जंग लडनी है तो ढोंग,पाखंड के विरूद्ध लडें, न कि सत्य के विरूद्ध

शायद लगता है कि सैंकडों वर्षों तक पराजय और गुलामी का दंश झेलने वाले इस देश के एक वर्ग के लोगों के भीतर परतन्त्र मानसिकता का बीज अपनी जडें बहुत गहरी जमा चुका है।हर बात को प्रमाणित करने के लिए विदेशों की ओर ताकने की जिनकी आदत बन चुकी हैं। पश्चिम यदि वेद-पुराणों की सत्यता की हामी भरेगा तो ही ये लोग उन पर विश्वास करेंगे वर्ना इनकी दृ्ष्टि में ये वेद,पुराण,शास्त्र इत्यादि सब के सब सिर्फ समाज में ढोंग फैलाने की पोथियाँ भर हैं। ज्योतिष,मंत्र विज्ञान,तंत्र शास्त्र इत्यादि जितनी भी वेद वर्णित विधाएं है--इनकी नजर में ये सब अन्धविश्वास हैं,पाखंड हैं,ढोंग है।

आज अगर पश्चिम ज्योतिष विधा पर सत्यता की अपनी मोहर लगा दे तो कल यही लोग ज्योतिषियों के चरण चूमते दिखाई देंगें।वैसे अभी भी इनमे से अधिकांशत: ऎसे लोग मिल जाएंगे जो कि अपने आप को आधुनिक विचारों का पोषक दिखाने को समाज के सामने इन्हे ढोंग,पाखंड,अंधविश्वास कह कर चीखते चिल्लाते नजर आएंगे, लेकिन जहाँ किसी समस्या से दो-चार हुए नहीं कि चल पडेंगे पंडित जी के पास अपनी जन्मपत्री ले कर। देखा जाए तो हमारा प्राचीन योग-सिद्धान्त भी विदेशी सहमति से जब नए नामकरण के साथ योग से  "योगा" होकर लौटा तो ही आज उसका महत्व इन्हे समझ आ रहा है,वर्ना उसे भी इससे पहले कोई पूछने वाला नहीं था।

माना कि आज समाज में जो अन्धविश्वास,पाखंड,ढोंग अपनी जडें बहुत गहरे तक फैला चुका है, उसके विरूद्ध आवाज उठाना,उसे नष्‍ट करना किसी भी विवेकशील,जिम्मेदार व्यक्ति का कर्तव्‍य ही नहीं अपितु धर्म भी है,समाज में अन्धविश्वास फैलाने और पाखण्‍ड रचने वालों का भाँडा फोड़ होना ही चाहिये क्‍योंकि ऐसे पाखण्‍डी समाज, देश और इसकी संस्‍कृति को भी एक तरह से रसातल में धकेल रहे हैं।जिनका सिर्फ एक ही कार्य है कि किस प्रकार जनता को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा किया जाए। दूसरों के परिश्रम से कमाए धन को धोखे से जो लूट रहे हैं,उन्हे यदि बेनकाब करके समाज को जागरूक किया जाए तो इसमे तो किसी भी विवेकशील मनुष्य को आपत्ति होनी भी नहीं चाहिए। किन्तु ये किस प्रकार की वैज्ञानिक चेतना है,जिसके जरिए आधारहीन अंधविश्वासों की धज्जियां उड़ाने के क्रम में अति महत्वपूर्ण विषयों को भी संदेह के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। ये सत्य है कि धूर्त लोगों के स्वार्थ की भेंट चढकर आज ये विधाएं अपना मूल स्वरूप खोती जा रही हैं,किन्तु इससे इनकी सत्यता तो समाप्त नहीं हो जाती। यदि जंग लडनी है तो उन ढोंगियों, पाखंडियो के विरूद्ध लडिए जो कि इनकी गरिमा को नष्ट करने पे तुले हुए हैं न कि सत्य के विरूद्ध लाठी ताने खडे रहें।चलिए इन्ही की बात को सर्वोपरि रखते हुए एक क्षण के लिए मैं मान लेता हूँ कि ज्योतिष,मंत्र,तंत्र इत्यादि कुछ नहीं हैं-----ढोंग हैं,पाखंड है,अन्धविश्वास हैं। अब ये लोग प्रमाणित करें कि ये सब वास्तव में बकवास हैं। जिस वैज्ञानिकता के नाम पर ये लोग जब दूसरों से इन विषयों की सत्यता का प्रमाण माँगते हैं तो स्वयं उनकी असत्यता क्यूं नहीं प्रमाणित कर देते।

मैं इन लोगों से सिर्फ इतना जानना चाहता हूँ कि भई ये दोहरी मानसिकता क्यूँ? एक तरफ तो आप लोग अपने आप को  वैज्ञानिक विचारधारा का पक्षधर बता कर विज्ञान का दम्भ भरते नहीं अघाते और दूसरी तरफ विज्ञान का जो एक मूलभूत सिद्धान्त है कि ---बिना प्रमाण के किसी भी विषयवस्तु के सत्य-असत्य का निर्धारण नहीं किया जा सकता,आप लोग उस पर भी खरे नहीं उतरते। शायद इन्हे एक ये भी भय सता रहा होगा कि यदि इन विषयों की सच्चाई सामने आ गई तो कहीं उनकी अपनी सोच पर ही गलत होने की मोहर न लग जाए।


सच पूछिए तो विज्ञान का लबादा ओढे ये वो लोग हैं जिनकी न तो कोई अपनी सोच है और न ही विचारधारा। ये लोग सिर्फ अपनी मन की धारणाओं को ही सही माने बैठे हैं। किसी ओर की किसी भी बात को मानना तो बहुत दूर,उसे जानने, समझने का भी प्रयास नहीं करना चाहते। ये लोग समझते हैं कि जो वे जानते हैं सिर्फ वही सही है,बाकी सारी दुनिया तो मूर्खों का घर है। 

लेकिन जिस दिन इन लोगों की बुद्धि से अज्ञान का पर्दा उठ गया तो ये स्वयं मानने लगेंगे कि ज्योतिष,मंत्र,तंत्र इत्यादि विद्याएं ज्ञान की वह चरम सीमा है जहां तक पहुंचने में भौतिक विज्ञान को अभी शायद शताब्दियों समय लगेगा, लेकिन फिर भी यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि आज का विज्ञान वहां पहुंच पाये जहां हमारे तत्वचितंक ऋषि मुनि और मनीषि पहुँच चुके थे।