क्या वैचारिक शुद्धता का हमारी विद्या, आयु,,यश एवं बल वृ्द्धि से कुछ सम्बंध है ?

नीतिशास्त्र कहता है कि "माता-पिता,वृ्द्ध एवं गुरूजनों की सेवा से विद्या,आयु,यश एवं बल की वृ्द्धि होती है"। अपने बालपन की उम्र में हमने जब भी इस वाक्य को कहीं पढा या सुना तो हमेशा ही मन में यह शंका हुई कि भला वृ्द्धजनों की सेवा करने से आयु,बल इत्यादि कैसे बढ सकता है ?। खैर उस समय हमने भी मान लिया था कि यह सब बातें तो यूँ ही मन में सिर्फ श्रद्धा भाव पैदा करने के लिए ही लिखी गईं हैं। परन्तु कुछ समय बाद जब "विचार"(thoughts) की महिमा और प्राणों का जीवन से संबंध समझ में आया तो मस्तक स्वयंमेव अपने पूर्वजों,ऋषि-मुनियों के प्रति महान श्रद्धा से झुक गया। जिनका एक एक शब्द अनुभव और सत्य के आधार पर लिखा गया है। शंका तो हम लोगों को अपनी अज्ञानतावश ही होती है ।
कहीं प्रस्थान करने से पूर्व बडों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना भी आजकल के जमाने में पढे लिखे लोगों की नजर में जरूर अन्धविश्वास हो सकता है। लेकिन यदि उन्हे मनुष्य के इस शरीर यन्त्र की वास्तविकता ओर इसमें भरी आध्यात्मिक सामर्थ्य का कुछ भान होता तो वो लोग मानते कि चरण स्पर्श के बदले में बडे बुजुर्गों के मुख से निकले आशीर्वाद वाची शब्द से लेकर स्वतिवाचन तथा मन्त्र-तन्त्र भी कोई अन्धविश्वास नहीं बल्कि विज्ञानभूत तथ्य है। बस केवल उन्हे आज के युग के संदर्भ में प्रस्तुत करने भर की कमी है।
"विचार" के संबंध में तो गीता में भी कहा गया है कि यदि बुरे विषयों का चिन्तन करें तो वे हमारे साथी बनकर "काम"(carnality) को उत्पन करते हैं, "काम" से क्रोध(indignity), क्रोध से अविवेक(indiscretion), अविवेक से स्मृ्ति(Memory) में गडबडी, स्मृ्ति में गडबड होने से बुद्धि का नाश ( loss of inteligency) होता है । और जहाँ बुद्धि का नाश हुआ तो समझिए एक तरह से मनुष्य का ही नाश हो गया। फिर उसके पास बचा क्या?

कोई ये न समझे कि "सिर्फ सोचने से क्या होता है",चाहे कुछ मर्जी सोचते रहें,होगा तो आखिर करने से ही। यह ठीक है कि बिना कर्म किए केवल भावनामात्र से कार्य नहीं हो जाता लेकिन कर्म बाद में है। पहले मन में भावना ही जन्म लेती है(वैदिक ज्योतिष अनुसार जन्मपत्रिका के चतुर्थ भाव और चतुर्थेश द्वारा किसी इन्सान के विचारों, उसकी भावनाओं के बारे में जानकारी मिलती है। बहुत जल्द "चतुर्थेश की स्थिति और आपका व्यक्तित्व" विषय पर एक लेख श्रंखला प्रस्तुत करने का प्रयास करूँगा), उसके पश्चात इस भावना का ही प्रभाव हमारे कर्म(दशम भाव) पर पडता है। हमारे द्वारा सोचे गये विचारों का प्रभाव हमारे साथ-साथ दूसरों पर भी पडता है। जब बहुत से लोग, जब किसी अच्छे या बुरे भाव रखने वाली एक सी बात सोचते हैं तो उन सम्मिलित विचारों का एक वायुमंडल निर्मित हो जाता है। क्यों कि विचार शब्दमय होते हैं और शब्दों की अनश्वरता को तो विज्ञान भी स्वीकार करता है । क्यों कि अब तो मानव मस्तिष्क के भीतर उत्पन हो रहे विचारों की तस्वीरें तक ली जा सकती हैं ।
जैसा कि पहले बता चुका हूँ कि बार बार एक ही बात पर विचार करने से या बहुत से व्यक्तियों द्वारा एक जैसा ही सोचने से उस स्थान विशेष का वायुमंडल वैसा ही बन जाता है । यही कारण है कि मन्दिर इत्यादि किसी धार्मिक स्थल में जाने पर किसी पापी,दुराचारी मनुष्य के मन में भी चाहे कुछ क्षण के लिए ही सही पवित्रता के भाव ओर वेश्या के कोठे या किसी बियर बार में जाने पर किसी सज्जन,सदाचारी मनुष्य के मन में भी दूषित भाव उत्पन होने लगते हैं । इसलिए शास्त्र कहते हैं क सर्वप्रथम इन्सान को अपनी विचारशुद्धि की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए । विचारों में शुद्धता तभी आ पाएगी, जब कि मन में दया, करूणा जैसे सदगुण तथा माता-पिता, गुरूजनों, वृ्द्धजनों इत्यादि के प्रति सेवा भावना का वास होगा |
आज जो लोग इस विचार पर चल रहे हैं कि हमें पश्चिम से बहुत कुछ सीखना है,उनसे मैं ये एक बात हमेशा से कहता आया हूँ कि--- ये तो नितांत सत्य है कि हमें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है । परन्तु पहले जो हमारे खुद के पास है, उसे तो समझ लें। अपने वेद,शास्त्रों,पुराणों में समाए अनन्त ज्ञान को तो ग्रहण कर लें, अपनी सनातन संस्कृ्ति को समझ लें; फिर विचार करें कि अब हमें पश्चिम से कुछ सीखना है या कि उन्हे सिखाना है । हैरत की बात है कि कल का "जगतगुरू" भारत आज शेष दुनिया का शिष्य बनने की स्थिति में आ चुका है---सिर्फ उन लोगों की बदौलत जो कि जीवन से जुडे हर सवाल के उत्तर की प्रतीक्षा में पश्चिम का मुँह ताकने के आदि हो चुके हैं ।