आपके सवाल------ हर साल ये देवता सोने क्यूँ चले जाते हैं? (देवशयन)

अक्सर जब भी कोई पाठक मुझसे ज्योतिष अथवा सनातन धर्म के विषय में कोई प्रश्न करता है तो मेरा ये भरकस प्रयास रहता है कि तुरन्त ही उसके सवाल का उत्तर उसे मिल सके। प्रश्न यदि व्यक्तिगत हो तो प्राथमिकता के आधार पर उनका जवाब पहले देने का प्रयास करता हूँ। किन्तु यदि प्रश्न निजि न होकर सामाजिक हो तो यदा कदा समयाभाव के कारण उनके उत्तर देने में देरी हो ही जाती है। आज कुछ ऎसे ही प्रश्नों को लेकर ये पोस्ट लिख रहा हूँ,जो कि ईमेल अथवा टिप्पणी के माध्यम से विभिन्न पाठकों के द्वारा पूछे गये थे किन्तु अभी तक उन्हे व्यक्तिगत रूप से जवाब प्रेषित नहीं कर पाया हूँ। यहाँ इस पोस्ट के जरिये सिर्फ ये सोचकर उन सवालों के जवाब देने का प्रयास कर रहा हूँ कि हो सकता है कि कुछ लोग ऎसे भी हों,जिनके मन में भी ऎसा ही कोई प्रश्न कौंध रहा हो और मेरा जवाब उनके जिज्ञासा भाव का शमन करने और साथ ही कुछ नया जानने,समझने में सहायक हो सकें। किन्तु गोपनीयता बनाए रखने हेतु यहाँ प्रश्नकर्ता के नाम का उल्लेख नहीं किया जा रहा। (वास्तव में प्रश्नकर्ता ने अपना सवाल पोस्ट के शीर्षक तुल्य भाषा में ही रखा था,किन्तु यहाँ मैं उसी प्रश्न को थोडा मर्यादित भाषा में ही रखना चाहूँगा)
किसी पाठक ने एक बहुत ही अच्छा प्रश्न उठाया है कि हिन्दु धर्म में प्रत्येक वर्ष देवशयन तथा देवप्रबोध(देवोत्थान) के बीच जो चार मास का एक समयकाल आता है, उसका क्या अर्थ है ? साथ ही उन्होने ये भी जानना चाहा है कि वर्षाकाल में देवता अधोलोक में,शीतकाल में मध्यलोक में तथा ग्रीष्म ऋतु में उर्ध्वलोक में चले जाते हैं----इसका क्या तात्पर्य है? 
उत्तर:- जैसा कि मैं समझता हूँ कि हिन्दू धर्म में अधिकतर लोगों को इस विषय में तनिक भी जानकारी नहीं हैं कि हमारे जो पर्व,त्योहार,व्रत-उपवास इत्यादि हैं,उनका वास्तविक प्रयोजन क्या है? एक साधारण मनुष्य की तो बात ही छोड दीजिए,जो लोग धर्म के नाम पर कमा खा रहे हैं,वो भी इसके बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं। अब यदि कोई इन सब का गहन विश्लेषण करे तो पता चलेगा कि इस धर्म(सनातन धर्म) के प्रत्येक नियम,परम्परा में कितनी वैज्ञानिकता छिपी हुई है। लेकिन आज की पाश्चात्य रंग में रंगी युवा पीढी इन सब को रूढिवादिता,आडम्बर,पुरातनपंथिता जैसे नामों से संबोधित करने लगी है। खैर जैसी ईश्वर की इच्छा....और इन लोगों की समझ। चलिए हम मूल विषय पर बात करते हैं.....देवशयन(देवताओं की निन्द्रा) और देवोत्थान(देवताओं का जागना) के बीच का जो अन्तराल होता है,वो वर्षाकाल और शीतऋतु(सर्दियों) के प्रारंभ(आषाढ़ शुक्ल से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) होने तक का समय होता है। शरीर शास्त्र के अनुसार किसी मनुष्य के शरीर में रोग उत्पन होने का एकमात्र कारण है---वात,पित्त अथवा कफ नामक इन तीनों तत्वों मे से किसी की न्यूनाधिक्ता। अब यदि शरीर में इनमे से कोई भी तत्व कम या अधिक हुआ तो ही शरीरग्रस्त होगा अन्यथा नहीं। निरोगी काया के लिए शरीर में इन तत्वों का संतुलन आवश्यक है। अब जो ये चार मास की समयावधि है,इसमें एक तो दिनमान घटने लगता है और शरीर में वात की मात्रा बढने लगती है---- फलस्वरूप शरीर में विधमान तेज(उर्जा) क्षीण होने लगता है,जठराग्नि मंद पडने लगती है,पाचनतंत्र से संबंधित विकार उत्पन होने लगते हैं। इसलिए जठराग्नि के रक्षण और दीपन के लिए देवशयन के बहाने से हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा विभिन्न पर्व-त्योहारों के माध्यम से व्रत-उपवास इत्यादि रखने की एक परम्परा निर्धारित की गई है। वर्ष के अधिकतर त्योहार इन्ही चार महीनों के दौरान आने का यही एक कारण है,ताकि मनुष्य श्रद्धावश ही सही व्रत-उपवास इत्यादि का आश्रय ले और कुछ समय भूखा रहकर अपनी जठराग्नि को प्रदीप्त रख सके।
देवता वर्षाकाल में अधोलोक,शीतकाल में मध्यलोक तथा ग्रीष्मकाल में उधर्वलोक को चले जाते हैं---इसका तात्पर्य ये है कि वर्षा ऋतु में शरीर का समस्त तेज पैरों में, शीत ऋतु में पेट में और ग्रीष्म ऋतु में सिर पर होता है। प्रमाणस्वरूप वर्षाकाल में पैरों में सर्दी का अनुभव नहीं होता, शीतकाल में भूख अधिक लगती है और ग्रीष्मकाल में सिर पर शीघ्र गर्मी चढ जाती है। जैसे कि आपने देखा ही होगा कि तेज धूप में घर के बडे बुजुर्ग बच्चों को घर के बाहर निकलने से मना करते हैं;उसका कारण यही है कि एक तो उष्मा/गर्मी(तेज) पहले ही सिर पर विराजमान है,ऊपर से सूर्य की तेज गर्मी से कहीं मूर्च्छा,चक्कर इत्यादि न आ जाएं।
देवोत्थान(देवताओं के जाग उठने) का अर्थ ये है कि जब जठराग्नि जाग उठी तो उसका तेज(उष्मा) पैरों से चलकर पेट में आ गया।
हमारे ऋषि मुनि ये भलीभांती जानते थे कि इन्सान एक ऎसा प्राणी है जिसे कि यदि कोई सीधा स्पष्ट मार्ग भी दिखाया जाए तो भी वो उसका अनुसरण करने की बजाय अपने मन का अनुसरण करना ज्यादा पसंद करता है---इसीलिए उन्होने उसके हित को ध्यान में रखते हुए कहीं तो उसके भय को माध्यम बनाया तो कहीं श्रद्धा को। यूँ तो चाहे विश्व का कोई भी धर्म हो उसके मूल में सिर्फ इन्सान का भय और श्रद्धा ही काम करती है लेकिन यदि आप गहराई से सनातन धर्म का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हिन्दू धर्म विश्व का एकमात्र वैज्ञानिक धर्म है,जिसका प्रत्येक नियम,परम्परा अपने भीतर विज्ञान समेटे हुए है।

(पोस्ट की लम्बाई को ध्यान में रखते हुए आज सिर्फ एक ही प्रश्न को उठा पाया हूँ। बहुत से पाठकों के अभी सवाल शेष रह गये हैं,उनमें से कुछेक प्रश्नों को आगामी पोस्ट में सम्मिलित करने का प्रयास रहेगा। )