पर्व/ त्योंहारों के एकीकरण की आवश्यकता

कुछ देर पहले  श्री सिद्धार्थ जोशी जी के ब्लाग पर एक किस्सा पढ रहा था, जिसमें उन्होने लिखा है कि किस प्रकार एक बार होली का त्योहार पंचागों में मतभेद के कारण 2 भिन्न भिन्न तिथियों को मनाया गया  खैर उनका ये किस्सा तो 18-19 साल पहले का है, जब कि पिछले कुछ वर्षों से तो अक्सर प्रत्येक त्योहार के समय इस प्रकार की दुविधापूर्ण स्थितियों का सामना करना पड रहा है होली, दीपावली,जन्माष्टमी,सक्रान्ती इत्यादि,  लगभग सभी पर्वों के समय ऎसी ही स्थिति निर्मित हो जाती है, जब कुछ विद्वान कहते हैं कि अमुक पर्व आज है और कुछेक के मतानुसार कल को बेचारा आम आदमी  इसी कशमकश में रहता है कि त्योहार आज मनाऊं कि कल आखिर ऎसा क्यूं होता है?  जिन शास्त्रों की हम लोग इतनी बढाई करते हैं,क्या वे यह निर्णय नहीं कर सकते कि अमुक पर्व किस दिन मनाना चाहिए ?

वास्तव में शास्त्र तो किसी भी पर्व का निर्णय करने के लिए अपने आपमें पूर्णत: सक्षम हैं  किन्तु पंचागों में भेद के कारण इस प्रकार की स्थिति देखने को मिलती है और इस भेद के भी मुख्य 2 कारण सामने आते है---प्रथम पंचांग की गणना किस विधि से की गई है---केतकी सिद्धांत, सूर्य सिद्धांत, ग्रह लाघक सिद्धांत अथवा आधुनिक पद्धति से  दूसरा कारण है स्थान अर्थात पंचांग किस स्थान के लिए निर्मित किया गया है प्रत्येक स्थान के लिए सूर्योदय की स्थिति भिन्न भिन्न हो जाती है तिथि की गणना इसी सूर्योदय समय पर ही निर्भर करतीहै और तिथि के द्वारा ही किसी पर्व का निर्धारण किया जाता है

एक और बात भी है कि ग्रहों की चाल के व्यतिक्रम ( perturbations ) के कारण उनकी स्थिति बदलती रहती है, जिसे किसी एक सूत्र में नहीं पिरोया जा सकता सूत्रों के नवीनीकरण की सर्वदा आवश्यकता है  शास्त्रों में दिए गए सूत्रों में हजारों वर्षों से सुधार नहीं किया गया है  आज भी हम लोग अगर उन्ही को ले कर चलते रहें, तो यह ठीक नहीं है  यह ज्योतिष की विश्वसनियता एवं उदधरण में बाधक है अत: ग्रह स्पष्ट के लिए आधुनिक गणना पद्धतियों को ले कर भी कुछ काम किया जाए तो पंचांगों में भी एकीकरण संभव है

अब दूसरा जो कारण है--स्थान पूर्व में, जहां सूर्योदय पहले  होता है, वहां तिथि में परिवर्तन नहीं होता किन्तु सूर्योदय हो जाता है, यानि कि अक्सर वहां सूर्य उदय हो जाने के पश्चात ही तिथि बदलती है।  इस प्रकार पूर्व में तिथि कईं बार 1 कम रह जाती है और पश्चिम में जहां कैलेंडर की तारीख कम होती है या घडी का समय कम होता है, वहां तिथि अधिक हो जाती है  तिथि सूर्य के भ्रमण के साथ साथ बढती जाती है और पृ्थ्वी के एक रेखांश पर तिथि बदल जाती है  अत: स्थान पर्वों के एकीकरण में गणित ही बाधा बन जाता है  शास्त्र भी इस विषय पर मौन हैं

मेरे दृ्ष्टिकोण से,  जिस प्रकार घडियों के एकीकरण के लिए मानक समय का नियम लागू किया गया है, अगर उसी प्रकार पर्वों के लिए मानक अक्षांश तथा रेखांश स्थापित कर दिए जाए तो फिर पर्व/त्योहारों का एकीकरण संभव हो सकता है