जन्मकुंडली में विद्यमान विभिन्न राजयोगों की वास्तविकता (भाग 1)

दुनिया में प्रतिक्षण न जाने कितने प्राणी जन्म लेते हैं और कितने ही काल का ग्रास बन जाते हैं। जब बच्चा जन्म लेता है तो उस बच्चे की माता को भी उसके भविष्य के संबंध में तनिक भी कल्पना नहीं होती। लेकिन दुनिया में जो व्यक्ति कोई बहुत बडा राजनीतिज्ञ बन जाए, कोई मशहूर कलाकार,खिलाडी बन जाए या कोई महापुरूषों की श्रेणी में शामिल हो जाए तो अक्सर ये देखने में आता है कि उनका नाम या पराक्रम जब समाज पर छा जाता है, तभी जाकर ज्योतिषी, अंकशास्त्री वगैरह लोग उनकी जन्मकाल, तिथि, मास और शुभाशुभ योगों की गणना करने लग जाते हैं। कोई कहता है कि इनकी जन्मकुंडली में ये योग था,जिसके कारण इन्होने जीवन में ये मुकाम हासिल किया तो कोई अंकों की गणना करने बैठ जाता है कि इस अंक नें इन्हे सफल मनुष्यों की श्रेणी में ला खडा किया। यानि कहने का मतलब ये है कि जब तक व्यक्ति एक साधारण मनुष्य का जीवन जी रहा है तो तब तक तो किसी भी ज्योतिषी, अंकशास्त्री को उसकी जन्मपत्रिका में कोई विशेष बात नजर नहीं आती लेकिन जहाँ उस व्यक्ति नें कोई विशेष उपलब्धी प्राप्त की नहीं कि ज्योतिषियों के भी ज्ञानचक्षु खुलने लगते हैं। उसके बाद ही उन्हे उस व्यक्ति का जन्मकाल अलौकिक लगने लगता है, नक्षत्र ऊँचे और अनुकूल प्रतीत होते हैं, उनकी जन्मपत्रियों में अलाने फलाने राजयोग दिखलाई देने लगते हैं।
कल परसों की बात है, दिल्ली से प्रकाशित होने वाली एक ज्योतिष पत्रिका पढ रहा था, जिसमें एक विद्वान ज्योतिषी बाला साहेब ठाकरे,सचिन तेन्दुलकर,अमिताभ बच्चन,मनमोहन सिँह, हिटलर,सुभाष चन्द्र बोस, मुलायम सिँह यादव,सम्राट अकबर,सद्दाम हुसैन,भगवान बुद्ध इत्यादि इत्यादि ख्यातिलब्ध लोगों,महापुरूषों की जन्मकुंडलियों में विद्यमान तरह तरह के राजयोगों का विश्लेषण करने में जुटे हुए थे। मजे कि बात ये कि जिन जिन लोगों की जन्मकुंडलियाँ उसमें छापी हुई थी उनमें से आधे से अधिक लोगों को तो स्वयं को ही अपनी जन्मतारीख या सही जन्मसमय नहीं पता होगा लेकिन विद्वान ज्योतिषी के पास सबकी जन्मकुंडलियाँ(अधिकाँश बिना जन्म समय के)मौजूद हैं :)। दूसरी बात ये कि उन्होने अधिकतर कुंडलियों में जातक की उच्चतर आर्थिक,सामाजिक स्थिति के लिए गजकेसरी नामक योग को कारण बताया, जो कि प्रचलित मान्यता अनुसार बृ्हस्पति एवं चन्द्रमा की केन्द्र स्थिति से निर्मित होता है। अब सभी कुंडलियों में तो गजकेसरी योग मौजूद नहीं था लेकिन उन्होने लग्न से केन्द्र, चन्द्रमा से केन्द्र, सूर्य से केन्द्र, मंगल से केन्द्र यानि कैसे भी करके प्रत्येक कुंडली में इस योग को फिट कर ही दिया।

ये सब देखकर लगने लगा है कि आज ये विद्या अपनी सत्यता से कितनी दूर निकल आई है। प्राचीन वैदिक, ज्योतिषीय ग्रन्थों में जो सत्य समाहित है,वो अधिकतर रूपकों और अभिप्रायो की सहायता से प्रकट किया गया है।लेकिन उन आवरणों को हटाकर उनके अभिप्रायों को पहचानने की बजाय आज अधिकतर ज्योतिषी अनुसन्धानों,आविष्कारों के नाम पर अपने अपने मन के कपोल कल्पित सिद्धान्तों,नियमों के ऎसे आवरण चढाते चले जा रहे है कि जिसके नीचे वास्तविक ज्ञान कहीं गहरे छिपता चला जा रहा है। यदि सच्चाई को पहचानना है तो प्राचीन शास्त्रों, ग्रन्थों की अन्त:कुक्षी में सत्य के जो बीज मन्त्र छिपे हैं, उन्हे फिर से खोज निकालना होगा। उन रूपकों और अभिप्रायों की जो बारहखडी है, उसको युक्ति से अर्थाना होगा न कि कपोल कल्पित सिद्धान्तों के अपने दिमागी कचरे से इस ज्ञान गंगा को एक नाले में तब्दील करते रहें।

यदि समय नें इजाजत दी तो आगामी कुछ लेख इसी विषय पर आधारित होंगें...जिनके जरिए प्राचीन रूपकों, अभिप्रायों तथा विभिन्न योगों की वास्तविकता को समझने का प्रयास करेंगें........