फलित ज्योतिष संकेत सूत्र के माध्यम से गजकेसरी योग का विवेचन

पिछली पोस्ट में हम फलित ज्योतिष में पाराशरी राजयोगों पर बात कर रहे थे तो उसी विषय पर आगे बढते हुए सबसे पहले तो हमें ग्रहों के कारकत्व को समझना होगा। कारकत्व दो प्रकार के होते हैं--नैसर्गिक (स्वाभाविक) और तात्कालिक। ज्योतिष ग्रन्थों में जो विभिन्न ग्रहों के गुण,धर्म, वर्ण, कारकत्व की बात कही जाती है जैसे कि चन्द्र को सुख,सूर्य को आत्मा,शुक्र को वीर्य,बुध को बुद्धि या शनि को दुख का कारक कहा जाता है तो उसका अर्थ निसर्ग या प्रकृति से संबंध रखने के कारण उनके नैसर्गिक (स्वाभाविक,सहज,प्राकृ्तिक,प्राकृ्त) धर्म/कारकत्व से होता है,जो अपरिवर्तनीय हैं और जिन्हे समूचे जगत के परिपेक्ष्य में देखा जाता हैं। किन्तु जब बात व्यक्तिगत फलकथन की हो तो वहाँ ग्रहों के नैसर्गिक कारकत्व कोई मायने नहीं रखते, वहाँ सिर्फ उस जन्मकुंडली में भावाधिपति से विचार किया जाना चाहिए। जैसे कि नैसर्गिक (कालपुरूष) कुंडली में चन्द्रमा को चतुर्थ भाव का स्वामी होने के चलते उसे चतुर्थ भाव से संबंधित सभी पदार्थों/विषयों/गुणों का कारकत्व प्राप्त है तो यदि किसी व्यक्ति का जन्म वृ्ष लग्न में हुआ है तो वहाँ चतुर्थ भाव का स्वामित्व सूर्य को प्राप्त हो जाता है---यहाँ उस व्यक्ति के सम्पूर्ण सुख,दुख,सांसारिक वैभव,यश-मान इत्यादि विचारणीय विषयों का दायित्व सूर्य ग्रह के अधीन आ जाता है। नैसर्गिक रूप से वृ्हस्पति को (कालपुरूष कुंडली में) भाग्येश होने के कारण ही गुरू कहा जाता है लेकिन वृ्ष लग्न में वही समस्त गुण जो कि नैसर्गिक रूप से वृ्हस्पति को प्राप्त हैं, शनि ग्रह में आ जाते हैं क्यों कि प्रकृ्ति/ईश्वरीय शक्ति द्वारा यहाँ उसे भाग्य भाव का उतरदायित्व(कार्यभार)सौंप दिया गया है। नैसर्गिक रूप से वृ्हस्पति जिन गुणों,प्रवृ्तियों,वस्तुओं,पदार्थों का कारक हैं, यहाँ भाग्येश पद प्राप्त होते ही तात्कालिक रूप वो समस्त कारकत्व शनि को प्राप्त हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार से अन्य ग्रहों के विषय में भी समझना चाहिए---कि नैसर्गिक रूप से जिस भी ग्रह को जो कारकत्व प्रदान किए गए हैं, तात्कालिक रूप में वो समस्त कारकत्व जन्मकुंडली के उस भाव विशेष के अधिपति के माध्यम से प्रकट होते हैं।
इस विषय के अनजान लोगों के लिए यह गोरखधंधा छोडा उलझन-भरा हो सकता है । जहाँ कुछ लोगों के लिए इसे समझना आसान हैं तो कुछ लोगों को ये गलत भी लग सकता हैं । पर वस्तुस्थिति दूसरी ही है। संकेत-सूत्रों की इस विधि में ही ज्योतिष फलादेश के समस्त गूढ रहस्य समाहित हैं। किन्तु जिन्हे मूल भाषा के अज्ञान तथा सिर्फ भाषा टीकाओं पर आश्रित रहने के चलते न तो समझा जा रहा है और न ही समझा जा सकता है। क्यों कि टीकाकार का कार्य सिर्फ एक भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद करना भर होता है। भाषा विद्वान होने के चलते ये आवश्यक नहीं कि वो ग्रन्थकर्ता की मूल भावना,मंतव्य की भी समझ रखता हो। हमारे प्राचीन शास्त्रों में वर्णित ज्ञान-विज्ञान के सही रूप में सामने न आ पाने के कारणरूप में यही समस्या जुडी हुई है। क्यों कि जहाँ वास्तविक एवं विशुद्ध ज्ञान कर्ता भाव से मुक्त होने के कारण निभ्रम की स्थिति निर्मित करता हैं, वहीं उसकी भावरहित गलत व्याख्या भ्रम उत्पन कर ज्ञान के अज्ञान में बदल जाने का कारण भी बन जाती है। 

चलिए अब जरा गजकेसरी योग तथा उसके फलों के बारे में बात करते हैं:-------
केन्द्रे देवगुरौ लग्नाच्चन्द्राद्वा शुभदृग्‌युते।
         नीचास्तारिगृहैर्हीने योगोऽयं गजकेसरी॥ 
गजकेसरीसञ्जातस्तेजस्वी धनवान्‌ भवेत्‌।
         मेधावी गुणसम्पन्नो राजप्रियकरो नरः॥
 
परिभाषा:- चन्द्रमा से केन्द्र में गुरू हो तो गजकेसरी योग निर्मित होता है।
जैसा कि ऊपर वर्णित किया गया है कि यहाँ चन्द्रमा से भावार्थ चतुर्थेश (lord of 4th house) तथा गुरू से तात्पर्य जन्मकुंडली में नवम भाव के स्वामी (lord of 9th house) से है। अब चतुर्थेश-नवमेश की ये केन्द्र स्थिति किसी भी जन्मकुंडली में तीन प्रकार से निर्मित हो सकती है। 
1.दोनों ग्रहों एक दूसरे से समसप्तक योग अर्थात आमने सामने स्थित हों
2.दोनों ग्रहों में चतुर्थ-दशम सम्बंध हो अर्थात एक ग्रह दूसरे से चतुर्थ या दशम भाव दूर हो
3. जब दोनों ग्रहों की एक ही भाव में युति हो

फल:- यहाँ तीन प्रकार के फलों की बात आती है:---

1.जातक धनवान होगा----------(आर्थिक फल)
2.जातक राजप्रिय (शासन सत्ता से सम्बंध एवं सम्मान) होगा-------(सामाजिक फल)
3.जातक मेधावी एवं गुण सम्पन्न होगा-----------(शारीरिक,व्यक्तित्व संबंधी फल)
अब सबसे महत्वपूर्ण बात जो आती है, वो है योग के फल प्राप्ति की। ऎसा नहीं है कि यदि किसी जातक की कुंडली में राजयोग है तो उसे अपने जीवन में, राजयोग के बारे में बताए गये सभी फलों की प्राप्ति होगी ही। ऊपर जो इस योग के सम्पूर्ण फलों को तीन श्रेणीय़ों में बाँटा गया है, वो तीनों प्रकार के फल योग निर्मित होने की तीन अलग अलग प्रकार की स्थितियों पर निर्भर करते हैं----
----यदि योग ग्रहों की समसप्तक स्थिति से निर्मित होता है तो ये गजकेसरीयोग जातक के भौतिक पक्ष को सुदृ्ड करता है।
----ग्रह युति सम्बंध उसे प्राप्त होने वाले शारीरिक एवं व्यक्तित्व सम्बन्धी फलों(बुद्धि,ज्ञान,प्रतिभा,गुणग्राहता) को दर्शाता है। ऎसा जातक गुण सम्पन्न एवं मेधावी होगा  किन्तु आवश्यक नहीं कि वो आर्थिक रूप से भी सम्पन्न होगा ही।
----चतुर्थ-दशम सम्बंध से बनने वाला गजकेसरी योग यश-मान, प्रतिष्ठा एवं शासन सत्ता से संबंध तथा उसकी ओर से प्राप्त होने वाले सम्मान इत्यादि के रूप में उसकी सामाजिक स्थिति को उन्नत करता है।

अवश्य ही कुछ लोगों के मन मे फलों के आर्थिक, सामाजिक एवं व्यक्तित्व रूप में वर्गीकरण तथा फल प्राप्ति की स्थितियों के निर्धारण के विषय में जानने की उत्सुकता अथवा कुछ सवाल उत्पन हो रहे होंगें। इस विषय को विस्तारपूर्वक अलग से किसी पोस्ट में स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा---