स्वरोदय के माध्यम से असाध्य रोगों से मुक्ति संभव

स्वरोदय अर्थात नाक के द्वारा सांस का चलना। नाक में दो छिद्र होते हैं और इकट्ठे इन दोनों छिद्रों से श्वास कभी कभी ही चलता है। जब की कुछ समय का अन्तर देकर कभी दाहिने पार्श्व तो कभी बाएं पार्श्व से श्वास चलता है।जब दोनों स्वर इक्कठे चल रहे होते हैं तो उसे सुषुम्ना कहा जाता है। दाहिने नासा छिद्र से श्वास चले तो पिंगला और बाएं तरफ से श्वास चलने को इडा कहते हैं। प्रत्येक मनुष्य दिन रात में 21600 श्वाँस लेता है। और लगभग 8 मिन्ट 2 सैकिंड के अन्तर से श्वास बदलते रहते हैं। एक बार दाहिने नथुने से 8 मिन्ट 2 सैकिंड तो दूसरी बार बाएं नथुने से भी 8 मिन्ट 2 सैकिंड। इस प्रकार से जब तक व्यक्ति जीवित है, तब तक दिन रात श्वासों का ये क्रम अनवरत चलता रहता है।

सबसे पहले यहाँ बात करते हैं पिंगला नाडी की,जिसकी प्रकृ्ति अति उष्ण है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार ये नाडी सूर्य के द्वारा संचालित मानी जाती है।भारतीय योग शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र अनुसार मणिपुर चक्र नाभी के ठीक नीचे स्थित है और इसी चक्र पर सूर्य का अधिष्ठान माना गया है। पिंगला नाडी जो कि इसी मणिपुर चक्र से प्रारंभ होकर दाहिने नथुने तक पहुंचती है,इस नाडी से सदैव उष्ण श्वास निकलता है। इसका अनुभव हम अपने नित्य प्रति के व्यवहार में भी कर सकते हैं। जैसे कि सूर्योदय के पश्चात मनुष्य को भूख लगने की क्रिया प्रारंभ हो जाती है,यहाँ भूख लगना ही उष्णता बढना है। अब जैसे जैसे भूख जोर पकडती है वैसे ही शरीर में उष्णता बढने लगती है।ऎसे समय पर यदि खाने को कुछ न मिले तो शरीर तपता है,सिर गर्म होता है ओर आँखों के सामने अन्धेरा या चक्कर आने जैसा अनुभव होने लगता है। यह समस्त क्रिया नाभी के मूल से प्रारंभ होती है। अक्सर देखने में आता है कि यदि प्रात:काल में कुछ न खाया हो तो 12 बजे के लगभग भूख जोर मारने लगती है, और यही समय सूर्य के भी मध्यांह में पहुंचने का काल होता है। इसके बाद जैसे जैसे सूर्य पश्चिम की ओर बढता चला जाता है,वैसे ही क्षुधा की तीव्रता भी क्रमश: शान्त होने लगती है। अब इससे इतना तो स्पष्ठ हो गया होगा कि सूर्य का पेट की उष्णता से अत्यन्त निकट का पारस्परिक संबंध है।

इसी प्रकार से बाएं नथुने से जो श्वास प्रक्रिया चलती है, जिसे कि इडा नाडी कहा जाता है---उसे चन्द्र ग्रह संचालित करता है।
मनुष्य के सिर के बाएं भाग में बाएं नेत्र के ऊपरी हिस्से में अमृ्त रस निर्माण होने का एक स्थान है।जो कि द्रव्य रूप में मौजूद रहता है और इसमे गुणधर्म,तेज,ओज,शरीर को नैसर्गिक सुगन्ध,रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करना इत्यादि गुण है।
प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त के समय इस द्रव्य में से दो इतने ही बडे बिन्दु जो कि सूई की नोक पर ठहर सकें,प्रत्येक मनुष्य के मुख में गिरते हैं। जिसमें से एक बिन्दु सीधे कुण्डलिनी(नाभी और लिंगमूल के मध्य) में जाकर मिलता है, अर्ध बिन्दु मणिपुर चक्र (नाभी के नीचे) और शेष अर्ध बिन्दु मुख में ही रह जाता है,जिसका कार्य मुँह में आद्रता बनाए रखना और लार निर्माण करना है। इसे स्पष्ट व्यवहारिक रूप से उस समय समझा जा सकता है जब व्यक्ति की मृ्त्यु निकट होती है। उस समय व्यक्ति का मुख सूखने लगता है,अब यदि उस मरणासन्न व्यक्ति के मुख में नल भी खोल दिया जाए तो भी उसके मुख की आद्रता नहीं लौट सकती। इसी अमृ्त को योगशास्त्र में "मद्य" नाम से जाना गया है।
अब जो बाएँ नथुने से श्वास प्रारंभ होकर अनाहत चक्र तक पहुँचता है ओर वहाँ से वापिस लौटता है,उसी चन्द्रामृ्त को स्पर्श करते हुए चलता है। इसीलिए बाएं नथुने से चलती हुई श्वास में सदैव अति शीतलता रहती है।
इस प्रकार से दो ग्रहों सूर्य और चन्द्र के बारे में विवेचना करने के पश्चात अब बात करते हैं तीसरी सुषुम्ना नाडी की, जो कि शनि द्वारा संचालित होती है। कोई भी एक स्वर चलते चलते जब कभी भी अचानक दूसरा स्वर चलने लगता है यानि कि जब श्वास दाहिने नथुने से बाएं नथुने या बाएं से दाहिने नथुने में परिवर्तित होता है तो उस समय 5 सैकिंड का एक संधिकाल होता है। उस समय हमारे नाक के सिरे के 4 अंगुल ऊपर बाहर एक बहुत ही धीमी गति से नाडी चलती है। योगशास्त्र में इसे "कालभक्षक" तथा "श्मशान" नाम से जाना जाता है। इसका महत्व आप इसी बात से जान सकते हैं कि इस नाडी में से श्वास निकले बिना मनुष्य की मृ्त्यु नहीं हो सकती। यह नाडी विनाशकारी तो है ही किन्तु साथ ही ज्ञानदायिनी भी है। इस नाडी पर शनि का प्रभाव होता है और शनि का भी यही गुणधर्म है---विनाश और ज्ञान।
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आज मैं उन लोगों के लिए एक बेहद आसान सा प्रयोग देना चाह रहा हूँ जो कि किसी भी प्रकार के साध्य/असाध्य(दैहिक या मानसिक)रोग से पीडित हैं। सबसे पहले तो भूमी पर ध्यान मुद्रा में बैठकर अपनी जीभ को उलटकर तालू से स्पर्श करें। उसके बाद दाहिने नथुने को बन्द करके सिर्फ बाँए नथुने से ही साँस अन्दर की ओर खीँचे और छोडें। लगभग 15-20 मिन्ट तक नियमित रूप से रोजाना करें तो कुछ दिनों में ही आपको आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिलेंगे। ये मेरा अनुभवसिद्ध प्रयोग है, जिसे कि सैंकडों बार कईं प्रकार के रोगों से पीडित व्यक्तियों पर आजमाया जा चुका है। लेकिन आज तक एक बार भी इसमें कभी असफलता का मुख देखने को नहीं मिला। यदि कोई भी रोगग्रसित व्यक्ति नियमित रूप से रोजाना इसे करे तो गारन्टी सहित उसे शुभ परिणाम मिलने लगेंगे।  इसका कारण ये है कि सहस्त्रार से निरन्तर टपकने वाला जो चन्द्रामृ्त(दिव्य रस) है,वो व्यक्ति के शरीर में अच्छी तरह से पहुचकर उसकी रोग प्रतिरोधक शक्ति को अद्भुत रूप से बढा देता है, जिससे कि बडे से बडे असाध्य एवं प्राणघातक रोगों से भी शनै: शनै: पूर्ण रूप से मुक्ति मिल जाती है। इसमें सबसे बडी बात ये है कि इसे करने के दौरान  अपनी जीवन पद्धति में बदलाव लाने या अपने खानपान में किसी परिवर्तन करने की भी कोई आवश्यकता नहीं।बस कीजिए ओर कुछ दिनों पश्चात उसका फल देखिए!!!!