फलित ज्योतिष में विभिन्न राजयोगों की वास्तविकता (बद्धमूल धारणाओं के निराकरण का एक प्रयास)

एक व्यक्ति ताज्जीवन ज्योतिषियों को अपनी जन्मपत्री दिखाता रहा और प्रत्येक ज्योतिषी नें उसकी जन्मपत्री देखकर उसके बारे में यही फलकथन किया कि आपकी जन्मकुंडली में तो अलाना फलाना राजयोग है, आप जीवन में बहुत उन्नति करेंगें किन्तु फिर भी यह व्यक्ति आजीवन वनवासी तथा धनाभाव से त्रस्त रहा। यद्यपि ज्योतिषीय ग्रन्थों के अनुसार उसकी जन्मपत्री में राजयोग है तथापि यह व्यक्ति जीवनभर दुःख ही भोगता रहा। उसे पत्नी,संतान एवं समाज सबसे तिरस्कृत होना पड़ा। उस व्यक्ति को अपने इस जीवन में तो उस कथित राजयोग का कोई भी फल प्राप्त नहीं हुआ। आखिर ऎसा क्यूं हुआ? क्या उसके बारे में भविष्यवाणी करने वाले सभी ज्योतिषी अल्पज्ञानी थे या राजयोगों में ही कोई सच्चाई नहीं है या फिर ये ज्योतिष एक विद्या न होकर के सिर्फ एक तुक्काशास्त्र है ? वास्तव में न तो वें ज्योतिषी गलत थे, न ज्योतिष विद्या और न ही वैदिक ज्योतिष में दिए गए विभिन्न योग,कुयोग,राजयोग इत्यादि ही गलत हैं...गलत है तो सिर्फ हम लोगों का दृ्ष्टिकोण...हम लोगों की समझ।
आज वैदिक ज्योतिष के अधिकांश मूल ग्रन्थ काल कलवित हो चुके हैं। बाजार में उपलब्ध सभी पुस्तकें चन्द लोगों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर लिखी गई व्याख्याओं,टीका-टिप्पणियों पर आधारित हैं। बल्कि ज्योतिष का समस्त ज्ञान ही इन व्याख्याओं पर आधारित होकर रह गया है। आधुनिक काल के चन्द नवीन आचार्य और लेखक फलित ग्रन्थों की अपने मत,ज्ञान,समझबूझ और विचारधारा से जो व्याख्याएं लिख गये हैं,आज समस्त ज्योतिष विद्या सिर्फ इन्ही व्याख्याओं,टीका-टिप्पणियों पर आश्रित होकर रह गयी है। अब व्याख्याकार ने तो संस्कृ्त श्लोकों की अपने हिसाब से व्याख्या कर दी, चाहे उसमें मूल ग्रन्थकार की भावना कुछ भी रही हो। अब जब ज्योतिष के नवीन विद्यार्थियों को न तो संस्कृ्त का ज्ञान है, न पुरातन ग्रन्थों की भाषा शैली की जानकारी है और न ही मूल ग्रन्थों तक उसकी पहुँच ही है तो फिर वो तो उन अनुवादित पुस्तकों में लिखे को ही असली ज्योतिष मानकर चलता रहेगा। उसका सारा ज्ञान इन भाषा टीकाओं पर आश्रित है।
आज यही हो रहा है कि एक तो संस्कृ्त भाषा का अज्ञान और दूसरे मूल ग्रन्थों की अनुपलब्धता के चलते जो कुछ टीका ग्रन्थों में पढा,सीखा उसी को ज्योतिष के नियम,सिद्धान्त मानकर जहाँ स्वयं के ज्योतिष ज्ञानी,विद्वान होने के भ्रम में जी रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यही अज्ञान ज्ञान के नाम से आगे वितरित होता जा रहा हैं।
आदिकाल से भारतीय ज्योतिष का मुख्य प्रयोजन आत्मकल्याण के साथ साथ लोकव्यवहार को सम्पन्न करना रहा है। लोक-व्यवहार के निर्वाह हेतु ज्योतिष के क्रियात्मक दो सिद्धान्त हैं---गणित एवं फलित ज्योतिष। यदि आप भारतीय ज्योतिष के ईस्वी पूर्व के साहित्य का सूक्ष्म दृ्ष्टि से निरीक्षण करें तो आपको ज्ञात होगा कि गणित खंड के मूल ग्रन्थों में जहाँ चन्द्र,शनि,गुरू,भौम इत्यादि जिन ग्रहसूचक शब्दों का प्रयोग आकाशीय ग्रहों के लिए किया गया है----- वहीं पाराशर,वाराहमिहिर,श्रीपति,कल्याणवर्मा,श्रीधर,ढुंढिराज इत्यादि प्राचीन विद्वान ग्रन्थकारों के फलित आधारित जितने भी ग्रन्थ हैं, वहाँ इन शब्दों से भावार्थ आकाशीय पिंड न होकर के कालपुरूष (मेष लग्न) की कुंडली के विभिन्न भावाधिपतियों से है। फलित के समस्त ग्रन्थों की रचना सिर्फ कालपुरूष को आधार मानकर की गई है।
इसे आप यूँ भी समझ सकते हैं कि जिस प्रकार प्रधानमन्त्री,राष्ट्रपति, मुख्यमन्त्री इत्यादि शब्द व्यक्तिसूचक न होकर पद सूचक शब्द हैं, ठीक उसी प्रकार फलित ज्योतिष के विभिन्न ग्रन्थों में जहाँ जहाँ बृ्हस्पति, सूर्य, शनि, चन्द्र इत्यादि शब्द प्रयुक्त किए गये हैं वो ग्रहों के नाम न होकर के जन्मकुंडली में विभिन्न भावों के अधिपतियों के सूचक हैं। यदि कहीं गुरू (बृ्हस्पति) शब्द का प्रयोग किया गया है तो उसका अर्थ आकाशमंडल में भ्रमणशील उस बृ्हस्पतिग्रह से न होकर कालपुरूष की जन्मकुंडली में भाग्य भाव के स्वामी से समझना चाहिए.....ऎसे ही चन्द्रमा का अर्थ यहाँ चतुर्थेश से है न कि चन्द्रमा ग्रह से।
मसलन गजकेसरी योग को ही लीजिए---इसे कुछ इस तरह से परिभाषित किया जाता है कि "यदि चन्द्रमा से केन्द्रस्थान में बृ्हस्पति हो तो गजकेसरी योग बनता है"। वास्तव में यहाँ ग्रन्थकार के कहने का भावार्थ चन्द्रमा और बृ्हस्पति ग्रह से न होकर के सुखेश (lord of fourth house) और भाग्येश (lord of ninth house) से है। कालपुरूष की जन्मकुंडली में अवश्य ही चन्द्रमा को सुखेश तथा बृ्हस्पति को भाग्येश का पद प्राप्त है किन्तु विभिन्न जन्म लग्नों में सुखेश और भाग्येश के ये पद भिन्न भिन्न ग्रहों को प्राप्त होगें। जैसे कि वृ्ष लग्न में  सूर्य को चतुर्थेश एवं शनि को भाग्येश का पद प्राप्त हुआ है तो इस लग्न के जातकों के लिए सूर्य से शनि की केन्द्र स्थिति उनके लिए गजकेसरी योग का निर्माण करेगी। इसी प्रकार भिन्न भिन्न लग्नों हेतु ये योग भिन्न भिन्न ग्रहों पर निर्भर करेगा।
केन्द्रे देवगुरौ लग्नाच्चन्द्राद्वा शुभदृग्‌युते।
नीचास्तारिगृहैर्हीने योगोऽयं गजकेसरी॥ 
गजकेसरीसञ्जातस्तेजस्वी धनवान्‌ भवेत्‌।
         मेधावी गुणसम्पन्नो राजप्रियकरो नरः॥  (वृ्ह्तपाराशर)

अब जब फलित ज्योतिष की बात चल रही है तो लगे हाथ ये भी स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि ग्रन्थों में राजयोग,दुर्योग,भाग्ययोग इत्यादि विभिन्न योगों के जो फल कहे गये हैं----उनमें कहीं कोई त्रुटि नहीं है। अगर जन्मकुंडली में किसी प्रकार का कोई योग विद्यमान है तो वो अवश्य फलीभूत होगा। अपने पूर्वजन्म कृ्त कर्मों के अनुसार इस जीवन में प्राप्त होने वाली सफलता, सम्पन्नता, यश, श्रेणी,स्थिति और भाग्य/दुर्भाग्य की सीमा किसी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में मौजूद विभिन्न योगों पर निर्भर करती है। दूसरे शब्दों में, विभिन्न ग्रहस्थितियों द्वारा बनने वाले ये योग भौतिक और मन: प्रवृ्तियों के फल को दर्शाते हैं, जो हमारे जीवन की परिस्थितियाँ नियत करते हैं।
गजकेसरी योग सहित कुछ अन्य राजयोगों के फल के बारे में अगली पोस्ट में ये चर्चा जारी रहेगी......