आप इसे पूर्वाभास मानेंगें या कुछ ओर ?

आज आप लोगों को अपने जीवन की एक ऎसी विचित्र किन्तु सत्य घटना के बारे में बताना चाहता हूँ, जिसे लिखने के बारे में मैने कईं बार मन बनाया लेकिन हर बार ये सोच कर विचार त्याग दिया कि न मालूम पाठक इस पर विश्वास कर पाएंगें या नहीं। खैर बहुत सोच विचार के बाद आज जब फिर से मन बना तो इसे लिखने बैठ गया, क्यों कि मैं जानता हूँ कि ये सत्य है ओर मेरे पास इसकी सत्यता के उचित प्रमाण भी उपलब्ध है।

पिछले कईं वर्षों से हमारा एक नियम है कि हम नित्य प्रात: अपने आराध्यदेव भगवान गणपति को एक मीठे पान का भोग लगाने के पश्चात ही अपनी दिनचर्या आरंभ करते हैं। इसके लिए पानवाला दुकानदार घर पर सुबह ही एक पान पहुँचा देता है, कभी उसे आने में देरी हो जाए तो हम खुद लेने चले जाते हैं । लगभग तीन या चार वर्ष पहले की बात है, जब एक दिन हमारा उसकी दुकान पर जाना हुआ तो बातों ही बातों में उस पनवाडी से हमे एक बहुत अजीब सी बात सुनने को मिली । कहने लगा कि "पंडित जी, कुछ दिनों से रोजाना मेरी दुकान पर एक ऎसा आदमी आ रहा है, जो कि आते ही पहले तो मुझसे बीडी का एक बंडल खरीदता है और कुछ देर यूँ ही खडा रहकर दुकान पर आने वाले ग्राहकों में से किसी ग्राहक को उसका नाम लेकर पुकारता है ओर उसके बीते जीवन की किसी घटना के बारे में बताने लगता है। पंडित जी, मुझे तो वो कोई बहुत पहुँचा हुआ आदमी लगता है"। मैने उसे समझाया कि "भई, ध्यान रखना। वो जरूर कोई ठग होगा, कहीं ऎसा न हो कि किसी दिन वो तुम्हे बातों मे फंसाकर, लूटकर चलता बने । तुम अपनी दुकानदारी की ओर ध्यान दो और ऎसे फालतू लोगों को यहाँ खडा मत होने दिया करो"। खैर उसकी बात को हँसी में उडाकर और आगे से ध्यान रखने की नसीहत देकर हम तो चले आए। कुछ दिनों बाद जब हमारा फिर से उसकी दुकान पर जाना हुआ तो उसने कुछ दूरी पर खडे एक आदमी की ओर इशारा करते हुए बताया कि "पंडित जी, यही वो आदमी है, जिसके बारे में मैने उस दिन आपको बताया था। आप माने या न माने लेकिन मै तो कहता हूँ कि जरूर इस आदमी के पास कोई शक्ति है"।
हमने उस ओर देखा तो सस्ती सी पैन्ट-शर्ट पहने लगभग 45-50 साल के एक ठिगने कद के, मोटे से आदमी को खडा पाया, जो कि उस समय हमारी ओर ही देख रहा था। हमने इशारे से उसे अपने पास बुलाया ओर पूछा कि "कौन हो भई तुम ओर रोज यहाँ किस लिए खडे रहते हो ?
"जी, बस वैसे ही"
हमने जब उससे नाम पूछा तो फिर वैसा ही गोलमोल जवाब मिला " जी, नाम वाम में क्या रखा है। लोग पंडित कह कर बुलाते हैं,आप भी चाहें तो पंडित कह लीजिए"। ये सुनकर मन में क्रोध तो आया कि ऎसे ऎसे ठग लोग पंडितों का नाम बदनाम करने पे तुले हुए हैं लेकिन सुबह सुबह का समय होने के कारण हम उस क्रोध को पी गए ओर उसे आईन्दा से वहाँ खडा न होने को कहकर चले आए। लेकिन वो आदमी नहीं माना क्यों कि उसके बाद हमारा पनवाडी के पास जब भी जाना हुआ तो हमने उसे वहीं पर खडे पाया। लेकिन पनवाडी के ये कहने पर कि ये अगर किसी को कुछ बताता है तो बदले में किसी से रूपये पैसे वगैरह ऎंठने की कौशिश नहीं करता, हमने भी ध्यान देना बन्द कर दिया कि चलो खडा है तो खडा रहे ओर जब खुद दुकानदार को ही ऎतराज नहीं है तो हम भला उसे क्यूं कुछ कहें।
एक दिन की बात है, जब हम दुकान पर पहुँचे तो उसने हमारे पास में ही खडे किसी व्यक्ति को नाम लेकर पुकारा

ओर जैसे ही उस व्यक्ति ने पूछा कि "क्या है?" तो वो पास में आकर उसके बीते जीवन की किसी घटना के बारे में बताने लगा। उस व्यक्ति के साथ ही वहाँ आसपास ही खडे कुछ ओर लोग भी बहुत हैरानी से उसकी बात सुनने लगे। वो व्यक्ति "हाँ जी, हाँ जी" करता जाए ओर सभी लोग हैरान परेशान उन दोनों की ओर देखते रहे। मुझे मन ही मन ये सोचकर हँसी आ रही थी कि कैसे ये दोनों मिलकर बाकी लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं।
ऎसे ही एक दो बार ओर मैने उस व्यक्ति को ऎसा ही करते देखा तो मन में एक मानवसुलभ जिज्ञासा सी उत्पन हुई। मैने उससे ये जानना चाहा कि वो बिना किसी जन्मकुंडली या हस्तरेखा या अन्य किसी विद्या के ऎसे कैसे किसी व्यक्ति की बीती जिन्दगी के बारे में जान लेता है तो उसका यही जवाब होता कि "पंडित जी, ये तो मुझे भी नहीं पता, बस कभी किसी किसी आदमी को देखकर यूँ ही मन में कुछ विचार सा आ जाता है ओर मैं उसे कह देता हूँ। अब ये तो ऊपरवाला जानता है कि ये सब कैसे हो जाता है"।
उस दिन के बाद जब भी उस व्यक्ति से हमारा सामना हुआ तो हमने उसे हमेशा शंका और जिज्ञासा मिश्रित भाव से ही देखा।
पिछले साल की बात है, एक दिन अचानक ही किसी काम से करनाल जाना हुआ तो जैसे ही हम अपनी गाडी लेकर निकले तो घर से कुछ ही दूर उस पनवाडी की दुकान के बाहर वो खडा दिखाई दिया। मुझे देखते ही वो रूकने का इशारा करने लगा। मैने गुस्से में आकर गाडी रोकी ही थी कि झट से बोल पडा" पंडित जी,करनाल जा रहे हैं"। मैं एकदम से हैरान,परेशान कि करनाल जाने के बारे में या तो मैं जानता हूँ या फिर मेरे पारिवारिक सदस्य। किसी ओर को तो इस बारे में लेशमात्र भी जानकारी नहीं है कि आज मैं करनाल जा रहा हूँ, क्यों कि ये कार्यक्रम कोई पूर्वनिश्चित नहीं था। बल्कि एकदम से पिछली रात को ही जाना तय हुआ था। इधर मैं हैरान ओर उधर वो कहने लगा कि "आप अगर कहें तो मैं भी आपके साथ चल पडूं"।
मैं स्वयं नहीं जानता कि मैं उस आदमी को कैसे हाँ कर बैठा। कितनी विचित्र बात है कि एक ऎसा अन्जान शख्स जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता, जिसका कि मुझसे कुछ लेना देना भी नहीं। जिसके बारे में मैं अपने मन में एक ठग होने की धारणा बना चुका था, वो शख्स मुझे अपनी गाडी में बैठने ओर साथ चलने को कह रहा है और मैं उसे मना करने के बजाय पीछे बैठ जाने को कह देता हूँ।
खैर जब हम चल पडे तो रास्ते मैं मैने चाय वगैरह पीने के लिए हरियाणा-पंजाब बार्डर शंभु के पास एक रैस्टौरेन्ट के बाहर गाडी रोक दी। मैं गाडी पार्क कर ही रहा था कि तभी साथ में एक टूरिस्ट बस आकर रूकी। जब बस मे से सवारियाँ उतर रही थी तो इस शख्स नें अपने पास में से गुजरती हुई एक महिला यात्री को उसका नाम लेकर कुछ कहा। किसी अन्जान जगह,अन्जान व्यक्ति के मुहँ से अपना नाम सुनने पर जैसी प्रतिक्रिया होती है,वैसी ही मुख मुद्रा बनाए वो महिला इसकी ओर देखने लगी तो इसने उस महिला को कोई ऎसी बात कही, हालाँकि मुझे ये तो याद नहीं कि इसने क्या कहा था लेकिन इसकी बात सुनकर उस महिला का मुँह खुला का खुला जरूर रह गया। वो हैरान परेशान सी आँखे फाडे इसे  देखती रही।
मै उस से इस विषय में कईं बार पूछ चुका हूँ कि कैसे अचानक से किसी अपरिचित व्यक्ति को देखकर उसके बीते जीवन में घटित धटनाएँ तुम्हारे अपने मन, मस्तिष्क में जन्म लेने लगती हैं, लेकिन हर बार उसका यही जवाब होता कि "पता नहीं, मैं तो खुद हैरान होता हूँ कि कैसे मेरे मुँह से अचानक ये सब निकल जाता है"।
सच मानिये, आज तक मैं स्वयं नहीं जान पाया हूँ कि ऎसा उस व्यक्ति में क्या है, क्या उसे कोई पूर्वाभास होता है या उसके पास कोई अतीन्द्रिय शक्ति है अथवा इसके पीछे कोई अन्य कारण है, जो कि हमारे बुद्धि ज्ञान की सीमा से बाहर है?
मैं ये भी जानता हूँ कि कुछ लोग इसे शायद स्वीकार न कर पाएं, उन्हे ये सब किसी कथा कहानी जैसा लग रहा होगा। लेकिन प्रत्यक्षं किं प्रमाणम अर्थात प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। आप में से कोई भी व्यक्ति अगर इसकी सत्यता की जाँच करना चाहे तो निसंकोच लुधियाना आकर स्वयं अपनी आँखों से देख सकता है, क्यों कि अभी भी वो व्यक्ति मौजूद है ओर आज भी उसकी वैसी ही दिनचर्या है। आज भी हर रोज सुबह वो उसी पनवाडी की दुकान के बाहर खडा मिलता है। कभी उसके मन में आया तो किसी को कुछ कह दिया वर्ना यूँ ही अकेला खडा बीडी पीता रहेगा।
अब आप लोग अपनी राय दे सकते हैं कि आप इसे किस दृ्ष्टि से देखते हैं.........