मा जी, मैंने तो आज से आपको अपना गुरू मान लिया। जीवन में आप मुझे पहले ऎसे इन्सान मिले हैं जिसने कि मुझे इतना अधिक प्रभावित किया हो"। मेरे मन में पता नहीं क्या विचार आया कि मैं उनसे पूछ बैठा कि आपके आराध्यदेव कौन हैं यानि की आप किस देवता की उपासना करते हैं। झट से बोल पडे कि मैं तो श्रीरामशरणम को मानने वाला हूँ। भगवान राम मेरे आराध्यदेव हैं, चाहे कुछ भी हो जाए मैं सुबह शाम दोनों समय श्रीराम अमृ्तवाणी का पाठ करना नहीं भूलता। सुनते ही मेरी हँसी छुटी कि क्या बताऊँ----मैने उसके आगे हाथ जोड दिए कि भाई तूं राम को मानने वाला है। वो राम जिन्हे मर्यादा पुरूषोतम कहा जाता है, जिन्होने जीवनभर एक पत्निव्रत धारण किए रखा। जब वो तेरे जीवन पर अपना कोई प्रभाव नहीं छोड पाए तो मेरी क्या बिसात कि मैं तुझे प्रभावित कर सकूँ। इसलिए तूं घर जा और ऎश कर। कहने का मतलब ये कि दुनिया में कैसे कैसे लोग भरे पडे हैं---जिनका सुधार शायद देवी देवता भी नहीं कर सकते।
दरअसल बात ये है कि बालबुद्धि, उतावले और अदूरदर्शी लोग ही उपासना, मन्त्र-तन्त्र इत्यादि को जादूगरी मानकर चलते हैं। उनकी कल्पना किन्ही ऎसे देवताओं की होती है जो कि स्तुति, जप,पूजा,उपासना,भोग,प्रशाद जैसे प्रलोभनों से बहलाए,फुसलाए जा सकते हैं। अधिकाँश पूजा पाठ, उपासना में संलग्न लोगों की मनोभूमी इसी बच्चों जैसे स्तर की होती है। वे विधि-विधानों, कर्मकांडों, या भोग प्रशाद का ताना बाना बुनते रहते हैं ओर इन्ही टंटेबाजियों से अपना उल्लू सीधा करने की जुगत भिडाने में लगे रहते हैं। तथाकथित भक्तों की मंडली इसी स्तर की होती है। वे तिलक छापे लगाकर अपनी भक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते रहते हैं या ऎसा ही कोई ओर खेल खडा करके भगवान की आँखों में धूल झोँककर भक्ति का फल प्राप्त करना चाहते हैं। वस्तुत: न तो भगवान इतना भोला है,न ही कोई देवी-देवता इतना सीधा सरल, मूर्ख है और न ही कोई ऎसा मन्त्र आज तक बन पाया है कि जिसे कुछ बार जप-रटकर मनचाहा लाभ प्राप्त किया जा सके। पूजा-उपासना का भी एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है। आध्यात्म विद्या को एक समग्र साईंस ही कहना चाहिए, जिसके नियम और प्रयोजनों को समझकर तदनुकूल चलने से ही किसी प्रकार का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले हमे अपने अन्तरंग में पडे हुए पददलित, मूर्च्छित, मलिन, विभूक्षित उपास्यदेव को संभालने, सहेजने का प्रयास करना होगा। उन्हे समर्थ ओर बलवान बनाना होगा। इस प्रथम सोपान को पूरा करने के पश्चात ही मन्त्र, जप, उपासना,स्त्रोत्र,चालीसा आदि का चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाना चाहिए। इस विधि से ही आप निराशा,अविश्वास ओर असमंजस की स्थिति से बचकर उपासना, मंत्र जाप इत्यादि का मनोवांछित लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

( आगामी पोस्ट में कुछेक सर्वसाधारण किन्तु सर्वलोकहितकारी मन्त्र आधारित उपायों के बारे में जानकारी प्रदान की जायेगी, जिन्हे अपनाकर आप स्वयं अपने जीवन में होने वाले परिवर्तनों को अनुभव कर सकते हैं )