क्या यमलोक वास्तव में है?

(चित्र साभार:- गूगल)
कुछ सवाल शायद ऎसे हैं, जिनके जवाब ढूंढने का प्रयास मानव अपने अस्तित्व के उषाकाल से ही करता आया है--- आकाश का विस्तार कहाँ तक है ? कैसे हुई ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और कैसे होगा इसका अन्त ? क्या इस ब्राह्मण्ड के किसी अन्य पिण्ड पर भी हमारे जैसे जीवों का अस्तित्व है? इस अनन्त सृ्ष्टि में कहीं ओर भी जीवन है, या कि सिर्फ हम ही हैं ?
इन सवालों के उत्तर प्राप्त करने के लिए  मानव द्वारा सहस्राब्दियों तक आकाश के ग्रह-नक्षत्रों की गति-स्थिति का अध्ययन किया जाता रहा और आज के इस अति आधुनिक काल में भी सब वैज्ञानिक,मीमांसक और अन्वेषक इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ने में लीन हैं।
कुछ दिनों पहले अन्तरिक्ष में जीवन की सम्भावनाएं--(पुराणों में छिपा रहस्य) नामक एक लेख के जरिए मैने यह बताने का प्रयास किया था कि श्रीमदभागवत पुराण में जिस वैतरणी नदी का वर्णन किया गया है, वास्तव में वो एक नदी न होकर सुदूर आकाशमंडल में स्थित् एक तारामण्डल है, जिसकी आकृ्ति एक नदी से मिलती जुलती है। इसकी धारा मृ्गशिरा तारामंड्ल( जो कि दक्षिण दिशा में स्थित है) के पास से आरम्भ होकर पश्चिम की ओर चलती हुई फिर दक्षिणपूर्व की ओर मुडकर पुन: दक्षिण पश्चिम व अन्तत: दक्षिणी ध्रुव से 23 अंश ऊपर को समाप्त होती है। दक्षिण एवं मध्य भारत से इस तारा मण्ड्ल को बहुत सरलता से देखा जा सकता है।
( इस बात से तो प्रत्येक व्यक्ति भली भान्ती परिचित है दक्षिण दिशा को यम का निवास माना जाता है, हिन्दुओं में मृ्त्य पश्चात मृ्तक का सिर दक्षिण की ओर करके ही रखा जाता है, पितरों/पूर्वजों हेतु किए जाने वाले सभी कर्म भी दक्षिण मुख होकर ही किए जाते हैं तथा गावों में आज भी श्मशान दक्षिण दिशा में ही बनाए जाते है)
अब आधुनिक खोजों से पता चला है कि वैतरणी मंड्ल का "इप्सिलोन" नामक तारा गुण धर्म में बिल्कुल हमारे सूर्य जैसा है, जो कि स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित है। यह सूर्य की भान्ती ही अपनी धुरी पर घूमता है, जिससे यह अनुमान लगाया गया है कि इसका भी हमारे सौरमण्डल की तरह कोई मण्डल होना चाहिए। इसी से वहाँ के किसी ग्रह पर जीवन की प्रबल सम्भावना हो सकती है। यह तारा हमारी पृ्थ्वी से दस हजार अरब किलोमीटर दूर स्थित माना गया है। स्टीफन उदरे नाम के एक पाश्चात्य वैज्ञानिक  ने भी संभावना व्यक्त की है कि इस इप्सिलोन नामक तारे अथवा इसके सौरमण्डल में कहीं जीवन सम्भव हो सकता है।
गरूड पुराण की कथा में एक जगह वर्णित है कि उस लोक(यमलोक) में बारहों सूर्य ऐसे तपतें हैं, जैसे प्रलय के अंत में अग्नि रूप में तपते हैं।अब क्या ये संभव नंही हो सकता कि सचमुच उस लोक(या ग्रह, जो भी आप कह लें) पर 12 सूर्य हों। अब इस विचार को तो स्वयं विज्ञान भी मान कर चल रहा है कि इस सृ्ष्टि में अनेक सौरमण्डल(सूर्य) मौजूद हैं।तो क्या ये नहीं हो सकता कि जिस प्रकार हमारे सौरमंडल में एक सूर्य चमक रहा है, उसी प्रकार वहां के सौरमंडल में 12 सूर्य चमकते हो।
हो सकता है कि मेरी बातें आप लोगों को कपोल कल्पना नजर आ रही हो,किन्तु मेरा ये दृ्ड विश्वास है कि इस प्रकार की पौराणिक  कथाओ के माध्यम से हमे ज्ञान का बृ्हद कोष सौंपा गया है और मेरे इस विश्वास का आधार ये वेदांग ही हैं जिनमें कही गयी बातें वर्तमान में आकर कहीं ना कहीं, किसी ना किसी रूप में सत्य सिद्ध हो रही हैं।