ज्योतिषी का अर्थ सर्वज्ञाता होना नहीं हैं.........किसी भी विषय के जानकार की भान्ती ही ज्योतिषी की भी अपनी एक सीमा होती है।

किसी भी विषय का सामान्य ज्ञान जनसाधारण को न हो पाने की दशा में उस विषय के प्रति समाज में अनेक भ्रान्तियाँ उत्पन हो जाती है। ज्योतिष जो कि अपने आप में एक सम्पूर्ण विज्ञान है, परन्तु इसका विधिवत अध्ययन/अध्यापन न होने के कारण ही आज इसका वैज्ञानिक रूप अज्ञानता के बादलों में खोया हुआ है।
प्राचीन भारत में ज्योतिष विद्या को एक सम्पूर्ण विज्ञान का दर्जा प्राप्त था। रामायण व महाभारत काल में सभी ऋषि ज्योतिष का पूर्ण ज्ञान रखते थे। उस समय की शिक्षा में शस्त्र विद्या के साथ ज्योतिष विज्ञान  गुरूकुलों में अध्ययन का प्रमुख विषय हुआ करता है। अत: स्पष्ट है कि उस समय के समाज में मनुष्य की विद्वता का एक पहलू ज्योतिष विद्या का ज्ञान भी हुआ करता था । प्राचीन काल के ज्योतिष संबंधी अनेक ग्रन्थ आंशिक अथवा पूर्ण रूप में आज भी उपलब्ध हैं, जो इस बात को सिद्ध करते हैं कि प्राचीन काल में अध्ययन, अध्यापन में इस विषय का प्रयोग भली भान्ती किया जाता रहा है।
प्रत्येक कालखंड में विज्ञान की किसी एक विद्या का महत्व समय की परिस्थितियों के अनुसार अधिक होता रहा है। जैसे कि आज इस वर्तमान कालखंड में कम्पयूटर ने विज्ञान की अन्य विद्याओं को पृ्ष्ठभूमी में डाल दिया है। वर्तमान समय में आज जब अधिकतर मेधावी छात्र कम्पयूटर के क्षेत्र में अध्ययन की रूचि रख रहे हैं तो स्पष्ट है कि कुछ समय के लिए विज्ञान की अन्य विद्याओं का विकास ओर उस क्षेत्र में अन्वेषण की गति कम्प्यूटर की अपेक्षा कहीं कम हो रही है। ठीक इसी प्रकार सम्भव है कि पूर्व के किसी समय में परिस्थितिवश ज्योतिष का अध्ययन कहीं पृ्ष्ठभूमी में चला गया हो। इस विद्या का सही अध्ययन, अध्यापन न होने के कारण ही आज एक ओर तो ये विद्या अपने अधकचरे रूप में पोंगा पंडितों की स्वार्थ पूर्ती का साधन बनती जा रही है ओर वहीं दूसरी ओर जनसामान्य के बीच इसका महत्व विज्ञान के रूप में समझने की बजाय एक अबूझ पहेली बनता जा रहा है।
यद्यपि आज चाहे समाज के किसी भी वर्ग को देख लीजिए, आपको व्यक्तिगत रूप में ज्योतिषी से परामर्श लेता अवश्य मिल जाएगा लेकिन उन्ही में से अधिकतर लोग आपको ये कहते हुए ही मिलेंगें कि "मैं तो ज्योतिष वगैरह पर विश्वास ही नहीं करता। ये तो निरा ढोंग हैं"। यदि चाहूँ तो यहीं इसी ब्लागजगत के ही बीसियों व्यक्तियों के नाम आप लोगों को गिना सकता हूँ, जो कि निजी रूप में सिर्फ ज्योतिष परामर्श के कारण मेरे सम्पर्क में हैं। लेकिन वही लोग किसी छद्म बुद्धिजीवी के ब्लाग पर ज्योतिष के विरोध में उनकी हाँ में हाँ मिलाते इसे अन्धविश्वास,ढोंग कहना भी नहीं चूकते---लेकिन मेरी अन्तरात्मा को ये गवारा नहीं कि मैं किसी व्यक्ति का नाम यहाँ सार्वजनिक करूँ। किन्तु इतना जरूर कहूँगा कि ये किस प्रकार का मानसिक दौर्बल्य है कि जिस बात को हम निजी रूप में सहर्ष स्वीकार करते हैं,उसी को समाज के सामने स्वीकार करते हुए हिचकिचाने लगते हैं।
यह बात भी महत्वपूर्ण है कि समाज में जिस विषय का महत्व सभी लोगों के बीच व्यक्तिगत रूप से है , उस विषय का विकास यदि अन्वेषण व नवीन प्रयोगों द्वारा नहीं किया जाता है तो वह विषय अर्द्धज्ञानी व्यक्तियों के माध्यम से जनसामान्य के बीच केवल धन कमाने के एक माध्यम के रूप में सिमटकर रह जाता है। हम ज्योतिषी से परामर्श लेने को तैयार हैं लेकिन सार्वजनिक रूप में ज्योतिष के महत्व को स्वीकार करने में हिचकते हैं। इस द्विविधापूर्ण स्थिति से समाज के सामने इस विद्या के ऎसे ही अर्द्धज्ञानी अस्तित्व में आते रहेंगें जिनका मकसद आने वाले किसी भी व्यक्ति को चाहे भय दिखाकर या उसे प्रसन्न कर सिर्फ अपनी जेबें भरना ही होगा। अत: यह आवश्यक है कि इस विद्या की सामान्य जानकारी सभी उत्सुक व्यक्तियों को मिले, ताकि जनसामान्य इसे एक विज्ञान के रूप में समझ सके।
एक बात जो कि विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि किसी भी विषय के जानकार की भान्ती ही ज्योतिषी की भी अपनी एक सीमा है। इस सीमा के अन्दर ही ज्योतिषी को ज्ञान होगा। मान लीजिए एक ज्योतिषी जितना अच्छे से शारीरिक स्वास्थय के बारे में सटीक फलादेश कर सकता है, जरूरी नहीं कि वो आपके गृ्हस्थ जीवन या आजीविका के विषय में भी उतना सही फलकथन कर सके। किसी को व्यक्तिगत भविष्यकथन में महारत होती है तो कोई सिर्फ राजनीतिक फलकथन में ही सिद्धहस्त होता है। एक ज्योतिषी जिसे कि व्यक्ति के आर्थिक, व्यापारिक पहलू की सटीक भविष्यवाणी करने में विषेज्ञता प्राप्त है तो जरूरी नहीं कि वो प्राकृ्तिक घटनाओं,मौसम इत्यादि के बारे में भी उतनी ही सटीकता से भविष्यवाणी कर सके। इसलिए ये मानना भी गलत है कि प्रत्येक विषय का ज्ञान ओर जीवन की किसी भी समस्या का समाधान प्रत्येक ज्योतिषी के पास अवश्य होगा। इसके लिए जहाँ एक ओर समाज की इस धारणा को बदलना होगा कि ज्योतिषी का अर्थ सर्वज्ञाता होना नहीं हैं वहीं दूसरी ओर एक ज्योतिषी को भी मिथ्या अभिमान का परित्याग कर अपनी कमियों को सहर्ष स्वीकार करना ओर जीवन के किसी एक विशेष पक्ष के बारे में अपने भविष्य ज्ञान को केन्द्रित करना होगा। ताकि वो उसी पक्ष विशेष के सटीक भविष्यकथन में विशेषज्ञता हासिल कर सके।  
प्रत्येक काल में मनुष्य के ज्ञान की एक सीमा रही है। अज्ञात क्षेत्र का ज्ञान प्राप्त करने के प्रयास सदैव जारी रहे हैं। भौतिक विज्ञान के विकास के एक कालखंड में पदार्थ का सबसे छोटा कण "अणु" माना जाता था। बाद की खोजों से पता चला कि उससे भी छोटा तो परमाणु है। कहने का अर्थ ये है कि किसी भी ज्ञान-विज्ञान की जानकारी मनुष्य को एक निश्चित सीमा तक होती है ओर उससे आगे की सीमा की जानकारी के लिए अध्ययन, प्रयोग एवं अन्वेषण की आवश्यकता होती है। अत: ज्योतिष विज्ञान की भी जानकारी आज जिस सीमा तक है, उससे आगे की जानकारी के लिए इस विद्या के भी सतत अध्ययन, प्रयोग एवं अन्वेषण की आवश्यकता है ओर यह तभी सम्भव है जब कि इसका विस्तृ्त अध्ययन एक विषय के रूप में किया जाए। परन्तु जब तक इस विषय के गहन अध्ययन की व्यवस्था नहीं होती तब तक जनसामान्य को इस विषय की इतनी जानकारी प्राप्त कराना तो आवश्यक है कि वह इस विद्या के अर्द्धज्ञानी व्यक्तियों की ठग मानसिकता को भाँप सकें।