राहूकाल का हौव्वा..................

एक कहावत है कि संसार में उसी वस्तु की नकल होती है जिसकी माँग अधिक होती है । प्राचीन समय में ज्योतिष केवल आवश्यकता थी परन्तु आज के दौर में आवश्यकता के साथ-साथ ज्योतिष एक फैशन भी बन गया है । ज्योतिष का अर्थ है 'ईश्वर प्रदत ज्ञान रुपि ज्योति' । मनुष्य के जीवन में लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता, शुभता-अशुभता या अच्छा-बुरा कब-कब होगा ?-----ये सब जानने का एकमात्र सटीक साधन है ज्योतिष विधा । 
वास्तव में ज्योतिष का अर्थ होता है व्यक्ति को जागरुक/ सचेत करना, परन्तु समाज में कुछ अल्पज्ञानियों द्वारा इसका दुरूपयोग करने एवं लोगो को सही जानकारी देने की बजाए उनको भयभीत करने के कारण कई बार इस बिद्या की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है ।
कुछ समय पूर्व मैने एक लेख के माध्यम से "माँगलिक दोष" और "कालसर्प योग" नामक दो ऎसे कपोलकल्पित योगों के बारे में जानकारी देने का प्रयास किया था, जिनके कारण आमजन अक्सर भयभीत रहते है । आज बात करते है राहूकाल की,जिसके नाम पर अकारण ही लोगों को भयभीत किया जा रहा है ।

राहूकाल ज्योतिष विद्या के किसी भी मूलग्रन्थ में चर्चित नहीं है । यह भी कालसर्प योग की भान्ती दक्षिण भारत से उत्तर भारत में अभी लगभग 40-50 वर्ष पहले से ही सरक आया है । दक्षिण भारत के किस प्रामाणिक ज्योतिषग्रन्थ में यह निर्दिष्ट है---यह स्पष्ट बताने का अनुग्रह वहाँ का कोई भी ज्योतिषी नहीं करता । लेकिन बिना किसी प्रमाण या आधार के यह प्राचीनकाल से दक्षिणभारत की जनता और ज्योतिषियों द्वारा अशुभकाल के रूप में दैनिक व्यवहार में प्रयुक्त होता चला आ रहा है । उन लोगों की देखा देखी अब उत्तरभारत के ज्योतिषी भी "बाबावाक्यं प्रमाणम" मानकर इसे अशुभकाल के रूप में प्रचारित करने में लगे हुए हैं । इस विषय में मै लगभग बीसियों ज्योतिषियों से पूछ चुका हूँ कि भई कौन से ऋषि,मुनि या आचार्य द्वारा लिखे गए ग्रन्थ में इसका लक्षण या फल इत्यादि दिया गया है---------लेकिन किसी के पास भी कोई जानकारी नहीं । ले देकर कुछ लोगों से ये जरूर सुनने को मिला कि हमें तो हमारे गुरू जी से यही सीखने को मिला है कि राहूकाल के समय किसी भी प्रकार का कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए । धन्य हो !!
आज अधिकतर पंचांग,समाचारपात्र, टैलीवीजन पर आने वाले भविष्यवाणी बाबाओं नें भी बस बिना किसी जानकारी के राहूकाल का हौव्वा बनाकर लोगों को भ्रमित करना ही अपना कर्तव्य समझ लिया है ।
वास्तव में इस राहूकाल का किसी भी प्रामाणिक ज्योतिष ग्रन्थ में कहीं नाममात्र भी उल्लेख नहीं है,लेकिन फिर भी यह अन्य बहुत से मनगढंत योगों जैसे कि माँगलिक और कालसर्प दोष इत्यादि के तरह से ही असंगतरूप में प्रयुक्त हो रहा है ।  चलिए इस योग की जरा थोडी समीक्षा कर ली जाए---------
सभी जानते हैं कि प्रचलित राहूकाल सप्ताह के सात वारों में प्रतिदिन भिन्न भिन्न समय पर केवल एकबार डेढ घंटे के लिए ही घटित होता है । जैसा कि  नीचे दिया गया है---



  • वार                      प्रारम्भ                       समाप्त
    रविवार                4:30PM                      6:00PM
    सोमवार              7:30                             9:00
    मंगलवार             3:00PM                      4:30PM
    बुधवार                12:00                           1:30PM
    बृ्हस्पतिवार       1:30PM                       3:00PM
    शुक्रवार               10:30                           12:00PM
    शनिवार              9:00                             10:30



  • ये बात ध्यान देने योग्य है कि इस प्रचलित राहूकाल में दिनमान को स्थिर रूप से 12 घण्टे माना गया है जब कि भारतीय समय पद्धति अनुसार दिन और रात्री का मान स्थिर हो ही नहीं सकता । राहूकाल के जन्मदाता नें तो इतना विचार करना भी उचित नहीं समझा कि दिन और रात्रि की अवधि तो प्रतिदिन स्थानभेद के कारण घटती-बढती रहती है । फिर किसी भी निश्चित वार का एक निश्चित समय(डेढ घँटा) अशुभफलदायी किस प्रकार से हो सकता है ।  लेकिन नहीं इन लोगों को तो बस आम लोगों को भयभीत करके अपना उल्लू सीधा करने से मतलब है---------चाहे उनके ऎसे कृ्त्यों से इस दैवीय विद्या की विश्वसनीयता पर आँच आती है तो भले आती रहे ।