विज्ञान किन चीजों का निषेध करता है ?

देखा जाए तो इस सृ्ष्टि के बारे में हम अभी तक इतना भी नहीं जान पाए,जितना कि हमारे शरीर की तुलना में एक बाल । हमने जो जानकारियाँ प्राप्त की हैं, वह एक स्कूली छात्र से अधिक नहीं हैं । उस ज्ञान के सहारे न तो वस्तुओं का सही स्वरूप जाना जा सकता है और न जीवन उदेश्य की पूर्ती ही संभव है । विज्ञान अभी तक केवल पंचभूतों से बने हुए स्थूल पदार्थों के बारे में ही थोडी बहुत जानकारी प्रयोगशालाओं के माध्यम से प्राप्त कर सका है । जीव सत्ता-----मस्तिष्कीय संभावना,चेतन-अचेतन मन--उसकी शक्ति के अगणित प्रमाण होते हुए भी अभी वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सकी है । असंख्य क्षेत्रों की जानकारियाँ अभी प्रारंभिक अवस्था को भी पार नहीं कर सकी हैं । ऎसी दशा में यदि आत्मा जैसा अति सूक्ष्म तत्व  प्रयोगशालाओं की पकड में नहीं आया तो यह नहीं कहा जाना चाहिए कि "वह नहीं है" । तत्वदर्शी दृ्ष्टि से हम उसकी एवं महता सहज ही सर्वत्र बिखरी देख सकते हैं ।       
पिछली पोस्ट,जो कि ज्योतिषीय या आध्यात्मिक नहीं अपितु वैज्ञानिक दृ्ष्टिकोण पर आधारित है, जिसके जरिए मैने एक संभावना व्यक्त की थी कि हो सकता है निकट भविष्य में विज्ञान उस स्तर तक पहुँचनें में सफल हो जाए----जिसके आगे स्थूल से इतर सूक्ष्म जगत की यात्रा आरंभ होती है । आप लोगों नें उस आलेख को पढा और बहुत से व्यक्तियों नें टिप्पणी के माध्यम से अपने विचार भी रखे । उनमें से जहाँ कईं लोग इस विषय पर अपनी सहमति व्यक्त करते दिखाई गए तो वहीं कुछ लोग ऎसे भी है,जो कि ऎसी किसी भी संभावना को सिरे से ही नकार रहे है । इनसे इतर कुछ ऎसे बन्धु भी हैं,जो कि अपने स्पष्ट विचार रखने से बचते रहे ओर उन्होने सिर्फ सुन्दर विश्लेषण जैसे चन्द शब्दों का आश्रय लेना ही उचित समझा । एक पाठक विक्षुब्ध सागर जी का कहना सही है कि यहाँ इस छोटे से मंच के माध्यम से किसी सत्य तक पहुँच पाएंगें,ऎसा सोचना भी उचित नहीं हैं । किन्तु मेरा मानना ये है कि इस मंच की साथर्कता इसी में है कि हम सब अपने अपने हिस्से के ज्ञान को एक जगह एकत्रित करके उसमें से सत्य ढूंढने का प्रयास करें ।
प्राप्त टिप्पणियों में एक टिप्पणी तो ऎसी थी,जिसने कि मुझे कुछ सोचने पर विवश कर दिया । वो टिप्पणी थी अर्शिया अली जी की, उनका कहना है कि आप उन अतार्किक चीजों को सिद्ध करना चाह रहे हैं, जिनका विज्ञान निषेध करता है। 
यहाँ मैं अर्शिया जी से एक निवेदन करना चाहूँगा कि मुझे विज्ञान की उस पुस्तक का नाम बता दीजिए जिसमे कहीं ये लिखा हो कि इस संसार की अमुक वस्तु, अमुक पदार्थ या अमुक विषय ऎसा है,जिसका कि विज्ञान निषेध करता है । स्वयं आईन्स्टीन बाबा जी भी अपने जीवन के अन्तिम काल में कह गए हैं कि "वैज्ञानिक खोजों की लम्बी अवधि में मुझे जो सबसे सुन्दर और सुखद अनुभव हुआ है वह यह कि कोई अदृ्श्य चेतना हमारे शरीर सहित इस सम्पूर्ण ब्राहमंड की नियामक है । वही सम्पूर्ण सत्य, कला और विज्ञान का स्त्रोत है । अन्तराल की गहराई में प्रवेश कर कोई भी उसकी अनुभूति कर सकता है" । उनके अनुसार "विज्ञान का भी उदेश्य ऎसे सत्य की खोज करना है,परन्तु मस्तिष्कीय चेतना के उथली परत से संचालित होने के कारण वह उस गहराई में प्रविष्ट नहीं हो पाता"। लेकिन आज तर्कवादियों से प्राप्त हुए ज्ञान के आधार पर मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ कि हो न हो जरूर जीवन के अन्तिम दिनों में आईन्स्टीन बाबा जी को मतिभ्रम हुआ होगा---तभी तो वो इतने महान आविष्कार होने पर भी ऎसी ऊलजलूल बातें करने लगे । यही नहीं प्लांक, ब्रोगली, जेम्सजीन, ई. रेगर, जे.जी.टेलर,प्रो. विक्टर इन्यूशिन, डा. डेविड शीन्किन जैसे वैज्ञानिक भी जरूर मूर्ख रहे होंगें जिन्होने अपना समस्त जीवन विज्ञान की खोजों में बिता दिया, लेकिन अपने जीवन के उतरार्द्ध में आकर ये सभी लोग वैज्ञानिक से "विज्ञान दार्शनिक" हो कर आत्मिक संलेषण में निरत हो गए ।
काश्! उस समय आप जैसे साईंस(not vigyan) भक्त होते तो संभवतय: ऎसे महान आविष्कारकों को इस प्रकार बुद्धि भ्रम की स्थिति से न गुजरना पडता ।

हम तो आज तक यही समझते आए थे कि वह ज्ञान जिससे अन्तर की बेचैनी, उद्विग्नता, जिज्ञासा एवं तृ्ष्णा का समाधान होकर स्वच्छ मनोभूमी की प्राप्ति हो सके, वही विज्ञान है । अब इससे इतर विज्ञान की कोई नवीन परिभाषा आप लोगों में से कोई जानता हों तो कृ्प्या मार्गदर्शन करें, ताकि हम भी अपने कूप से निकलकर बाहर की दुनिया देख सकें  :)