वैदिक विज्ञान के रहस्य

पिछले कुछ समय से ब्लागजगत में किसी भी वस्तु, विषय या सिध्दांतों को भौतिकतावादी आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर परखने की एक ऐसी भेडचाल प्रारंभ हुई है, जिसने अनेकानेक आधारहीन अंधविश्वासों की धज्जियां उड़ाने के क्रम में कुछ अति महत्वपूर्ण विषयों व आस्थाओं को भी संदेह के कटघरे में खड़ा करना आरम्भ कर दिया है। विज्ञान की इस नयी रोशनी के जरिए कुछ  लोग वैदिक सभ्यता एवं संस्कृ्ति की प्रत्येक विषयवस्तु का मूल्यांकन करने में लगे हुए हैं----लेकिन अपनी आँखें बन्द करके। इस मूल्यांकन में वेद,पुराण, शास्त्रों  और सबसे अधिक ज्योतिष विधा को   सर्वाधिक तिरस्कृत व उपेक्षित विषय साबित करने की भरपूर चेष्टा की जा रही है। यही वजह है कि अपने आपको अत्याधुनिक व वैज्ञानिक विचारों का पोषक दिखाने के इस फैशन में अधिकांश लोग इन गूढ़ विद्याओं को मूर्खता एवं अपने शास्त्रों को अंधविश्वास का जनक मानने लगे हैं।किन्तु  विज्ञान की परिभाषा यदि सही अर्थों में समझ ली जाय तो अध्यात्म, ज्योतिष,तंत्र-मंत्र इत्यादि जितनी भी गूढ विधाएं हैं, उन सब को विज्ञान की अति उच्चस्तरीय उन विधाओं के रूप में माना जायगा जो दृश्य परिधि के बाद अनुभूति के स्तर पर आरम्भ होती हैं । इतना भर जान लेने लेने पर वे सारे विरोधाभास मिट जायेंगे जो आज विज्ञान और परा विधाओं के बीच बताए जाते हैं ।

कुछ समय पूर्व "SCIENCE REPORTER" नामक अंग्रेजी पत्रिका जो कि National Institute of Science comunication & information resorces,नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुई थी, उसके २००७ के अंक में श्री डी०पी०सिहं द्वारा लिखित एक लेख "ANTIMATTER-The ultimate fuel" नाम के शीर्षक से छपा था। उसमें लेखक ने यह लिखा है कि सर्वाधिक कीमती वस्तु संसार में हीरा, यूरेनियम, प्लैटिनम, यहाँ तक कि कोई भी पदार्थ नहीं है बल्कि अपदार्थ/या प्रतिपदार्थ अर्थात ANTIMATTER है। वैज्ञानिकों ने लम्बे समय तक किये गये अनुसंधानों एवं सिद्धान्तो के आधार पर अब जाकर यह माना है कि ब्रह्मांड में पदार्थ के साथ-साथ अपदार्थ या प्रतिपदार्थ भी समान रूप से मौजूद है।
इस सम्बन्ध में ऋग्वेद के अन्तर्गत "नासदीय सूक्त" जो संसार में वैज्ञानिक चिंतन में उच्चतम श्रेणी का माना जाता है उसकी एक ऋचा में लिखा है किः- 
तम आसीत्तमसा गू---हमग्रे----प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्। 
तुच्छेच्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्।।

 अर्थात् सृष्टि से पूर्व प्रलयकाल में सम्पूर्ण विश्व मायावी अज्ञान(अन्धकार) से ग्रस्त था, सभी अव्यक्त और सर्वत्र एक ही प्रवाह था, वह चारो ओर से सत्-असत्(MATTER AND ANTIMATTER) से आच्छादित था। वही एक अविनाशी तत्व तपश्चर्या के प्रभाव से उत्पन्न हुआ। 
वेद की उक्त ऋचा से यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मांड के प्रारम्भ में सत् के साथ-साथ असत् भी मौजूद था (सत् का अर्थ है पदार्थ) । यह कितने आश्चर्य का विषय है कि वर्तमान युग में वैज्ञानिकों द्वारा अनुसंधान पर अनुसंधान करने के पश्चात कई दशकों में यह अनुमान लगाया गया कि विश्व में पदार्थ एवं अपदार्थ/प्रतिपदार्थ (Matter and Antimatter) समान रूप से उपलब्ध है। जबकि ऋग्वेद की एक छोटी सी ऋचा में यह वैज्ञानिक सूत्र पहले से ही अंकित है। 
उक्त लेख में लेखक ने लिखा है कि Matter and Antimatter जब पूर्ण रूप से मिल जाते हैं तो पूर्ण उर्जा में बदल जाते है। वेदों में भी यही कहा गया है कि सत् और असत् का विलय होने के पश्चात केवल परमात्मा की सत्ता या चेतना बचती है जिससे कालान्तर में पुनः सृष्टि (ब्रह्मांड) का निर्माण होता है।
जहां तक सृष्टि के रहस्य का प्रश्न है विकासवाद के सिद्धांत के बावजूद और वैज्ञानिक जानकारी के होने पर भी वह अभी तक मनुष्य की बुद्धि के लिए एक चुनौती है। इसलिए जिन बातों का वर्णन सृष्टि के संदर्भ में पुराण-साहित्य में हुआ है उसे बिना जाँचे परखे नकारना और अंधविश्वास कह देना किसी मूर्खता से कम नहीं है।

अगर देखा जाए तो  इस प्रकार का न जाने कितना अकल्पनीय ज्ञान वेद-पुराणों में भरा पडा है, जिसके जरिए इस सृ्ष्टि ओर उसके रचनाकार से पर्दा उठाया जा सकता है। लेकिन आधुनिक विज्ञान के अंधविश्वास में जी रहे चन्द काले अंग्रेजों को शायद इस प्रकार की बातें हजम होनी मुश्किल हैं। क्योंकि उनकी तर्कबुद्धि ये मानने को तैयार ही नहीं होती कि जंगलों मे निवास करने वाले, ऋषि मुनि कहे जाने वाले ये लोग बिना किसी आधुनिक यन्त्रों और बहुमूल्य प्रयोगशालाओं के अभाव में इन निष्कर्षों तक भी पहुंच सकते थे। समस्या का सुलझा पाने में अक्षम बुद्धि को बस एक ही बात समझ मे आती है कि इन सब तथ्यों को संयोग कहकर चुप्पी साध लें, या फिर अंधविश्वास कह कर नकार दिया जाए।
इसमे दोष शायद इन लोगों का भी नहीं हैं।ये सब तो आधुनिक विज्ञान के नाम पर हावी उस विदेशी चिंतन का प्रभाव  है, जिसके फलस्वरूप आज हम लोग नये और बढ़िया के चक्कर में अपने प्राचीन ज्ञान को समझने की बुद्धि खो चुके हैं ।