चन्द्रमा के अधीन हैं हमारे स्वपनों का संसार..............

सपनों की दुनिया भी बडी विचित्र होती है । हर इन्सान अपनी जिन्दगी में अच्छे बुरे सपनों के अनुभव से गुजरता है । ये जरूरी नहीं कि सपने हमेशा सुन्दर ही हों, वे अच्छे-बुरे, सुहावने या डरावने कैसे भी हो सकते हैं । इनका संसार अत्यंत असीमित है ओर का इतिहास भी शायद उतना ही पुराना है; जितना कि मानव जाति का इतिहास । सपनों का संबंध हमारे मन से है और यही मन बाह्य एवं आन्तरिक रूप से हमारे समस्त जीवन को क्रियान्वित करता है ।

स्वपन की विभिन्न परिभाषाएँ :-
शरीर शास्त्र(medical science) अनुसार :- नींद आने के बाद यदि मस्तिष्क में रक्त की कमी अनुभव होने लगे अथवा रक्त संचार सुचारू रूप से न हो पाए तो स्वपन दिखाई देने लगते हैं ।
इन्द्रिय विज्ञानानुसार :- हमारी पाचन शक्ति के कमजोर होने पर निन्द्रावस्था में स्वपन आने लगते हैं ।
मानस शास्त्रानुसार:- स्वपन इन्सान की पहुँच से बाहर की स्मृ्तियों का आभास है ।
आध्यात्म शास्त्रानुसार:- हमारा सूक्ष्म शरीर नींद की अवस्था में हमारे दिन भर के क्रियाकलापों को चित्रित कर प्रस्तुत करता है,उसे ही स्वपन कहते हैं ।
जीवन विज्ञान(life science) अनुसार:- स्वपन इन्सान की एक चमत्कारिक समझ है ।
तात्पर्य है कि निद्रावस्था में मन द्वारा होने वाली क्रियाशीलता के निर्माण को ही स्वपन कहा जाता है ।

मनोवैज्ञानिक मानते है कि स्वपनावस्था मनुष्य के अवचेतन मस्तिष्क की उपज है, भारतीय ज्योतिष भी स्वपन को अवचेतनावस्था का ही परिणाम मानता है किन्तु मस्तिष्क नहीं अपितु मन की अवेचन अवस्था । विज्ञान जहाँ मन ओर मस्तिष्क को एक ही मानता है, वहीं हमारे यहाँ मन और मस्तिष्क दोनों की भिन्नता स्वीकार की गई है । मन एक अलग तत्व है और मस्तिष्क अलग। मन के 2 भाग हैं---चेतन मन और अवचेतन मन । भौतिक जगत के समस्त क्रियाकलाप चेतन मन की क्रियाओं द्वारा ही संपादित होते हैं जब कि अवचेतन मन का 95% भाग सदैव सुप्तावस्था में ही रहता है । स्वपन दिखाई देने का सीधा संबंध हमारे इसी अवचेतन मन से ही है । हमारे शरीर में विद्यमान सभी इन्द्रियाँ स्वतंत्र हैं,सबका अपना अपना दायित्व है किन्तु सोते समय  समस्त इन्द्रियाँ मन में ही एकत्र होकर सिमट जाती हैं। उस स्थिति में देखना,खाना,सुनना,सूँघना,स्पर्श करना आदि क्रियाएं विलीन हो जाती हैं ओर तब कर्मेन्द्रियाँ कोई कर्म नहीं कर पाती तथा न ही वे कर्म करने के योग्य रहती हैं । यानि की सोते हुए हमारे शरीर का एकछत्र राजा होता है---मन। सोते हुए हमारे शरीर का समस्त कार्यभार इसी अवचेतन मन के अधीन होता है जब कि जागृ्त अवस्था में चेतन मन के अधीन ।

स्वपन में कईं बार भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं को हम साफ साफ या फिर सांकेतिक रूप में देखते हैं । ऎसा क्यों और कैसे ? विज्ञान अभी इसकी खोज में है । लेकिन वैज्ञानिकों के अलावा इस तथ्य को कोई भी साधारण व्यक्ति नहीं नकारेगा कि उसकी जिन्दगी का कोई न कोई स्वपन अवश्य ही भविष्य में सच हुआ ।

वैदिक ज्योतिष की बात की जाए, तो,चन्द्रमा को मन का कारक तत्व माना जाता है,जो कि हमारे मन की समस्त क्रियायों का संचालन करता है। अब जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में चन्द्रमा जिस भाव(house)में स्थित होता है,उस व्यक्ति को अधिकाँशत: उसी भाव से संबंधित पारिवारिक सदस्यों, सगे संबंधियों,वस्तुओं या पदार्थों के ही स्वपन दिखलाई पडते हैं । मान लीजिए किसी की जन्मकुंडली में चन्द्रमा चतुर्थ भाव में स्थित है तो उस व्यक्ति को अधिकांशत:चतुर्थ भाव से related माता,भूमी,मकान,सुख के साधन,वाहन,जल,नदी,तालाब,कुँआ,समुद्र,जनसमूह,प्रेमी/प्रेमिका,मित्र इत्यादि से संबंधित स्वपन ही दिखलाई देंगें। क्यों कि उस व्यक्ति का मन(चन्द्रमा) उन सब चीजों में स्थित है,इनमें रमा हुआ है । अगर उस व्यक्ति का चेतन मन उन सब वस्तुओं,पदार्थों की प्राप्ति में सहायक नहीं हो पा रहा है या कहें कि उस व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियाँ उन पदार्थों की प्राप्ति के अनुकूल नहीं हैं तो फिर मन अपनी अवचेतनावस्था में उसके लिए स्वपन के माध्यम से मार्गदर्शक का कार्य करता है।

ऎसा भी नहीं है कि हमें दिखलाई देने वाले सभी स्वपन सिर्फ उन्ही वस्तुओं/पदार्थों से संबंधित ही हों, जहाँ कि जन्मकुंडली में चन्द्रमा स्थित है। इसके अतिरिक्त गोचर में चन्द्रमा जन्मकुंडली के जिस जिस भाव में संचरण करता है,उस उस भाव से संबंधित  कारक तत्वों के बारे में हमें नित्यप्रति स्वपन देखने को मिलते हैं । लेकिन ये कोई जरूरी नहीं कि वो स्वपन हमें सुबह जागने पर याद रह ही जाएँ । इनमे से कभी कभार कोई स्वपन हमें याद रह जाता है अन्यथा शेष स्मृ्ति पटल से विलुप्त हो जाते हैं ।