पुनर्जन्म रहस्य---- वेदांत एवं विज्ञान की दृ्ष्टि से

किसी भी प्राणी की मृ्त्यु के पश्चात भी क्या कुछ ऎसा है,जो कि शेष रह जाता है? इसी सहज जिज्ञासा से जुडा हुआ है--पुनर्जन्म का रहस्य।  भारत सहित विश्व के कईं देशों में बहुत बार ऎसा हुआ है कि जब किसी व्यक्ति ने अपने पूर्वजन्म के बारे में सब कुछ ठीक ठीक बतलाया है। जिसमें उसने अपने माता-पिता,सगे संबंधियों के नाम तक बता दिये हैं,जिनसे कि वह अपने इस जन्म में कभी भी नहीं मिला। अपने रहन सहन व दिनचर्या के बारे में उसने जो भी बताया,उसे उसके पूर्वजन्म के पारिवारिक सदस्यों नें स्वीकार किया है।मेरे अपने परिवार में घटित हुई ऎसी ही एक घटना के बारे में कुछ समय पहले मैं ताऊ द्वारा लिए गये एक साक्षात्कार में बता चुका हूँ। वैज्ञानिक और विशेष तौर से परावैज्ञानिक इस विषय में लगभग एकमत हैं कि पूर्वजन्म की घटनाओं का विवरण देने वाले तमाम उदाहरण सही ओर खरे हैं---मगर इस प्रकार के उदाहरणों के आधार पर यह स्वीकार करना शायद ठीक होगा कि पुनर्जन्म एक सार्वभौमिक सिद्धान्त अथवा प्रकृ्ति की अब तक न समझ पाई गई कार्यनिधि का हिस्सा है। इसलिए आज के वैज्ञानिकों के लिए ये पहेली बनी हुई है कि आखिर ये दोबारा से जन्म लेने का रहस्य क्या है? परन्तु इस प्रकार के सारगर्भित प्रश्नों को यदि इस सृ्ष्टि में कभी सबसे पहले कहीं पूछा गया है तो वो हैं---इस भारतभूमी पर रचे गये वेद और उपनिषद। मानव मन में उमडने वाले इस प्रकार के ही अन्य असंख्य प्रश्नों के जवाब हमारे पूर्वज हमें सौंप गये हैं,जिनमें से आज एक एक करके वो जवाब हमें वैज्ञानिक रूप में मिल रहे हैं।
उदाहरण के लिए श्वेतांबर उपनिषद में प्रश्न आता है कि "मन की चंचलता का क्या कारण है?"
वृ्हदारण्यक उपनिषद का यह प्रश्न कि "जीव जब निद्रावस्था में होता है तो बुद्धि कहाँ चली जाती है?"। केनोपनिषद का यह प्रश्न कि "मनुष्य किसकी इच्छा से बोलता है", या फिर ये प्रश्न कि "क्या मृ्त्यु के पश्चात भी कुछ ऎसा है! जो कि बचा रह जाता है?" उपनिषदों से जन्मी यह भारतीय दृ्ष्टि कालांतर में अद्वैत वेदांत तक आते आते एक व्याप्त स्थापना के रूप में फलित होती गई।
अद्वैत वेदांत अनुसार कि "ब्रह्म सदैव विकासशील रहता है" । आधुनिक युग में इस स्थापना की सर्वप्रथम पुष्टि हुई आईंस्टीन के इस कथन द्वारा कि "यूनिवर्स निरन्तर प्रगति पर है"।
वेदांत में जिस शब्द का सबसे अधिक प्रयोग किया गया है---वो है "माया"। यूँ तो इस शब्द से हम सभी लोग भलीभांती परिचित हैं,किन्तु इसके वास्तविक स्वरूप से हम लोग नितांत अपरिचित हैं। 
आईये वेदांत की दृ्ष्टि से माया और पुनर्जन्म के इस रहस्य को समझने का थोडा प्रयास किया जाए। वेदांत कहता है कि "माया" परमसत्ता की एक बीजशक्ति है,जिसके अनेक नाम और रूप हैं।जिस प्रकार से आप उष्मा(Heat) को अग्नि से अलग नहीं कर सकते ठीक उसी प्रकार से माया भी ब्रह्मतत्व(प्रकृ्ति) से भिन्न नहीं है। इसके तीन गुण हैं---सत्त,रज और तम।अकाश,वायु,अग्नि,जल,पृ्थ्वी इन पाँचों तत्वों के द्वारा किसी नवीन उत्पति की क्रिया में यही तीन गुण माया द्वारा क्रियाशील रहते हैं।
इन पाँचों तत्वों में जब सात्विक अंश( सत्त) की प्रधानता रहती है तो आकाश से श्रोत(शब्द),वायु से स्पर्श,अग्नि से नेत्र,जल से जिव्हा और पृ्थ्वी से घ्राण(गंध) नाम वाली पाँच ज्ञानेण्द्रियाँ निर्मित होती हैं। इन्ही से बुद्धि,मन,चित्त और अहंकार जैसी मानसिक कृ्तियां उत्पन होती हैं। जिनमें ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों का प्रेरक बनता है--मन।
इन्ही पाचों तत्वों से निर्मित हमारी इस स्थूल देह का नाम है--अन्नमय कोश जो कि मृ्त्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है। शरीर में स्थित पाँच वायु और पाँच कर्मेंन्द्रियों के योग का नाम है---प्राणमय कोष। पाँचों ज्ञानेण्द्रियों के योग को कहा गया है---मनोमय कोष तथा बुद्धितत्व युक्त पंच ज्ञानेंद्रियों को विज्ञानमय कोष। अंतिम कोश सत्वगुणी अविद्या से संचालित आनंदमय कोष है,लेकिन आत्मा जो है वो इन सब से एक अलग सत्ता है।
वैदिक दृ्ष्टि के अनुसार मृ्त्यु के पश्चात भी न मरने वाला सूक्ष्म शरीर पाँच ज्ञानेन्द्रियों,पाँच कर्मेंद्रियों, पाँच प्राण, एक मन  और एक बुद्धि के योग से बना है। यही वह सूक्ष्म शरीर है जो कि प्रारब्ध और संचित कर्मों के कारण मृ्त्यु पश्चात बार बार जन्म लेता है।
ऎसा नहीं है कि सूक्ष्म शरीर की ये अवधारणा सिर्फ भारतीय है बल्कि "Egyptian Book of the Dead "   में भी सूक्ष्म शरीर के बारे में विचार प्रकट किए गए हैं।
आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के डा. सेसिल ने भी प्रयोगों के आधार पर एक निष्कर्ष निकाला था कि स्थूल शरीर के समानान्तर किसी एक सूक्ष्म शरीर की सत्ता है,जो कि सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों के बावजूद कभी कभी शरीर को छोडकर दूर चली जाती है,हालांकि एक सुनहले रंग के सूक्ष्म तंतु(तार) के माध्यम से ये हर हाल में हमारे इस स्थूल शरीर की नाभी से जुडी रहती है। जब कभी यह सुनहला तंतु (तार) किसी कारणवश टूट जाता है तो उस सूक्ष्म सत्ता का स्थूल शरीर से फिर कोई संबंध नहीं रह जाता और यही किसी व्यक्ति की आकस्मिक मृ्त्यु का कारण बनता है।
आज विश्व के वैज्ञानिकों द्वारा की गई खोजों के आधार् पर ये कहा जाता है कि अणु के भीतरी भाग में एक तरह की नियति या कहें कि शून्य है।अणु के भीतर इस शून्य के द्वारा ही सूक्ष्म शरीर की रचना होती है।परन्तु एक शून्य द्वारा उत्पन सूक्ष्म शरीर द्वारा स्थूल शरीर को छोडकर चले जाना ही आज के वैज्ञानिकों के सामने एक बडी पहेली है। लेकिन यदि वेदांत का आश्रय लिया जाए तो शायद इस पहेली को सही रूप में आसानी से सुलझाया जा सकता है।
इन आधारों पर यह कहने में कोई संकोच नहीं कि हो सकता है कि विज्ञान शायद पुनर्जन्म की इस पहेली को जल्द ही सुलझा ले;लेकिन इस विषय में मेरा तो ये मानना है कि विज्ञान चाहे किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचे किन्तु अन्त में उसे हमारे विचारों का समर्थन करना ही होगा। हाँ,ये हो सकता है भले ही उनकी भाषा अद्वैत वेदांत की गूढ भाषा से भिन्न हो।
(सभी चित्र अन्तर्जाल से साभार लिए गए हैं)