परिष्कृ्त हुआ अन्त:करण ही चमत्कारों को जन्म देता है..........

पिछले लेख में मैने आप लोगों के सामने एक ऎसे इन्सान का जिक्र किया था जो कि किसी भी व्यक्ति को देख कर उसके भूतकालिक जीवन में घटित किसी घटना के बारे में बता देता है। अक्सर होता क्या है कि हम लोग ऎसी किसी घटना को देख सुनकर इसे कोई दैवीय चमत्कार या फिर उस व्यक्ति के द्वारा की गई किसी सिद्धि-साधना का प्रतिफल मान लेते हैं। परन्तु वास्तव में ऎसा कुछ भी नहीं है।  यदा कदा प्रकृ्ति की ओर से किसी व्यक्तिविशेष को ऎसी सदप्रेरणाएँ मिल जाती हैं, जिसे कि साधारण शब्दों में पूर्वाभास होना कह सकते हैं। इन सबके पीछे उस व्यक्ति का परिष्कृ्त हुआ अन्त:करण (Conscience) ही वह कारण है, जिसकी उपलब्धि बन पडने पर इस प्रकार की चमत्कार पूर्ण घटनाऎं घटित होने लगती हैं , जो कि सामान्यत: कभी कभार विरले ही देखने को मिलती हैं। किन्तु किसी व्यक्ति विशेष में उच्च भाव भूमी की उपलब्धि हो जाने पर उसका अन्त:करण इतना परिष्कृ्त हो जाता है कि उसमें इस प्रकार की विलक्षणता जन्म ले लेती है।
समय को, कालखंड को बहुआयामीय मानने वाले मनीषीगण कहते रहे हैं कि भविष्य के बीजांकुर वर्तमान में निहित होते हैं एवं इन्हे प्रस्फुटित कर उस भावी परिणति को जानना एवं वांछित परिवर्तन कर पाना मनुष्य के लिए सम्भव है। किन्तु ये कथन भूतकाल पर भी वैसा ही लागू होता है जैसा कि भविष्य पर क्यों कि समय को बहुआयामीय माना गया है।
अब यहाँ एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि उस व्यक्ति में अतिन्द्रिय अनुभव की क्षमता अत्यंत तीव्र है। वह इस अतीन्द्रिय बोध के कारण ही अकसर अनेक भूतकालिक तथा आगामी भविष्य में घटने जा रही घटनाओं को देख पाता हैं। कुछ लोगों में यह अतीन्द्रिय ज्ञान काफी विकसित होता है। सामान्यतः हम पाँच ज्ञानेन्द्रियों के जरिए वस्तु या दृश्यों का विवेचन कर पाते हैं, परंतु कभी-कभी या किसी में बहुधा छठी इन्द्रिय जागृत हो जाती है। विज्ञान इस प्रक्रिया को Extra sensory perception (ई.एस.पी.) अर्थात अतिरिक्त संवेदी बोध का नाम देता है, जिसमें व्यक्ति पांचों इंद्रियों की सहायता के बिना ही, अचेतन के द्वारा सूचना पा लेता है।
 यहाँ मैं विश्वविख्यात भौतिकविद प्रौफैसर एड्रियन जान्स के ही शब्द प्रयोग करना चाहूँगा कि " भूत,भविष्य की घटित एवं घटित होने वाली हलचलों से मानव के वर्तमान में एक विशेष प्रकार की तरंगें उत्पन हो जाती हैं जिन्हे कि "साईट्रोनिकवेवफ्रण्ट" कहा जा सकता है । इन तरंगों को मानवी मस्तिष्क के घटक न्यूरान्स (स्नायु कोष) पकड लेते हैं एवं इस प्रकार कोई व्यक्ति भूत भविष्य का पता लगा पाने की स्थिति में आ जाता है । मस्तिष्क की अल्फा तरंगों तथा साईट्रोनिक वेव्स की आवृ्ति (frequency) एक ही होने से यह बडी सरल सी प्रक्रिया है । किन्तु सिर्फ उन लोगों के लिए जिनका कि मस्तिष्क सचेतन स्तर पर जागृ्त हो चुका हो।
अन्तर सिर्फ इतना ही है कि जहाँ पश्चिमी विज्ञान इसे मानवी मस्तिष्क से जोड कर देखता है, वहीं भारतीय मनोविज्ञान इसे अन्त:करण से। 
आधुनिक वैज्ञानिक अतीन्द्रिय क्षमताओं को चार वर्गों में बाँट कर देखते है :-
परोक्ष दर्शन :- अर्थात वस्तुओं और घटनाओं की वह जानकारी, जो ज्ञान प्राप्ति के बिना ही उपलब्ध हो जाती है।
भविष्य ज्ञान (future intellection)- यानी बिना किसी मान्य आधार के भविष्य के गर्भ में झाँककर घटनाओं को घटित होने से पूर्व जान लेना।
भूतकालिक ज्ञान (past intellection)- बिना किसी साधन के अतीत की घटनाओं की जानकारी।
दूर संवेदी ज्ञान (Telepathy)- अर्थात बिना किसी आधार या यंत्र के अपने विचारों को दूसरे के पास पहुँचाना तथा दूसरों के विचार ग्रहण करना। 
चेतना बोध (sensory perception) के संबंध में जितनी जानकारी विज्ञान अब तक एकत्रित कर चुका है, उससे इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य-मनुष्य के बीच पडी हुई गोपनीयता की दीवार उठ सकती है यानि कि न केवल किसी की अन्त:स्थिति को जाना जा सकता है,बल्कि उसके भूत और भविष्य में भी झाँका जा सकता है। 
हो सकता है कि विज्ञान निकट भविष्य में मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमता के कुछ गहन रहस्यों को उजागर कर पाए तो यह जाना जा सकेगा कि वह सिर्फ उतना ही नहीं है जितना कि शारीरिक और मानसिक क्षमता के आधार पर उसे समझा जाता है। हमारे पूर्वज भी तो शास्त्रों के माध्यम से यही सब कह गए हैं कि प्रत्येक मनुष्य अतीन्द्रिय क्षमता का भंडार है, जिसे कि यदि जागृ्त किया जा सके तो उसे वह संज्ञा प्राप्त हो सकती है जो कि देवताओं को उपलब्ध है।