कर्मों का विभाजन और उनका आधार

अक्सर हम लोग सुनते आए हैं कि हमारे पिछले जन्मों का फल हमें इस जन्म में मिल रहा है और इस जन्म के किए गए कर्मों का फल अगले जन्म में प्राप्त होगा या फिर ये कि कलयुग में इस जन्म के फलों का भुगतान हमें इसी जन्म में प्राप्त होता हैं
वैसे ये सब बातें एक अंश में तो ठीक हैं,किन्तु इनमें आधी सच्चाई और आधी निराधार कल्पना का समावेश है
इसे समझने के लिए सबसे पहले तो हमें कर्मफल की कार्यप्रणाली को जानना होगा
 
कर्मों की तीन श्रेणियां कही गई हैं संचित कर्म,क्रियामाण कर्म और प्रारब्ध..........जो कर्म अब हम लोग कर रहे हैं वे वर्तमान में क्रियामाण हैं,जो बिना फलित हुए अर्थात जिनका अभी हमें कोई फल प्राप्त नहीं हुआ है वो हैं हमारे संचित कर्म इन्ही संचित कर्मों में से जो पक कर फल देने लगते हैं उन्हे प्रारब्ध कहा जाता हैं

अभी जो कर्म मैं इस समय अर्थात वर्तमान में कर रहा हूं वे क्रियामाण हैं,थोडी देर में यह वर्तमान काल भूतकाल बन जाएगा तो उस समय ये क्रियामाण कर्म संचित कर्मों में तब्दील हो जाएंगे यहां संचित का अर्थ है----इकट्ठा किया हुआ हम को फल इन्ही संचित कर्मों का प्राप्त होगा परन्तु सभी संचित कर्म तो एक से नहीं होते और न ही उनका फल एक ही समय में मिलता है यहां मोटे तौर पर आप समझ सकते हैं कि पालक,मूली इत्यादि का अगर आप बीज बोऎं तो लगभग दो महीने से फल मिल जाता है लेकिन अमरूद का बीज बोने पर कईं वर्षों पश्चात फल मिलता हैअगर कहीं कटहल का बीज बो दें तो फल प्राप्ति की अवधि और भी अधिक हो जाएगी इसी प्रकार कर्मों की व्यवस्था है जो कर्म हमारे संचित हैं उनमे से दैवी मर्यादा अनुसार कुछ का फल अभी मिल जाएगा,कुछ का दो चार वर्ष में और कुछ का जन्म जन्मान्तर में किन्तु यह जान पाना मनुष्य के लिए संभव नहीं है कि किए गए किस कर्म का फल कब प्राप्त होगा;क्यों कि यधपि समस्त संचित कर्मों का लेखा सूक्ष्म रूप में हमारे अन्त: पटल पर अंकित है,परन्तु हम लोग उसे पढ पाने में अक्षम हैं

जब कर्म पक कर फल देने लगते हैं तो उन्ही का नाम प्रारब्ध हो जाता है अर्थात क्रियामाण कर्म का अन्त होकर वो संचित हो जाता है और उन्ही संचित में से जो जो कर्म फल देने लगते हैं,उनको प्रारब्ध कहा जाता है हमारा अधिकार क्रियामाण कर्मों पर है,चाहे करें या न करें,परन्तु जब कोई कर्म आपने कर दिया तो समझो कि डोर आपके हाथ से छूट गई उसका फल तो आपको मिलना निश्चित है

      "अवश्यमेव भोक्तव्यं कृ्तं कर्म शुभाशुभम"

अब इन संचित कर्मों के पुंज में से कब कौन सा कर्म प्रारब्ध बन जाएगा----------यह ईश्वर की व्यवस्था के अधीन है इस प्रारब्ध को ही भाग्य, तकदीर, luck,मुकद्दर भी कहा जाता है किन्तु अगर कर्मों के इस पूरे चक्र को जरा ध्यान से देखें तो यही दिखाई देगा कि प्रारब्ध(भाग्य) का मूल तो क्रियामाण कर्म ही थे

वस्तुत: क्रियामाण कर्म ही वास्तविक कर्म है क्योंकि कर्ता का स्वातन्त्रय सिर्फ इन्ही तक सीमित है ज्यों ही वह संचित हुआ,कर्म की वास्तविक परिभाषा से बाहर हो जाता है उसे हम कर्मों का लेखा कह सकते हैं,कर्म नहीं और प्रारब्ध(भाग्य) कर्म नहीं अपितु फल है अर्थात वह पक कर फल रूप में परिवर्तित हो चुका है

उसको कर्म सिर्फ इसीलिए कहा जाता है कि फलों का मूल कारण हमारी दृ्ष्टि से ओझल न हो जाए और हम यह न समझ बैठें कि हमारे सुख या दुख का हमारे कर्मों से कोई सम्बन्ध नहीं है