अन्धविश्वास का फतवा देने की अपेक्षा सत्य को सामने लाने का प्रयास किया जाना चाहिए!!!!!!!

अब इसे चाहे समय का प्रभाव कहा जाए या कुछ ओर लेकिन आज यहाँ स्थिति कुछ इस प्रकार की बन चुकी है कि ज्योतिष, मन्त्र, यन्त्र, तन्त्र, हस्तरेखा, वास्तुशास्त्र, तीर्थयात्रा, कर्मकाँड इत्यादि पर किसी के विश्वास को अगर एक मूर्ख व्यक्ति अन्धविश्वास कहने लगे तो उसके साथ एक नहीं बल्कि अपने आप को महाबुद्धिमान समझने वाले बीसियों तथाकथित बुद्धिजीवियों (?) की जमात खडी हो जाती है।
माना कि ठगी और ढोंग पाखंड की केवल निन्दा ही नहीं की जानी चाहिए बल्कि उसकी उपेक्षा ओर प्रतिवाद भी आवश्यक है। अन्यथा यूँ ही लोगों की भावनाओं का शोषण ओर दोहन होता रहेगा। लेकिन यहाँ यह भी आवश्यक है कि दूर खडे रहकर उंगली उठाने की अपेक्षा पहले किसी विषय के अस्तित्व ओर उसकी गहराई को मापने का प्रयास कर लेना चाहिए।

इसी विषय में मुझे सुप्रसिद्ध वैज्ञनिक डा.एहरन वर्ग के जीवन से जुडा एक वाकया याद आ रहा है जो कि बहुत पहले मैने किसी विज्ञान पत्रिका में पढा था। वैज्ञानिक डा. एहरन वर्ग हमेशा अपने गले मे एक तुलसी की लकडी का टुकडा पहने रहते थे। एक बार किसी सज्जन मित्र नें उनसे पूछ लिया कि डा. साहिब, लगता है कि आप शायद भारत घूम आए हैं। वैज्ञानिक महोदय ने पूछा कि आपने ऎसा क्यों कहा तो वो सज्जन कहने लगे कि " आप हमेशा गले में जो ये पहने रहते हैं, सुना है कि ऎसी चीजें सिर्फ भारत में ही पहनी जाती हैं। वहाँ के लोग बडे अन्धविश्वासी होते हैं, छोटे बच्चे से लेकर बूढे आदमी तक हर कोई कुछ न कुछ अजीब सी चीजें गले में पहने रहते हैं। कहते हैं कि इन्हे पहनने से भूत-प्रेत नजदीक नहीं फटकते या नजर वगैरह नहीं लगती"।
डा.एहरन उन सज्जन की बात सुनकर हँस पडे ओर बोले " मित्र ! पहली बात तो ये कि दुनिया में अन्धविश्वास जैसा कुछ नहीं होता। ओर रही बात भारत के लोगों की तो उसका सिर्फ एक कारण दिखाई देता है कि शायद वहाँ के लोग उचित ज्ञान के अभाव में सही बात का स्पष्ट विश्लेषण न कर पाते हों, किन्तु इन बातों को मात्र अन्धविश्वास न कहकर यह मानना चाहिए कि उनके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक आधार छुपे हुए हैं। यदि उन्हे खोज जा सके तो उनसे नईं वैज्ञानिक स्थापनाएं प्रकाश में आ सकती हैं। मैं जो ये तुलसी की लकडी पहने रहता हूँ---आप नहीं जानते ये मुझे सैंकडों प्रकार के रोग-कीटाणुओं से बचाती है। बीमारियों से रक्षा करती है"।

अब ये तो बात थी एक वैज्ञानिक व्यक्ति की जो कि तुलसी के गुणों, उसके वैज्ञानिक महत्व से भली भान्ती परिचित था, जिससे कि वो प्रश्नकर्ता को संतुष्टिपरक जवाब दे सका। लेकिन यही सवाल अगर एक आम आदमी से किया जाता, जो कि अपने विश्वास के मूल में स्थित किन्ही वैज्ञानिक तथ्यों से नितांत अपरिचित होता है तो वो भला इसका क्या जवाब दे सकता था। उसके पास तो सिर्फ उसकी श्रद्धा,विश्वास ही है जो उसे इन सब चीजों के लिए प्रेरित करता है। ऎसी दशा में हमें विश्वास/अन्धविश्वास की सीमा निर्धारित करते हुए प्राचीन मान्यताओं,परम्पराओं के सम्बंध में थोडा उदार दृ्ष्टिकोण ही रखना चाहिए और विज्ञान बुद्धि द्वारा यथार्थता तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए। वास्तव में आज हमारे समाज में प्रचलित सैकडों, हजारों विश्वास ऎसे हैं, जिनके पीछे खडा सच व्यक्त होने की बाट जोह रहा है। लेकिन वो सच कैसे सामने आ सकते हैं--- जरूरत सिर्फ इस पर विचार करने की है।