भाग्य और पुरूषार्थ का महत्व-------(आधुनिक दृ्ष्टिकोण)

पिछले लेख में हम बात कर रहे थे कि जीवन में पुरूषार्थ और भाग्य दोनों का ही अलग अलग महत्व है । ये ठीक है कि पुरूषार्थ की भूमिका भाग्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ इतना कह देने भर से भाग्य का महत्व किसी भी तरह से कम नहीं हो जाता । बहुत से ऎसे भी लोग हैं जो कि भाग्य जैसे किसी शब्द को ही पूरी तरह से नकार देते हैं । उन्होने अपने मन में कुछ ऎसी धारणाऎँ बना रखी हैं कि भाग्य को स्वीकार कर लेने से इन्सान में कर्म करने के प्रति निष्क्रियता आ जाती है । जब कि वास्तव में ऎसा नहीं है।

चलिए विषय को आगे बढाते हुए हम इसी को जानने का प्रयास करते हैं कि भाग्य और पुरूषार्थ वास्तव में क्या हैं ? इसे समझने के लिए हमें कर्मफल की कार्यप्रणाली को जानना होगा क्यों कि भाग्य और पुरूषार्थ का ये सारा रहस्य इन्ही कर्मों में समाहित है। जैसा कि आप सब जानते हैं कर्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है---संचित कर्म, क्रियामाण कर्म और प्रारब्ध(भाग्य)जो कर्म अब हम लोग कर रहे हैं वे वर्तमान में क्रियामाण हैं,जो बिना फलित हुए अर्थात जिनका अभी हमें कोई फल प्राप्त नहीं हुआ है वो हैं हमारे संचित कर्म इन्ही संचित कर्मों में से जो पक कर फल देने लगते हैं उन्हे प्रारब्ध कहा जाता हैं

सबसे पहले हम संचित कर्मों का विचार करते हैं। ये वे कर्म हैं जिनका फल हमें इस जन्म में भोगने को नहीं मिलता बल्कि किसी अन्य जन्म में प्राप्त होता है। इन कर्मों को हम वंशशास्त्र की परिभाषा में रिसेसिव्स करैक्टर्स (recessive characters) की श्रेणी में रख सकते हैं । ये वे करैक्टर्स हैं , जो कि हमारे इस जन्म में सुप्त रहते हैं और अगले या ओर आगे किसी जन्म में "जीन्स'" के योग्य संयोग से दृ्ष्टिगोचर हो सकते हैं । वैदिक ज्योतिष में किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली का पंचम भाव (fifth house) तथा पंचमेश उसके संचित किए गये कर्मों को सूचित करता है ।
कर्म का दूसरा विभाग है "प्रारब्ध" । ये वें कर्म हैं जिनका फल हमें अपने इस जन्म में ही भोगना होता है । शास्त्रों में इन्ही को उत्पति कर्म भी कहा गया है । modern science (बायोलाजी) की विचारसारिणी से इसका मेल मिलाया जा सकता है । "gemetes"(sperm & ovum)  के मिलने पर अर्थात गर्भधारण के समय ही उस जीव के भाग्य का निर्माण हो जाता है ओर उसे बदलने की शक्ति उस जीव के हाथ में नहीं होती ।  (at the time of the union of the gametes is decided the fate of the zygote or the individual as also the gametes it will produce & it is beyond the power of the zygote to alter it )   अर्थात जब गेमिटस (sperm & ovum) या शुक्रशोणित मिलते हैं, तो उनके अन्दर के क्रोमोसोम्स पर "जीन्स" के संयोग पर उस व्यक्ति के भाग्य का निर्णय हो जाता है और चूँकि ये "जीन्स" बाद में किसी भी तरह से बदले नहीं जा सकते, इस कारण उस मनुष्य के भाग्य का निर्णय इसी मिलन में हो जाता है । इन्ही को उपर्युक्त विवेचन में प्रारब्ध या उत्पत्ति कर्म ये संज्ञाएं दी गई हैं । इससे स्पष्ट है कि प्रयत्न के बिना जो सुख-दुख इत्यादि हमें अवश्यमेव भोगने पडते हैं, वे सारे प्रारब्धाधीन ही हैं ।
वास्तव में देखा जाए तो प्रारब्ध कोई स्वतन्त्र शक्ति नहीं है । मनुष्य के कर्म अर्थात गर्भधारणा के समय स्त्री-पुरूष से प्राप्त "जेनीज" का संयोग और उसकी आधिभौतिक तथा अधिदैविक परिस्थिति, इन कारणों से जो भोग हमें भोगने पडते हैं, तथा बिना किसी विशेष प्रयत्न के उनकी अनिवार्यता------सिर्फ इतना ही अर्थ प्रारब्ध (भाग्य) शब्द से अपेक्षित है।  क्यों कि बुद्धि, ज्ञानार्जन, सुख-दुख, गुणावगुणों का उदय, अनुवांशिक कर्म, तथा हमें अपने जीवन में प्राप्त होने वाली समस्त परिस्थितियाँ----इसी एक शब्द "प्रारब्ध"(भाग्य) में ही समाहित हो जाती हैं ।
इस प्रकार प्रारब्ध (भाग्य) में वे सारे कर्मो का समावेश किया जा सकता है जो मनुष्य को उसकी गर्भावस्था में तथा जन्म के बाद प्राप्त होते हैं या करने पडते हैं । क्यों कि अपने जीवन के इस सारे काल में मनुष्य को अपने माता पिता से प्राप्त आनुवांशिक गुणधर्म, विद्यार्जन करने की उसकी पारिवारिक परिस्थिति, तथा जिस समाज का वह अंश होता है, उस समाज का नैतिक स्तर ---ये सब चीजे व्यक्ति के अपने हाथ में नहीं होती या कहें कि इन पर उसका कोई बस नहीं चलता । ये सभी बातें उसे जिस कर्म को करने को उद्युत (विवश) करती हैं, वही उसे अपना कर्म समझकर करनी पडती हैं और वह उन्हे करता है । क्यों कि इस समय उसे व्यक्तिश: स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होती और वही उन कर्मों की अनिवार्यता है । इन्सान का प्रारब्ध (भाग्य) गर्भ में आने से लेकर अन्तिम समय तक घडी की सूँई की भान्ती सदैव उसके साथ चलता है । वैदिक ज्योतिष अनुसार व्यक्ति के प्रारब्ध के बारे में उसकी जन्मकुंडली के नवम भाव (nineth house) तथा नवमेश  की स्थिति से पता चलता है ।    
अब कर्म के तीसरे विभाग "क्रियामाण" के बारे में बात करते हैं ।  
"क्रियामाण" का अर्थ है---जो अभी चल रहा है या कर रहे हैं । वास्तव में इन्ही क्रियामाण कर्मों का ही दूसरा नाम पुरूषार्थ हैं। ये वे कर्म हैं जिन्हे कि इन्सान अपनी 12 वर्ष की आयु के पश्चात से जीवन के अन्त तक करता है । और ये केवल हमारे भाग्य/प्रारब्ध/नियति/किस्मत/मुक्कदर आदि पर अवलम्बित नहीं हैं अपितु इनके माध्यम से व्यक्ति अपने लिए अच्छे-बुरे, उचित अनुचित कैसे भी मार्ग का अवलम्बन करने को पूर्णतय: स्वतन्त्र है । यहाँ से इन्सान की बुद्धि की स्वतन्त्रता आरम्भ होती है, और स्वयं की शिक्षा, संगति, विवाह, आजीविका, परिवारिक जिम्मेवारियाँ इत्यादि निजी तथा सामाजिक उन्नति का दायित्व उस पर आन पडता है। अब चाहे वो अपनी बुद्धि का सदुपयोग करे अथवा दुरूपयोग किन्तु वो अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकता ।
यहाँ मैं इस बात को भी स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि क्रियामाण कर्मों का आरम्भ 12 वर्ष की आयु के पश्चात  इसलिए होता है कि इससे पूर्व की जो अवस्था होती है, उसे बाल्यावस्था कहा जाता है और इस अवस्था में उसका स्वयं का कोई व्यक्तित्व नहीं होता । उसे वही कार्य करने पडते हैं जो कि उसके मातापिता से प्राप्त गुणधर्म तथा उसकी पारिवारिक और सामाजिक स्थिति उससे कराती है । वैदिक ज्योतिष अनुसार इस अवस्था का पूर्णत: संचालन चन्द्र ग्रह के अधीन होता है। इसीलिए 12 वर्ष की आयु तक के बालक के बारे में फलकथन लग्न कुंडली की अपेक्षा चन्द्रकुंडली से किया जाता है।

अब एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है, वो ये कि हमारे संचित कर्मों के पुंज में से कब कौन सा कर्म प्रारब्ध बन जाएगा----------यह ईश्वर की व्यवस्था के अधीन है इस प्रारब्ध को ही भाग्य, तकदीर, luck, मुकद्दर भी कहा जाता है किन्तु अगर कर्मों के इस पूरे चक्र को जरा ध्यान से देखें तो यही दिखाई देगा कि प्रारब्ध (भाग्य) का मूल तो हमारे क्रियामाण कर्म (पुरूषार्थ) ही थे

वस्तुत: क्रियामाण कर्म ही वास्तविक कर्म है क्योंकि कर्ता का स्वातन्त्रय सिर्फ इन्ही तक सीमित है ज्यों ही वह संचित हुआ,कर्म की वास्तविक परिभाषा से बाहर हो जाता है उसे हम कर्मों का लेखा कह सकते हैं, कर्म नहीं और प्रारब्ध (भाग्य) कर्म नहीं अपितु फल है अर्थात वह पक कर फल रूप में परिवर्तित हो चुका है
उसको कर्म सिर्फ इसीलिए कहा जाता है कि फलों का मूल कारण हमारी दृ्ष्टि से ओझल न हो जाए और हम यह न समझ बैठें कि हमारे सुख-दुख, उन्नति-अवनति, हानि-लाभ इत्यादि का हमारे कर्मों से कोई सम्बन्ध नहीं है

आशा करता हूँ कि इस लेख को पढकर उन लोगों की सोच में कुछ परिवर्तन हो सके........ जो कि किसी के मुख से भाग्य शब्द सुनने पर ही उसे कुछ इस प्रकार से देखते हैं मानो कि उनके सामने कोई 18 वीं सदी का कोई प्राणी खडा हो ।