प्रदोषकाल अथवा स्थिर लग्न में ही करें दीपावली पूजन

हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति में पर्व,त्यौहार इत्यादि अपना एक अलग ही महत्व रखते हैं। इन पर्व,त्यौहारों की इतनी बाहूल्यता के कारण ही समाज में "सात वार,नौ त्यौहार"जैसी कहावतें तक प्रचलित हो गयी। किन्तु देखा जाए तो इन पर्व,त्यौहारों के रूप में हमारे पूर्वजों ने जीवन को सरस और उल्लासपूर्ण बनाने की कितनी सुन्दर व्यवस्था हमें प्रदान की है। हमारे प्रत्येक पर्व की अपनी ही एक विशेष महता है, जो किन्ही विशेष उद्देश्यों को सामने रखकर ही निश्चित किया गया है । इसका एक सबसे बडा कारण तो ये है कि मनुष्य अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुसार सदैव एक रस में ही जीवन व्यतीत नहीं कर सकता । यदि वर्ष भर वह अपनी नियमित दिनचर्या में ही लगा रहे तो उसके चित्त में उद्विग्नता एवं नीरसता का भाव उत्पन्न होना निश्चित है। इसलिए यह आवश्यक था कि पर्व,त्योहारों के रूप में उसे यदा कदा ऐसे अवसर भी मिलते रहें, जिनसे कि वह अपने जीवन में कुछ नवीनता तथा हर्षोल्लास का अनुभव कर सके। ऎसा ही एक पर्व जिसे कि हम युगों से दीपावली के रूप में मनाते आ रहे हैं, का शुभागमन हो रहा है । यूँ तो दीपावली प्रकाश का पर्व है,किंतु इसका वास्तविक अर्थ तो ये है कि हम अपने जीवन में छाये हुए अज्ञानरूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञानरूपी प्रकाश की ज्योति को प्रज्वलित कर सकें । 

लक्ष्मीश्च त्वं वरदा भवेत परिशं ज्ञानो वता वर्षिणी ।
पूर्व पुण्यद नाद्य पूर्व सहितं आनंद देवों विति ।।

दीर्घो यस्य गृ्हस्थ पूर्ण महितं सन्मार्ग श्रेयव्या सदै ।
पूर्वा वे मय मुक्त रहित गतं पूर्वो च लक्ष्मी वदै ।।

इस बार 17 अक्तूबर को संयुक्त तिथि होने के कारण नरक चतुर्दशी और दीपावली (अमावस्या) दोनों का एक ही दिन संयोग बन रहा है । भारतीय समयानुसार दोपहर काल 12 बजकर 27 मिनट तक नरक चतुर्दशी(रूप चतुर्दशी) रहेगी,तत्पश्चात अमावस्या तिथि आरंभ होगी जो कि अगले दिन 18 अक्तूबर दोपहर 11 बजकर 07 मिनट तक रहेगी ।
शास्त्रानुसार दीपावली पूजन के लिए प्रदोष काल और स्थिर लग्न ही प्रशस्त माने गए हैं । किन्तु मेरे विचार से यहाँ अधिकाँश लोगों को ये पता ही नहीं पता होगा कि प्रदोषकाल या स्थिर लग्न क्या होता है ।
आप जिस भी स्थान पर रहते हैं,उस स्थान पर सूर्यास्त समय के पश्चात की जो 2 घंटा  24 मिनट की अवधि है,वही प्रदोष काल है । मान लीजिए आपके नगर में सूर्यास्त 6 बजकर 25 मिनट पर होता है तो प्रदोष काल 8 बजकर 49 मिनट तक होगा । यदि आप विश्व के किसी भी स्थान का स्थानीय सूर्योदय/सूर्यास्त समय जानना चाहते हैं तो इस लिंक पर जाकर पता कर सकते हैं ।
प्रदोष काल के अतिरिक्त स्थिर लग्न का भी दीपावली पूजन में विशेष महत्व है ।  ऎसा इसलिए कि घर-परिवार में लक्ष्मी की स्थिरता बनी रहे । ज्योतिष शास्त्रानुसार सम्पूर्ण दिन-रात की अवधि को 12 विभिन्न लग्नों में बाँटां गया है । जिनमें मेष, कर्क, तुला तथा मकर चर लग्न (विचलित करने वाले/चलायमान), मिथुन, कन्या, धनु तथा मीन द्विस्वभाव लग्न तथा वृषभ, सिंह, वृश्चिक एवं कुंभ स्थिर लग्न(जो कि किसी भी कार्य को स्थायित्व प्रदान करते हैं) आते हैं । इन स्थिर लग्नों में जो भी कार्य सम्पन्न किया जाता है वह अत्यंत उज्जवल,श्रेष्ठ और सुफलदायी सिद्ध होता है ।
दीपावली पूजन हेतु स्थिर लग्न काल:-
वृषलग्न--रात्रि 07 : 21 से 09 : 15 तक
सिंह लग्न---मध्यरात्रि  1 : 59 से प्रात: 04 : 16 मिनट तक  

अन्त में एक बात जो कि विशेष रूप से आपसे कहना चाहूँगा कि---- दीपावली आपस में खुशियों बाँटने का पर्व है, लेकिन हम लोग ने इसे अपने वैभव प्रदर्शन का एक साधन बना डाला है । एक दूसरे की होड में बढ चढकर पटाखों इत्यादि पर सिर्फ एक दिन में जितने धन का अपव्यय हम लोग कर देते हैं,उसका सदुपयोग यदि देश के विकास में अथवा अन्य किन्ही लोकहितार्थ कार्यों में किया जाए तो न जाने कितने ही गरीब,लाचार मनुष्यों का जीवन सँवर जाए ।  धन के अपव्यय के साथ ही हम लोग अपने वायुमंडल को भी दूषित करने में लगे हुए हैं । इनसे उत्पन विषाक्त गैसें जहाँ एक ओर तो हम सबके स्वास्थय के लिए ही विषतुल्य हैं,वहीं इनकी भयंकर ध्वनि से अनेकों निरीह पशु-पक्षी भी मरणासन्न स्थिति में पहुँच जाते हैं । इसलिए हमारा ये कर्तव्य बनता है कि अपने पर्यावरण और अन्य जीवों के प्रति विचार करते हुए ही दीपोत्सव का सही तरीके से आनन्द उठाया जाए ।
सबके जीवन में प्रकाश हो, व्यवहार एवं कर्म की पवित्रता हो, ह्रदय में मधुरता का वास हो-------इस मंगलकामना के साथ आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाऎँ!!!!!!!