सूर्य ग्रहण का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व

ये तो सर्वविदित है कि सूर्य के प्रकाश को पृ्थ्वी पर पहुँचने में चन्द्रमा द्वारा उत्पन व्यवधान/बाधा के दृ्श्य को ही सूर्योपराग अर्थात सूर्यग्रहण कहा जाता है।  ग्रहण प्रकृ्ति का एक अद्भुत चमत्कार है। ज्योतिष के दृ्ष्टिकोण से यदि देखा जाए तो अभूतपूर्व अनोखा,विचित्र ज्योतिष  ज्ञान,ग्रह और उपग्रहों की गतिविधियाँ एवं उनका स्वरूप स्पष्ट करता है। ग्रह नक्षत्रों की दुनिया की यह घटना भारतीय मनीषियों को अत्यन्त प्राचीन काल से ज्ञात रही  है। चिर प्राचीन काल में महर्षियों नें गणना कर दी थी। इस पर धार्मिक,वैदिक,वैचारिक,वैज्ञानिक विवेचन धार्मिक एवं ज्योतिषीय ग्रन्थों में होता चला आया है। महर्षि अत्रीमुनि ग्रहण के  ज्ञान को देने वाले प्रथम आचार्य थे। श्रृग्वेदीय प्रकाश काल अर्थात वैदिक काल से ग्रहण पर अध्ययन,मनन और परीक्षण होते चले आये हैं।
श्रृग्वेद के एक मन्त्र में यह चमत्कारी वर्णन मिलता है कि "हे सूर्य्! असुर राहू ने आप पर आक्रमण कर अन्धकार से जो आपको विद्ध कर दिया,उससे मनुष्य आपके रूप को पूर्ण तरह से देख नहीं पाये और अपने अपने कार्यक्षेत्रों में हतप्रभ से हो गये। तब महर्षि अत्री ने अपने अर्जित ज्ञान की सामार्थ्य से छाया का दूरीकरण कर सूर्य का उद्धार किया"।
अगले मन्त्र में यह आता है कि "इन्द्र नें अत्रि की सहायता से ही राहू की सीमा से सूर्य की रक्षा की थी"। इसी प्रकार ग्रहण के निरसण मे समर्थ महर्षि अत्रि के तप: संधान से समुदभुत अलौकिक प्रभावों का वर्णन वेद के अनेक मन्त्रों में प्राप्त होता है। किन्तु महर्षि अत्रि किस अद्भुत सामर्थ्य से इस आलौकिक कार्यों में दक्ष माने गये,इस विषय में दो मत हैं--- प्रथम परम्परा प्राप्त यह मत है कि,वे इस कार्य में तपस्या के प्रभाव से समर्थ हुए और दूसरा यह कि,वे कोई नया यन्त्र बनाकर उसकी सहायता से ग्रहण से ग्रसित हुए सूर्य को दिखलाने में समर्थ हुए। अब आधुनिक युग है,लोगों की सोच भी आधुनिक होती जा रही है इसलिए तपस्या के प्रभाव जैसे किसी मत की अपेक्षा यहाँ हम दूसरे मत को ही स्वीकार कर लेते हैं हैं। कुल मिलाकर इतना स्पष्ट है कि अत्यन्त प्राचीन काल में भारतीय सूर्यग्रहण के विषय में पूर्णत: जानते थे।

वैज्ञानिक कहते हैं कि पृ्थ्वी की छाया पडने से ग्रहण होता है,उनका यह कथन कुछ अंश तक ठीक है। वस्तुत: पृ्थ्वी की छाया पडने से चन्द्रग्रहण होता है और चन्द्रमा के द्वारा सूर्य के ढके जाने से सूर्यग्रहण होता है, तो शास्त्रों के प्रमाणों स़े ही सिद्ध है।
वैज्ञानिकों के सिद्धान्त अपने ढंग के हैं। पहले वैज्ञानिक आकाश को भी नहीं मानते थे,अब "इथर" नाम से उसे मानने लगे हैं। भारतीय ग्रन्थों में तो श्रुति,स्मृ्ति,पुराण,दर्शन,ज्योतिष आदि में आकाश को माना है बल्कि न्यायशास्त्र में तो बडे दृ्ड प्रमाण देकर आकाश को सिद्ध किया गया है। आकाश अन्यतम पन्चमहाभूत है।


खगोल शास्त्रीयों नें गणित से निश्चित किया है कि 18 वर्ष 18 दिन की समयावधि में 41 सूर्य ग्रहण और 29 चन्द्रग्रहण होते हैं। एक वर्ष में 5 सूर्यग्रहण तथा 2 चन्द्रग्रहण तक हो सकते हैं।किन्तु एक वर्ष में 2 सूर्यग्रहण तो होने ही चाहिए। हाँ,यदि किसी वर्ष 2 ही ग्रहण हुए तो वो दोनो ही सूर्यग्रहण होंगे। यधपि वर्षभर में 7 ग्रहण तक संभाव्य हैं,तथापि 4 से अधिक ग्रहण बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। प्रत्येक ग्रहण 18 वर्ष 11 दिन बीत जाने पर पुन: होता है।किन्तु वह अपने पहले के स्थान में ही हो--यह निश्चित नहीं हैं;क्योंकि सम्पात बिन्दु निरन्तर चल रहे हैं।
साधारणतय: सूर्यग्रहण की अपेक्षा चन्द्रग्रहण अधिक देखे जाते है, परन्तु सच्चाई यह है कि चन्द्र ग्रहण से कहीं अधिक सूर्यग्रहण होते हैं। 3 चन्द्रग्रहण पर 4 सूर्यग्रहण का अनुपात आता है। चन्द्रग्रहणों के अधिक देखे जाने का कारण यह होता है कि वे पृ्थ्वी के आधे से अधिक भाग में दिखलाई पडते हैं,जब कि सूर्यग्रहण पृ्थ्वी के बहुत बडे भाग में प्राय: सौ मील से कम चौडे और दो से तीन हजार मील लम्बे भूभाग  में दिखलाई पडते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि मध्यप्रदेश में खग्रास(जो सम्पूर्ण सूर्य बिम्ब को ढकने वाला होता है) ग्रहण हो तो गुजरात में खण्ड सूर्यग्रहण( जो सूर्य बिम्ब के अंश को ही ढंकता है) ही दिखलाई देगा और उत्तर भारत में वो दिखायी ही नहीं देगा।

आध्यात्मिक दृ्ष्टिकोण:-
यह तो स्पष्ट है कि सूर्य में अद्भुत शक्तियाँ निहित हैं और ग्रहण काल में सूर्य अपनी पूर्ण क्षमता से इन शक्तियों को, इन रश्मियों को विकीर्ण करता है, जिसे ध्यान-मनन के प्रयोगों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है,किन्तु उतना ही जितना हमारे शरीर में क्षमता है। ग्रहण का शाब्दिक अर्थ ही लेना, अंगीकार या स्वीकार करना है। हमारे श्रृषि मुनियों नें इतना  ज्ञान हमारे सम्मुख रखा है जिसका अनुमान लगाना,अर्थात  ज्ञान से ज्ञान को प्राप्त करना ही जीवन की सार्थकता है। अपने भीतर के अन्धकार को मिटाने के लिए दैविक आराधना,पूजा अर्चना इत्यादि विशेष पर्वों पर करते रहने का विधान है।जैसा कि ग्रहण काल में उत्तम यौगिक क्रिया,पूजा अनुष्ठान,मन्त्र सिद्धि,तीर्थ स्नान,जप दान आदि का अपना एक विशेष महत्व है। इसके प्रमाण शास्त्रों में विधमान हैं। बहुत से बुद्धिजीवी लोग कहते है कि ग्रहण काल में ध्यान मनन,जाप,उपवास इत्यादि निरा अन्धविश्वास है, इन सब का कोई औचित्य नहीं। भई मान लेते हैं कि इन सब से कुछ नहीं होता। अब यदि कोई व्यक्ति इसी बहाने (चाहे भयवश ही) कुछ समय ध्यान,जाप,पूजा पाठ आदि का आश्रय ले लेता है तो उसमें हर्ज भी क्या है? यदि कुछ नहीं भी होने वाला तो कम से कम कुछ क्षण के लिए ही सही किसी अच्छे काम में तो लगेगा। हालाँकि इस सन्दर्भ में मेरे पास कोई प्रमाण नहीं हैं किन्तु फिर भी मेरा इस विषय में निजी मत ये है कि ग्रहण का प्रभाव पृ्थ्वी के समस्त जीव-जंतुओं,पशु पक्षियों,वनस्पति इत्यादि पर अवश्य पडता है। क्यों कि ग्रहण काल में देखने को मिलता है कि अनायास जानवर उत्तेजित हो उठते हैं,पक्षी अपने घोंसलों में दुबक जाते हैं और कईं प्रकार के फूल अपनी पंखुडियाँ समेट लेते हैं।

वैज्ञानिक दृ्ष्टिकोण:-
चाहे ग्रहण का कोई आध्यात्मिक महत्व हो अथवा न हो किन्तु  दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए यह अवसर किसी उत्सव से कम नहीं होता। बडे बडे शोधकर्ता एवं खगोलविद इसके इन्तजार में पलक पांवडे बिछाए रहते हैं। क्यों कि ग्रहण ही वह समय होता है जब ब्राह्मंड में अनेकों विलक्षण एवं अद्भुत घटनाएं घटित होती हैं जिससे कि वैज्ञानिकों को नये नये तथ्यों पर कार्य करने का अवसर मिलता है। 1968 में लार्कयर नामक वैज्ञानिक नें सूर्य ग्रहण के अवसर पर की गई खोज के सहारे वर्ण मंडल मे हीलियम गैस की उपस्थिति का पता लगाया था।आईन्स्टीन का यह प्रतिपादन भी सूर्य ग्रहण के अवसर पर ही सही सिद्ध हो सका,जिसमें उन्होने अन्य पिण्डों के गुरूत्वकर्षण से प्रकाश के पडने की बात कही थी। चन्द्रग्रहण तो अपने संपूर्ण तत्कालीन प्रकाश क्षेत्र में देखा जा सकता है किन्तु सूर्यग्रहण अधिकतम 10 हजार किलोमीटर लम्बे और 250 किलोमीटर चौडे क्षेत्र में ही देखा जा सकता है। सम्पूर्ण सूर्यग्रहण की वास्तविक अवधि अधिक से अधिक 11 मिन्ट ही हो सकती है उससे अधिक नहीं। संसार के समस्त पदार्थों की संरचना सूर्य रश्मियों के माध्यम से ही संभव है। यदि सही प्रकार से सूर्य और उसकी रश्मियों के प्रभावों को समझ लिया जाए तो समस्त धरा पर आश्चर्यजनक परिणाम लाए जा सकते हैं। सूर्य की प्रत्येक रश्मि विशेष अणु का प्रतिनिधित्व करती है और जैसा कि स्पष्ट है,प्रत्येक पदार्थ किसी विशेष परमाणु से ही निर्मित होता है।अब यदि सूर्य की रश्मियों को पूंजीभूत कर एक ही विशेष बिन्दु पर केन्द्रित कर लिया जाए तो पदार्थ परिवर्तन की क्रिया भी संभव हो सकती है।

 अभी कुछ समय बाद ही एक बहुत बडा सूर्य ग्रहण आ रहा है। अब यदि आप वैज्ञानिक विचारधारा के पक्षधर हैं तो प्रकृ्ति प्रदत्त इस अद्भुत नजारे का आनन्द लीजिए और यदि आपकी दृ्ष्टि में इसका कोई आध्यात्मिक महत्व है तो अपने इष्टदेव का ध्यान,जाप कीजिए,तीर्थस्नान कीजिए।
भगवान सूर्यदेव सबके जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाते रहें.........