अन्तरिक्ष में जीवन की संभावनाएं........

यदि बिना किसी पूर्वाग्रह के और अपनी आखों पर चढे हुए इस अंग्रेजीयत के चश्मे को उतार कर समग्र वेद-पुराण एवं ज्योतिष इत्यादि शास्त्रों को समझने का प्रयास किया जाए, तो अवगत होगा कि प्राचीन काल में भारत सभ्यता और संस्कृ्ति में कितना आगे बढा हुआ था। प्राचीन ऋषि-मुनि अपने दिव्यज्ञान और योगबल के माध्यम से इस सृ्ष्टि के रहस्यों से भली भांती परिचित हो चुके थे। वे बिना किसी उपकरण और वेधशालाओं के सिर्फ अपने नेत्रों के जरिए ही बाह्य अन्तरिक्ष को देखकर योग के बल से अपने शरीरस्थित सौरमंडल से तुलना कर आन्तरिक ग्रहों की गति, स्थिति तथा उसके द्वारा होने वाले फलाफल का निरूपण करते रहे।

पृ्थ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति के विषय में भारतवासी न्यूटन और गैलीलियो से हजारों वर्ष पहले ही परिचित हो चुके थे। भास्कराचार्य रचित "सिद्धान्तशिरोमणि" के गोलाध्याय में एक जगह इस बात का उल्लेख किया गया है।
आकृ्ष्टशक्तिश्च महीतया यत स्वस्थं गुरू स्वामीमुखं स्वशक्तया।
आकृ्ष्यते तत्पततत्तीति भान्ती: समे समन्तात क्व पतत्वियं खे।।
अर्थात----- पृ्थ्वी में आकर्षण शक्ति निहित है; इससे वह अपने आसपास के पदार्थों को अपनी ओर खींचा करती है। पृ्थ्वी के समीप में आकर्षण-शक्ति अधिक होती है और जैसे जैसे दूरी बढती जाती है, वैसे ही यह आकर्षण शक्ति घटती चली जाती है। यहां भास्कराचार्य नें इसके कारण का विवेचन करते हुए लिखा है कि किसी स्थान से भारी तथा हल्की वस्तु पृ्थ्वी पर छोडी जाए तो दोनों समान काल में पृ्थ्वी पर गिरेंगी; यह न होगा कि भारी वस्तु पहिले गिरे और हल्की बाद में। अतएव समस्त ग्रह और पृ्थ्वी आकर्षण शक्ति के प्रभाव से ही भ्रमण करते हैं।
"गरूड पुराण में वर्णित है कि मृ्त्यु के पश्चात आत्मा को यमलोक की यात्रा करनी पडती है, जहां यमराज के सम्मुख उसे अपने इस जीवन में किए गए अच्छे-बुरे कर्मों का हिसाब देना पडता है किन्तु यमलोक पहुंचने से पूर्व मार्ग में उसे "वैतरणी" नाम की एक नदी को पार करना पडता है जिसके विषय में ये कहा गया है कि वो नदी बहुत ही गर्म, गन्दी तथा हड्डियां,रक्त,मांस और मवाद जैसे घृ्णास्पद पदार्थों से भरी होती है,जिसके दोनों किनारों की चौडाई एक सौ यौजन है कहा जाता है कि पुण्यात्मा लोग अपने धर्मबल से इसे सहज ही पार कर लेते हैं, जबकि पापी एवं दुराचारी लोगों के लिए इसे पार कर पाना बहुत ही कष्टसाध्य होता है
अब यहां जिस वैतरणी नदी का वर्णन किया गया है, वास्तव में यह ब्राह्मंड का सबसे लम्बा एक तारामंडल है,जो कि देखने में एक टेढी मेढी नदी के समान प्रतीत होता है। इसी को यूनानी सभ्यता में "एरिदानुस" भी कहा गया है। जिसका अर्थ भी नदी ही होता है। यह  तारामंडल जो कि एक नदी के समान ही दिखाई देता है, इस की धारा मृ्गशिरा तारामंडल के पास से प्रारंभ होकर पश्चिम की ओर चलती हुई फिर दक्षिणपूर्व की ओर मुडकर पुन: दक्षिण-पश्चिम व अन्तत: दक्षिण ध्रुव से 23 अंश ऊपर की ओर समाप्त होती है। 
ग्रंथ में वर्णित है कि वैतरणी नदी से आगे यमलोक की दूरी छियासी हजार योजन दूर है जिसके यात्रा मार्ग में  सौंम्यपुर, सौरिपुर, नगेन्द्र भवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्र भवन, दुःखद, नाना क्रंदपुर, सुतप्त-भवन, रौद्र नगर, पयोवर्षण, शीतादय, बहुभीति नामक 16 नगर पडते हैं। इनके बाद फिर यमलोक आता है।"
अब जब कि ये स्पष्ट हो चुका है कि ग्रन्थकार जिस वैतरिणी तारामंडल के बारे में बताना चाह रहा था, उसे सीधे स्पष्ट शब्दों में लिखने की अपेक्षा यहां उसने सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया और नदी से मिलती जुलती आकृ्ति के कारण ही उसे नदी का नाम दे दिया। उससे आगे जो ग्रन्थकार नें वैतरणी से यमलोक की छियासी हजार योजन की दूरी और उस यात्रा मार्ग के मध्य आने वाले 16 नगरों का उल्लेख किया गया है----उन्हे कपोल-कल्पना मानने का भी कोई कारण नहीं दिखाई देता है। क्या ये नहीं हो सकता कि वैतरणी तारामंडल से आगे सुदूर अन्तरिक्ष में वास्तव में ही ये नगर किसी अन्य तारामंडल या ग्रह के रूप में विधमान हों। उन्हे पार करके यमलोक नामक जिस लोक का वर्णन किया गया है और जिसकी पृ्थ्वी से दूरी छयासी हजार योजन बताई गई है(छियासी हजार प्रकाश वर्ष?)----क्या ऎसा नहीं हो सकता कि सचमुच में कोई ऎसा लोक (ग्रह) मौजूद हो, जहां जीवन संभव हो और जहां मनुष्यों से श्रेष्ठ कोई अन्य जाति (योनि)(जिन्हे हम देवता कह कर संबोधित करते हैं) निवास करती हो। 
अब इसे पढ़कर यदि आपको ऐसा लगे कि ये सब ऊल-जुलूल बातें हैं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसा लगना स्वाभाविक है।हो सकता है कि शायद ये मेरे अपने मन की काल्पनिक उडान ही हो, किन्तु क्या ऎसा हो पाना कदापि संभव नहीं है ?। इस बात को तो आधुनिक अन्तरिक्ष विज्ञान भी स्वीकार करता है कि अवश्य ही हमारी इस पृ्थ्वी से इतर किसी अन्य ग्रह पर जीवन की संभावनाएं मौजूद हैं और इन संभावनाओं की तलाश में नासा जैसा संस्थान भी पिछले कईं वर्षों से प्रयासरत्त है।

देखा जाए तो हमारे वेद,शास्त्र ऎसे असंख्य मिथकों और गल्प प्रतीत होती घटनाओं को अपने आपमें समेटे हुए हैं। परन्तु इन्हे लिखते समय बहुत ही सांकेतिक एवं अलंकारिक भाषा का प्रयोग किया गया है जिनका शाब्दिक अर्थ या तो साधारण सा ही दिखाई देता है या फिर वर्तमान युग के संदर्भ में प्रथम दृष्टितया कुछ तर्क संगत नहीं दिखलाई पड़ता। जब कि एक साधारण मनुष्य तो इनमें वर्णित कथा-कहानियों में ही उलझ कर रह जाता है। वैसे भी एक आम इन्सान के लिए उन्हे समझना बहुत ही मुश्किल कार्य है। उतना ही मुश्किल जितना कि किसी अनपढ आदमी के लिए ये बता पाना कि E=mc2 क्या बला है?। किन्तु विज्ञान को पढने,समझने वाला झट से बता देगा कि ये आईंस्टीन का दिया हुआ पदार्थ तथा उर्जा को परस्पर बदलने का फार्मूला है।
आज अधिकांशत: जिन बातों को हम कपोल कल्पना, अंधविश्वास और बकवास मानकर नकार देते हैं,वास्तव में उनमें ही इस सृ्ष्टि के सभी गूढ रहस्य समाहित हैं। आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि इन मिथकों ,पात्रों और घटनाओं से जुडे हुए अतिदैवी त्तत्वों को "डिकोड" किया जाए और उनका वैज्ञानिक विश्लेषण करके इस सृ्ष्टि के रहस्यों को समझने का प्रयास किया जाए। जिस दिन हम इन्हे समझने में सक्षम हो गए तो फिर न तो ये ब्राह्मंड हमारे लिए रहस्यमय रहेगा और न ही इसका रचनाकार।