सच कहा गया है कि "गुरू(भाग्येश) डूबते हुए को उबार लेता हैं"

वेद,पुराण,शास्त्र,उपनिषद इत्यादि सभी गुरू की महिमा का बखान करते नहीं थकते। न सिर्फ आध्यात्म अपितु ज्योतिष में भी यही कहा गया है कि आत्मिक उन्नति के लिए गुरू की सहायता परमावश्यक है। इसके बिना मनुष्य के आत्म कल्याण का द्वार नहीं खुल सकता।
सामान्य जीवन क्रम में माता,पिता और शिक्षा देने वाले गुरू को देव माना गया है और उनकी अभ्यर्थना, सेवा समान रूप से करते रहने का निर्देश दिया गया है। सामान्य अर्थ में हम एक शिक्षक को गुरू कह लेते हैं। साक्षरता का अभ्यास कराने वाले, दस्तकारी, कला, व्यायाम आदि क्रिया कौशलों को सीखाने वाले, आध्यात्म का मार्ग दिखाने वाले तथा ओर तो ओर असाधारण चातुर्य में प्रवीण हरफनमौला तीन तिकडमी आदमी को भी व्यंग्य भाव से "गुरू" कह दिया जाता है। अब यह तो प्रचलन की बात हुई--जिसमें नुक्ताचीनी करने की न तो गुंजाईश ही है ओर न ही कोई जरूरत। वैसे आज के इस युग में गुरूओं (और शिष्यों का भी) का वर्तमान स्वरूप कुछ ऎसी स्थिति में पहुँच चुका है कि जिसे देखकर कोई भी विचारशील व्यक्ति इसे अनावश्यक ही नहीं बल्कि अवांछनीय भी कह सकता है।
खैर हम बात करते हैं वैदिक ज्योतिष की, यहाँ जिस गुरू तत्व की महिमा और आवश्यकता का निरूपण किया गया है----वह इस प्रचलित विडम्बना के साथ कैसा भी कोई तालमेल नहीं रखता। इनमें सिर्फ शब्द साम्य भर है जब कि तात्विक अन्तर तो उनके बीच में जमीन आसमान जितना है। ग्रन्थों में वर्णित गुरू और आज के प्रचलित गुरू वस्तुत: एक दूसरे से सर्वदा भिन्न है।     

जिस गुरू ग्रह की महिमा का बखान वैदिक ज्योतिष में ग्रन्थकारों द्वारा किया गया है, "यत्पिण्डे च ब्राह्मंडे" के सिद्धान्तानुसार वह वस्तुत: हमारा मानवी अन्त:करण ही है। निरन्तर सदशिक्षण और उर्ध्वगमन का प्रकाश दे सकना इसी केन्द्र तत्व के लिए सम्भव है। इन्सान को जीवन में पग पग पर---क्षण प्रतिक्षण किसी न किसी समस्या से दोचार होना पडता ही रहता है। इनमें से किस समस्या का किस प्रकार समाधान किया जाए?---इसके मार्गदर्शन के लिए किसी व्यक्ति विशेष पर तो निर्भर रहा नहीं जा सकता, भले ही वो कितना भी विद्वान क्यूं न हो। और वैसे भी दूसरों की स्थिति में भिन्नता रहने से परामर्श का स्तर तो बदल ही जाता है-----इसलिए आवश्यक नहीं कि किसी के द्वारा दिया गया परामर्श हमेशा सही ही निकले। तो फिर वो गुरू (या कहें कि मार्गदर्शक) कौन है जिसके बारे में ये तक कहा जाता है कि वो डूबते हुए को उबार देता है-----वास्तव में वो गुरु है हमारा अन्त:करण।

अपने अन्त:करण (गुरू) को निरन्तर कुचलते रहने से, उसकी आवाज को अनसुनी करते रहने से आत्मा (सूर्य) की आवाज मन्द पडती जाती है। पग पग पर अत्यन्त आवश्यक और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रकाश देते रहने का उसका क्रम शिथिल होने लगता है। आत्मा की अवज्ञा करते रहने वालों को ही दुर्बुद्धिग्रस्त और दुष्कर्मों में लिप्त पाया जाता है अन्यथा सजीव आत्मा की प्रेरणा सामान्य स्थिति में इतनी प्रखर होती है कि कुमार्ग का अनुसरण कर सकना मनुष्य के लिए संभव ही नहीं होता। इस आत्मिक प्रखरता को जागृ्त बनाए रखना ही गुरू का कार्य है। जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में पंचमेश (lord of 5th house) पर गुरू (भाग्येश/lord of 9th house) की दृ्ष्टि हो तो ऎसा व्यक्ति मानवोचित चिन्तन कर्तृ्व्य से कभी विरत नहीं हो सकता। जैसे ही अचिन्त्य चिन्तन मन:क्षेत्र में (चन्द्रमा पर दूषित प्रभाववश) उभरता है, वैसे ही उसका प्रतिरोधी "गुरूत्व" उसके दुष्परिणामों के संबंध में सचेत करता है और भीतर ही भीतर (ग्रहों के सामूहिक प्रभाववश) एक अन्तर्द्वन्द उभरने लगता है। यदि अन्त:चेतना(गुरू) को कुचल कुचल कर मूर्च्छित न किया गया हो तो वह इतनी प्रखर होती है कि अचिन्त्य चिन्तन (राहू) के साथ विद्रोह खडा कर देती है और उस अवांछनीय विजातीय तत्व के पैर उखाड कर ही दम लेती है।
मानव के रक्त में विद्यमान श्वेतकण (केतु) शरीर में रोग विषाणुओं के प्रवेश करते ही उनसे लडने के लिए एकत्रित हो जाते हैं और उन विषाणुओं को पूरी तरह से खदेड देने तक प्रबल संघर्ष करते रहते हैं। रक्त को पहले से ही विषाक्त बना लिया गया हो तो बात दूसरी है अन्यथा ये श्वेत रक्त कण शरीर को रोगों के आक्रमण से बचाए रखने के अपने उत्तरदायित्व का पूरी तरह् से निर्वहण करते हैं। ठीक उसी प्रकार से चेतना के क्षेत्र में अन्त:करण (गुरू) द्वारा यही उत्तरदायित्व निभाया जाता है। अनैतिक और निकृ्ष्ट स्तर का कोई विचार (राहू) उस मस्तिष्क में देर तक अपने पैर नहीं जमा सकता; जिसका संरक्षण आन्तरिक "गुरू" सतर्कतापूर्वक कर रहा है। सदविचारों की रक्षा पंक्ति को भेदकर मानवी चेतना (चन्द्रमा) पर दुर्विचारों का आधिपत्य जम सकना तभी संभव होता है जब अन्तरात्मा (सूर्य) मूर्च्छित या मृ्तक स्थिति में पहुँचा दी गई हो।
आप सब भली भान्ती जानते हैं कि जीवन में कैसा भी कोई कुकर्म, अनैतिक कार्य करते समय हमारा अन्त:करण अपना विद्रोह अवश्य प्रकट करता है। यदि कुंडली में शनि शुभ प्रभाव में हुआ तो पैरों का कांपना, सूर्य के शुभ होने पर ह्रदय गति बढ जाना, मंगल शुभ होने पर पसीना आना, चन्द्र के शुभ होने से गला सूखना तथा केतु के शुभ होने से चक्कर आना इत्यादि ओर भी न जाने क्या क्या घटित होने लगता है। यदि ध्यानपूर्वक देखें तो अनैतिक कर्म की ओर कदम बढाते समय हमारे शरीर की भीतरी स्थिति कुछ ऎसी होती है कि मानो किसी निरीह पशु को वध करने के लिए ले जाते हुए कातर निरीह स्थिति में देखा जा रहा हो। सामान्य व्यक्तियों में से अधिकांश की आन्तरिक स्थिति ऎसी हो जाती है कि वे उस अवांछनीय कार्य को पूरा कर ही नहीं पाते, विचार अधूरा छोडकर या असफल होकर वापिस लौट आते हैं। वस्तुत: यह पराजय------यह असफलता हमारे शरीर में स्थित ग्रहों के सामूहिक प्रभाववश उत्पन हुए उस अन्तर्द्वन्द द्वारा ही की गई होती है, जो कुकृ्त्य न करने के पक्ष में प्रबल प्रतिपादन कर रहे थे। मन (चन्द्रमा), आत्मा (सूर्य),स्नायु (शनि),रक्त (मंगल) इत्यादि सभी अपने अपने तरीके से मानवी अन्त:करण (गुरू) के रक्षार्थ तत्पर रहते हैं।
"गुरू डूबते हुए को उबारते हैं" वाली उक्ति की सत्यता जीवन मे कुछ ऎसी ही परिस्थितियों के समय देखने को मिलती है।

विशेष ध्यानार्थ:-  जैसा कि मैं अपने पिछले कुछ लेखों के माध्यम से पहले भी यह बात कह चुका हूँ कि वास्तविक ज्योतिष एवं आजकल के समय में प्रचलित ज्योतिष में ग्रहों की शाब्दिक परिभाषा में जमीन आसमान का अन्तर है। जैसे कि वर्तमान ज्योतिषी गुरू शब्द को बृ्हस्पति मान कर चल रहे हैं जब कि वास्तविक अर्थों में गुरू एक प्रकार का पद सूचक शब्द है---यानि कि ज्योतिष में जन्मकुंडली के नवम भाव के स्वामी (चाहे कोई भी हो) के लिए गुरू शब्द का प्रयोग किया गया है--न कि बृ्हस्पति के लिए। इसी प्रकार से अन्य ग्रहों के विषय में भी समझना चाहिए।
इस वर्तमान आलेख में भी जहाँ जहाँ, जिस जिस ग्रह सूचक शब्द का प्रयोग किया गया है, उन्हे अपनी जन्मकुंडली अनुसार निम्नवत समझें:-----
1.सूर्य अर्थात पंचमेश (lord of 5th house)
2.चन्द्रमा अर्थात चतुर्थेश (lord of 4th house)
3.मंगल अर्थात लग्नेश (lord of 1st house)
4.शनि अर्थात कर्मेश (lord of 10th house)
5.राहू अर्थात षष्ठेश (lord of 6th house)
6.केतु अर्थात द्वादशेश (lord of 12th house)
7.गुरू अर्थात नवमेश (lord of 9th house)
 (एक ओर बात कि ज्योतिषीय परामर्श हेतु सम्पर्क करने वाले बहुत से पाठकों द्वारा अक्सर मुझसे जीवन से जुडी किन्ही समस्यायों इत्यादि के निवारणार्थ समाधान/उपायों की जानकारी देने का आग्रह किया जाता रहा है। किन्तु किन्ही कारणवश इस आग्रह को कभी मैं स्वीकार नहीं कर पाया। लेकिन अब विचार बन रहा है कि यदा कदा मान्त्रिक (मन्त्र पूजा आधारित) उपाय संबन्धी जानकारी भी दी जाए। संभव है कि आगामी पोस्ट शायद इसी विषय पर आधारित हो...............